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संन्यास के बाद भी याद रहेंगे युवराज

12/06/2019

मनोज चतुर्वेदी
देश को दो विश्व कप जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले युवराज सिंह ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास ले लिया। युवराज ने मुंबई में संन्यास की घोषणा करते हुए कहा कि 'मैंने 22 गज की पिच के आसपास 25 साल मंडराने और 17 साल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के बाद आगे बढ़ने का फैसला किया है।' युवराज ने कहा, .....'अपने 17 साल के अंतरराष्ट्रीय कॅरियर में मैंने कई उतार-चढ़ाव देखे। पर अब मैंने आगे बढ़ने का फैसला कर लिया है। इस खेल ने मुझे सिखाया है कि कैसे लड़ना है, गिरना है, फिर उठना है और आगे बढ़ जाना है।'.....वह क्रिकेट में कई नायाब पारियां खेलने के अलावा कैंसर को फतह करके क्रिकेट में लौटकर प्रेरणा देने वाले भी बने। कैंसर पर विजय पाने के बाद उन्होंने क्रिकेट में वापसी की और इसके बाद संन्यास लेने तक करीब 30 वनडे मैच खेले। लेकिन इस दौरान वह एक शतक और तीन अर्धशतक ही लगा सके। इस तरह पहले जैसा तो नहीं खेल पाए हालांकि उन्हें वापसी के लिए फाइटर कहा जाए तो कुछ भी गलत नहीं होगा।
युवराज कॅरियर के दौरान मिली सफलताओं से संतुष्ट दिखते हैं। लेकिन उन्हें एक बात का जरूर अफसोस है कि वह  304 वनडे मैच खेलने के बावजूद सिर्फ 40 टेस्ट ही खेल सके। उनके लिए यह बात निश्चय ही हताशा वाली है कि उन्होंने जितने टेस्ट खेले, उतने ही टेस्ट ड्रेसिंग रूम में बैठकर देखे। हो सकता है कि उन्हें इस बात का भी अफसोस हो कि किसी अंतरराष्ट्रीय मैच में धमाका करके या आईपीएल में धमाकेदार प्रदर्शन करके संन्यास की घोषणा नहीं कर सके। वह इस साल मुंबई इंडियंस के लिए आईपीएल में खेले भी, पर चार मैचों में 98 रन बनाने की वजह से टीम प्रबंधन की निगाह में नहीं चढ़ सके और उन्हें आगे खेलने का मौका ही नहीं दिया गया। इस पर उन्होंने कहा कि मैं लंबे समय से कुछ खास नहीं कर पा रहा था और मुझे खेलने के मौके भी नहीं मिल पा रहे थे। युवराज के कॅरियर का सबसे चमकदार क्षण 2011 का विश्व कप जीतने के दौरान मैन ऑफ द सीरीज बनना था। उस विश्व कप में उन्होंने नौ मैचों में एक शतक और चार अर्धशतकों से 362 रन बनाने के अलावा गेंदबाजी में 15 विकेट लेकर धोनी सेना के चैंपियन बनने की राह बनाई।
युवराज हमेशा इस बात को मानने वाले रहे हैं कि एग्रेशन को नियंत्रण में रखना चाहिए और आपको एग्रेशन खेल में दिखाना चाहिए। आप 2007 के टी-20 विश्व कप की याद करें। इसे महेंद्र सिंह धोनी की टीम ने जीता था और इस जीत में युवराज ने अहम भूमिका निभाई थी। इस विश्व कप के इंग्लैंड के खिलाफ मैच में युवराज ने पेस गेंदबाज स्टुअर्ट ब्रॉड के एक ओवर में छह छक्के जमाकर इतिहास रच दिया था। युवराज की यह उपलब्धियां संन्यास के बाद भी उनकी हमेशा याद दिलाती रहेंगी।
युवराज सिंह को भले ही इस बात का मलाल रहा कि वह टेस्ट टीम में पक्की जगह कभी नहीं बना सके। इसके बावजूद वह अपने कॅरियर में टेस्ट टीम में अंदर-बाहर होते हुए भी 40 टेस्ट खेलने में सफल रहे और 33.92 के औसत से 1900 रन बनाए, जिसमें तीन शतक और 11 अर्धशतक शामिल हैं। वनडे और टी-20 क्रिकेट में भी उनका कोई तोड़ कभी नहीं रहा। उन्होंने 304 वनडे मैचों में 36.51 के औसत से 8701 रन बनाए। इस दौरान उन्होंने 14 शतक और 52 अर्धशतक भी लगाए। इसके अलावा 111 विकेट भी उनके नाम दर्ज हैं। इसी तरह वह टी-20 के भी बेजोड़ खिलाड़ी रहे। उन्होंने 58 मैचों में 1177 रन बनाए। युवराज कहते हैं कि आदमी जो चाहता है, वह सब कुछ उसे नहीं मिलता है। लेकिन मैंने क्रिकेट खेलना शुरू करने के समय कभी नहीं सोचा था कि देश के लिए 400 अंतरराष्ट्रीय मैच खेलूंगा। युवी का खेलते नहीं दिखना खलेगा जरूर। युवराज का आगे निकलकर लॉफ्टेड ऑफ ड्राइव के अंदाज में बल्ले को स्विंग करता छक्का हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने अपनी पहली ही सीरीज में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ गिलिस्पी की गेंद पर ऑन द राइज कवर ड्राइव और ग्लेन मैकग्रा की गेंद पर फ्लिक लगाकर दोनों गेंदबाजों को भौंचक कर दिया था। उनका यह अंदाज पूरे करियर रहा। सच यह है कि युवराज इस तरह के बल्लेबाज रहे हैं कि विपक्षी कप्तान उनके लिए कैसी भी फील्डिंग सजाते थे, वह उसे मजाक बनाकर रख देते थे। वह बल्लेबाजी करते समय जब रन बनाने के लिए दरारें बनाने में कामयाब नहीं हो पाते थे तो छक्कों से रनों की राह बनाना जानते थे।
युवराज के  2011 के विश्व कप में सबसे शानदार क्षण जीने के बाद ही जिंदगी के सबसे मुश्किल क्षणों का सामना करना पड़ा। युवराज को जब कैंसर होने का पता चला तो वह शुरुआत में थोड़े घबड़ाए, पर जल्द ही विश्वास पा लिया। उन्होंने साइक्लिस्ट लांस आर्मस्ट्रांग की आत्मकथा बढ़कर विश्वास को बढ़ाया। आर्मस्ट्रांग ने भी कैंसर को फतह करके साइक्लिंग में वापसी की थी। युवराज कहते हैं कि बीमार पड़ने के बाद मुझे पक्का भरोसा था कि मैं एक दिन फिट होकर क्रिकेट जरूर खेलूंगा। मैं अपने विश्वास को वास्तविकता में बदलने में सफल हो गया। उन्होंने क्रिकेट से ही प्रेरणा लेकर अपने को फिट किया। वह कहते हैं कि जैसे क्रिकेट में कभी कोई सेशन या दिन ऐसा होता है, जब वापसी के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। जिंदगी में भी ऐसा ही होता है और मैंने हार माने बिना कैंसर जैसी बीमारी पर विजय प्राप्त की।
युवराज ने अपने कॅरियर का आखिरी अंतरराष्ट्रीय मैच टी-20 के रूप में फरवरी 2017 में इंग्लैंड के खिलाफ खेला था। आखिरी वनडे मैच इससे एक माह पहले यानी जनवरी 2017 में एंटीगुआ में वेस्ट इंडीज के खिलाफ खेला था। इसके बाद युवराज सिंह ने राष्ट्रीय टीम में आने का भरपूर प्रयास किया। लेकिन काफी समय तक फिटनेस बताने वाला टेस्ट पास नहीं कर पाना बाधा बना। लेकिन जब इस टेस्ट को पास कर लिया तो भी टीम में जगह नहीं मिलने पर यह तो लगने लगा था कि वह कभी भी संन्यास की घोषणा कर देंगे। बेशक, युवराज जैसी क्षमता वाले खिलाड़ी की यदि अंतरराष्ट्रीय मैच खेलते हुए विदाई होती तो उनके लिए यह सम्मानजनक होता।
(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं।) 


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