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बोरवेल की बलि चढ़ते मासूम

08/11/2019

योगेश कुमार गोयल

बोरवेल में बच्चों की मौत की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। हालिया घटना तीन नवम्बर की है। जब हरियाणा के करनाल जिले के घरौंडा कस्बे के गांव हरसिंहपुरा में एक पांच वर्षीय बच्ची शिवानी खेलते समय अपने घर के पास खुले पड़े 50 फुट गहरे बोरवेल में गिर गई थी। उसे बचाने के लिए पुलिस, प्रशासन तथा एनडीआरएफ की टीम ने संयुक्त अभियान चलाया। किन्तु, 18 घंटे के रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद भी बच्ची को बचाया नहीं जा सका। ऐसा ही हादसा दीपावली के दो दिन पहले तमिलनाडु में हुआ था, जहां 25 अक्टूबर की शाम तिरूचिरापल्ली जिले के एक गांव में सुजीत नामक दो वर्षीय बच्चा खेलते-खेलते 600 फुट गहरे बोरवेल में गिरकर 100 फुट नीचे चला गया था। बच्चे को बचाने के लिए लगातार तीन दिन तक एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की छह टीमों द्वारा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। लेकिन तमाम प्रयास के बावजूद बच्चे को नहीं बचाया जा सका।
इसी वर्ष तीन अप्रैल को उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद जिले के रशीदापुर गांव में भी आठ वर्षीया मासूम सीमा 60 फुट गहरे बोरवेल में गिरकर 26 फुट की गहराई पर फंस गई थी। उसे सेना-एनडीआरएफ की टीमों के 55 घंटे के ऑपरेशन के बावजूद बचाया नहीं जा सका था। अंततः 6 अप्रैल को बोरवेल को मिट्टी से बंद कर दिया गया और बच्ची बोरवेल में ही दफन हो गई। हालांकि 20 मार्च 2019 को हरियाणा में हिसार के बालसमंद गांव में करीब 60 फीट गहरे बोरवेल में गिरे डेढ़ साल के नदीम को सेना-एनडीआरएफ की टीमों के 50 घंटे के रेस्क्यू ऑपरेशन के जरिये सही सलामत बाहर निकाल लिया था। पिछले साल 30 जुलाई को 110 फुट गहरे बोरवेल में गिरी बिहार के मुंगेर जिले की तीन वर्षीया सना को भी 31 घंटे के रेस्क्यू ऑपरेशन के पश्चात् बचा लिया गया था। लेकिन बोरवेल में गिरकर सही-सलामत बाहर निकलने वाला हर बच्चा नदीम या सना जैसा किस्मत का धनी नहीं होता। अब तक कई मासूम जिंदगियां बोरवेल में समाकर जिंदगी की जंग हार चुकी हैं। विडम्बना है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद कभी ऐसे प्रयास नहीं किए गए, जिससे इस तरह के मामलों पर अंकुश लग सके।
21 जुलाई 2006 को हरियाणा में कुरूक्षेत्र के हल्दाहेड़ी गांव में पांच वर्षीय प्रिंस के 50 फीट गहरे बोरवेल में गिर जाने के बाद उस रेस्क्यू ऑपरेशन के दृश्य टीवी चैनलों पर लाइव दिखाये जाने के चलते पूरी दुनिया का ध्यान पहली बार ऐसे हादसों की ओर गया था। उम्मीद जताई गई थी कि भविष्य में फिर कभी ऐसे हादसे नहीं होंगे। किन्तु, देश में हर साल औसतन करीब 50 बच्चे बेकार पड़े खुले बोरवेलों में गिर जाते हैं। बहुत से बच्चे बोरवेलों में ही जिंदगी की अंतिम सांसें लेते हैं। ऐसे हादसे हर बार किसी परिवार को जीवनभर का असहनीय दुख देने के साथ-साथ समाज को भी बुरी तरह झकझोर जाते हैं। दु:खद कि बार-बार होते ऐसे हादसों पर आंसू बहाना ही हमारी नियति बन गई है। बोरवेल देश में अब एक ऐसा जानलेवा शब्द बन चुका है, जिसने न जाने कितने मासूमों की जिंदगी छीन ली है।
हैरत की बात है कि देशभर में बोरवेल में बार-बार हादसे हो रहे हैं लेकिन कोई ऐसे हादसों से सबक सीखने को तैयार नहीं दिखता। ऐसे मामलों में सेना-एनडीआरएफ की बड़ी विफलताओं को लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं कि अंतरिक्ष तक में अपनी धमक दिखाने में सफल भारत के पास चीन तथा कुछ अन्य देशों जैसी वो स्वचालित तकनीकें क्यों नहीं हैं, जिनका इस्तेमाल करके ऐसे मामलों में बच्चों को तत्काल बोरवेल से बाहर निकालने में मदद मिल सके। सवाल यह भी हैं कि बार-बार होते ऐसे दर्दनाक हादसों के बावजूद देश में बोरवेल और ट्यूबवेल के गड्ढे कब तक इसी प्रकार खुले छोड़े जाते रहेंगे और मासूम जानें इनमें फंसकर दम तोड़ती रहेंगी। हालांकि हर बार ऐसी हृदयविदारक घटनाओं से सबक सीखने की बातें दोहराई जाती हैं लेकिन थोड़े-थोड़े अंतराल बाद जब ऐसी ही घटनाएं सामने आती हैं तो पता चलता है कि न तो आमजन ने और न ही प्रशासन ने ऐसी दिल दहलाने वाली घटनाओं से कोई सबक सीखा।
प्रायः देखा जाता है कि बहुत-सी जगहों पर किसानों द्वारा खराब ट्यूबवेल उखाड़कर दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिया जाता है लेकिन ट्यूबवेल उखाड़ने के बाद बोरवेल को कंक्रीट से भरकर समतल करने की बजाय किसी बोरी या कट्टे से ढंककर खुला छोड़ दिया जाता है। यही बोरवेल बार-बार ऐसे हादसों का कारण बनते हैं। कोई भी हादसा होने के बाद प्रशासन द्वारा बोरवेल खुला छोड़ने वालों के खिलाफ अभियान चलाकर सख्ती की बातें दोहराई जाती हैं लेकिन बार-बार सामने आते ऐसे हादसे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सख्ती की बातें कोई घटना सामने आने पर लोगों का आक्रोश शांत होने तक ही बरकरार रहती हैं। ऐसे हादसों के लिए बोरवेल खुला छोड़ने वाले खेत मालिक के साथ-साथ ग्राम पंचायत और स्थानीय प्रशासन भी बराबर के दोषी होते हैं।
कुछ माह पहले मध्य प्रदेश में देवास जिले के गांव उमरिया में एक किसान हीरालाल को अपने खेत में सूखा बोरवेल खुला छोड़ देने के अपराध में जिला सत्र न्यायालय ने दो वर्ष सश्रम कारावास तथा 20 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई थी। दरअसल 10 मार्च 2018 को खेत में फसल काटते समय महिला श्रमिकों में से एक का चार वर्षीय बेटा रोशन इस बोरवेल में गिर गया था। उसे बड़ी मशक्कत के बाद 36 घंटे पश्चात् निकाला जा सका था। इस घटना के बाद तहसीलदार द्वारा हीरालाल के खिलाफ धारा 308 के तहत मुकदमा दर्ज कराकर उसे गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि लोग बोरवेल कराकर उन्हें खुला छोड़ देते हैं, जिससे उनमें बच्चों के गिरने की घटनाएं हो जाती हैं। समाज में बढ़ रही लापरवाही के ऐसे मामलों में सजा देने से ही लोगों को सबक मिल सकेगा। अगर मध्य प्रदेश में जिला अदालत के इसी फैसले की तरह ऐसे सभी मामलों में त्वरित न्याय प्रक्रिया के जरिये दोषियों को कड़ी सजा मिले, तभी लोग खुले बोरवेल बंद करने को लेकर सजग होंगे। अन्यथा बोरवेल इसी प्रकार मासूमों की जिंदगी छीनते रहेंगे। 
बोरवेलों में बच्चों के गिरने की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे हादसों पर संज्ञान लेते हुए समय-समय पर दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। अदालत के दिशा-निर्देशों में स्पष्ट है कि बोरवेल की खुदाई के बाद अगर कोई गड्ढा है तो उसे कंक्रीट से भर दिया जाए। लेकिन ऐसा न किया जाना ही हादसों का सबब बनता है। ऐसे हादसों में न केवल निर्दोष मासूमों की जान जाती हैं बल्कि रेस्क्यू ऑपरेशनों पर अथाह धन, समय और श्रम भी नष्ट होता है। इसलिए न केवल सरकार बल्कि समाज को भी ऐसी लापरवाहियों को लेकर चेतना होगा, ताकि भविष्य में ऐसे दर्दनाक हादसों की पुनरावृत्ति न हो।
(लेखक स्तंभकार हैं।)


 
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