युगवार्ता

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चुनावी मैन ऑफ द मैच

13/11/2019

चुनावी मैन ऑफ द मैच

बद्रीनाथ वर्मा

हरियाणा विधानसभा चुनाव में भाजपा भले ही 40 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सत्ता की दावेदार है लेकिन मैन आॅफ द मैच तो दुष्यंत चौटाला ही हैं।

महज 10 महीने पुरानी पार्टी के बलबूते 10 सीटें जीतकर दुष्यंत चौटाला क्रिकेट की भाषा में कहें तो मैन आॅफ द मैच बनकर उभरे हैं। चाबी निशान पर चुनाव लड़ने वाली जननायक जनता पार्टी के पास सत्ता की चाबी भी आ जाएगी यह तो किसी ने सोचा ही नहीं था। सूबे में किंगमेकर की हैसियत हासिल करने वाले दुष्यंत चौटाला ‘ताऊ’ के नाम से मशहूर रहे पूर्व उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल के पड़पोते हैं। विधानसभा चुनाव में 10 सीटें जीतकर दुष्यंत चौटाला ने न केवल विपक्षी पार्टियों की तरफ से उन्हें हल्के में लेने की गलती का एहसास कराया है, बल्कि चौटाला परिवार की सियासी विरासत पर मजबूत दावेदारी भी पेश की है।
ऐसा इसलिए क्योंकि उनके दादा ओमप्रकाश चौटाला व चाचा अभय चौटाला के नेतृत्व वाली इंडियन नेशनल लोकदल महज एक सीट जीत पाई है, जबकि 2014 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के 19 विधायक जीते थे। उल्लेखनीय है कि सूबे में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। राज्य की सत्ताधारी पार्टी भाजपा बहुमत से जहां छह कदम दूर रह गई, वहीं कांग्रेस भी 31 सीटों पर जाकर ठिठक गई। ऐसे में 10 सीटें जीतकर दुष्यंत चौटाला भले ही किंग या किंगमेकर नहीं बन पाये लेकिन चुनाव से पहले हरियाणा के घाघ राजनेता जिस जेजेपी को बच्चा पार्टी कहते थे, उनको बगले झांकने पर मजबूर जरूर कर दिया है।
भाजपा को रोकने के लिए एक बार तो कांग्रेस ने उनके सामने हरियाणा का सीएम बनने का भी प्रस्ताव रख दिया। हालांकि चुनाव जीतकर आये भाजपा के बागियों व निर्दलियों की ओर से भाजपा को समर्थन दे दिये जाने के कारण कांग्रेस का खेल खराब हो गया। वहीं, नई खट्टर सरकार में उपमुख्यमंत्री का पद स्वीकार कर दुष्यंत ने अपनी सत्ता की चाबी का सही इस्तेमाल कर लिया है। बहरहाल, ओमप्रकाश चौटाला के दोनों पुत्रों, अजय और अभय चौटाला के बीच राजनीतिक बंटवारे के बाद हुए इस पहले चुनाव का साफ संकेत है कि राज्य की जनता ने ताऊ की सियासी विरासत अजय चौटाला के पुत्र दुष्यंत चौटाला को सौंप दिया है।
अपने दादा आईएनएलडी के मुखिया ओमप्रकाश चौटाला और चाचा अभय चौटाला के साथ अनबन होने के बाद दिसंबर 2018 में दुष्यंत चौटाला ने नई पार्टी जेजेपी बनाई थी। कुछ समय के लिए जेजेपी के साथ आम आदमी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी जुड़ी लेकिन यह साथ लंबा नहीं चला। बहरहाल, विपक्षी पार्टियों ने भले ही गंभीरता से नहीं लिया लेकिन जनता ने दुष्यंत व उनकी पार्टी को हल्के में नहीं लिया। जेजेपी अपने दम पर सभी 90 सीटों पर उतरी और पहले ही प्रयास में 10 सीटें जीतने में सफल रही।
कुल मिलाकर पिछली लोकसभा में देश के सबसे युवा सांसद के रूप में लिम्का बुक आॅफ वर्ल्ड रिकार्ड में नाम दर्ज कराने वाले दुष्यंत चौटाला 10 महीनों में पके हुए ऐसे चावल बन गये हैं जिसकी गमक सूबे की सियासत में दूर-दूर तक फैल गई है। घाघ कांग्रेस व महाबली बीजेपी के बीच जंग में जेजेपी ने खुद का लोहा मनवा लिया है। इसी के साथ यह भी साफ हो गया है कि न केवल जेजेपी के ऊपर चस्पा बच्चा पार्टी का लेबल धुल गया है बल्कि सूबे की राजनीति में इसे नोटिस में लिया जायेगा। जेजेपी छुपा रुस्तम साबित होने जा रही है इसका सबसे पहले आभास डॉ. अशोक तंवर को हुआ था। उन्होंने न केवल अपने समर्थन का ऐलान किया था बल्कि 36 जातियों से समर्थन देने की भी अपील की थी। गौरतलब है कि चुनाव के ऐलान से ठीक पहले भूपेंद्र सिंह हुड्डा के दबाव में पांच साल तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे सिरसा से सांसद अशोक तंवर से सूबे की कमान लेकर कुमारी शैलजा को सौंप दिया गया।
अशोक तंवर यह अपमान सह नहीं पाये। उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। साथ ही जननायक जनता पार्टी को अपने समर्थन का ऐलान करते हुए तंवर ने अपील की कि दुष्यंत चौटाला को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के लिए 36 बिरादरी को साथ देना चाहिए। मतदान से ठीक पहले सियासत के दो दिग्गज युवाओं की इस जुगलबंदी ने प्रदेश के चुनावी समीकरण को बदल दिया। तंवर व दुष्यंत की नई जुगलबंदी ने जातिगत समीकरणों को एक नए सिरे से परिभाषित किया जिसका सीधा असर चुनाव परिणामों पर पड़ा, इसे मानने में किसी को गुरेज नहीं होना चाहिए, नतीजे इसी ओर इशारा कर रहे हैं।


 
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