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एनआरसी पर घमासान

09/10/2019

एनआरसी पर घमासान

अरविन्द कुमार राय

ल तक एनआरसी का पुरजोर और हिंसक विरोध करने वाला धड़ा आज इसकी जमकर वकालत कर रहा है, जबकि मूल भारतीय नागरिकों के अधिकारों की दुहाई देकर एनआरसी अद्यतन को राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व भाषाई सुरक्षा के लिए नितांत जरूरी बताने वाला खेमा इसका विरोध कर रहा है। गत 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में प्रकाशित हुए एनआरसी की अंतिम सूची में 3 करोड़, 11 लाख, 21 हजार चार व्यक्तियों को शामिल होने के योग्य पाया गया। जबकि 19 लाख, 6 हजार, 657 व्यक्तियों का नाम एनआरसी में शामिल नहीं किया गया। कुल 3 करोड़ 30 लाख 27 हजार 661 लोगों ने आवेदन किया था। अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद हालात पूरी तरह से बदल गए हैं।

राज्य में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के लिए अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद भी घमासान जारी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या एनआरसी अपने उद्देश्यों को पूरा करने में सफल रही। इस सवाल पर राज्य की जनता, राजनीतिक पार्टियां व गैर राजनीतिक संगठन अलग-अलग धड़ों में बंटे दिखाई दे रहे हैं।

विरोध का झंडा उठाने वाले समर्थन में खड़े हो गए, जबकि समर्थन करने वाले विरोध का स्वर बुलंद करने लगे हैं। देश के बंटवारे के बाद से ही बड़ी संख्या में बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) से हिंदू आबादी धार्मिक आधार पर प्रताड़ित होने के कारण शरण लेने के लिए भारत में आने लगी थी। 1971 में बांग्लादेश के गठन के दौरान हुए युद्ध की स्थिति में बड़ी संख्या में बांग्लादेश से नागरिक भारत में घुसपैठ करने लगे। इस दौरान सभी धर्मों के लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए बड़ी संख्या में भारत में शरण ली। युद्ध समाप्त होने के बाद भी घुसपैठ का सिलसिला अनवरत जारी रहा। इस से असम की जनता अपने अधिकारों को लेकर चिंतित हुई। स्थानीय नागरिकों को अपनी भाषा, संस्कृति, इतिहास, आर्थिक पक्ष की चिंता होने लगी। इसके बाद 80 के दशक में पांच वर्षों तक लंबा आंदोलन चला। अंतत: असम समझौते के रूप में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और छात्र संगठन आसू तथा अन्य एक संगठन के बीच करार हुआ।

समझौते में स्थानीय लोगों के अधिकारों की सुरक्षा की बात कही गई। समझौते के मुताबिक मुख्य रूप से 24 मार्च, 1971 की मध्यरात्रि के पहले तक भारत में आने वाले नागरिकों को एनआरसी अद्यतन के जरिए भारतीय नागरिक स्वीकार करने की बात कही गयी। समझौते की शर्तों को पूरा करने के लिए सरकारों ने कोई कदम नहीं उठाया। हालांकि आंदोलन की कोख से उत्पन्न हुई असम गण परिषद ने भी राज्य की दो बार सत्ता संभाली, लेकिन उसने भी एनआरसी अद्यतन के लिए कोई ठोस पहल नहीं की। समय बीतने के साथ घुसपैठ की समस्या विकराल होती गई। असम में विदेशी नागरिकों की संख्या को लेकर कई नेताओं ने पूर्व में कई दावे किए थे। तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया (1991-1996) ने असम विधानसभा में 30 लाख से अधिक विदेशी होने की बात कही थी। वहीं 1997 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता ने संसद में असम समेत पूरे देश में एक करोड़ विदेशी नागरिकों के होने की बात स्वीकारी। इसी तरह 14 जुलाई,2004 को तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने सदन में असम में 50 लाख तथा पूरे देश में 1.2 करोड़ विदेशी नागरिकों की मौजूदगी बतायी। भाजपानीत केंद्र सरकार के तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू (2014- 2018) ने सदन में देश में दो करोड़ अवैध विदेशी नागरिकों की बात कही थी।

अंतिम सूची के समर्थक

एनआरसी की अंतिम सूची के प्रकाशित होने के बाद जो तथ्य सामने निकल कर आए, उससे सबसे ज्यादा प्रसन्न और उत्साहित 2009 में पायलट प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले संगठन थे। इनमें आॅल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट यूनियन (आम्सू) के लगभग सभी धड़े, मुस्लिमों की रहनुमाई करने वाली आॅल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ), सभी वामपंथी पार्टियां व घुसपैठ के विरोध में पांच वर्षों तक आंदोलन करने वाले आसू के तत्कालीन अध्यक्ष व असम गण परिषद के संस्थापक अध्यक्ष तथा दो बार के मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत का नाम शामिल है। सभी ने एनआरसी के प्रदेश संयोजक ,आईएएस अधिकारी प्रतीक हजेला के कदमों की सराहना करते हुए इसे राज्य के लिए सबसे बड़ा वरदान करार दिया। वहीं दूसरी ओर मुस्लिम संगठन खुलेआम इस बात को कहते देखे गए कि अब कोई भी व्यक्ति असम में मुसलमानों को घुसपैठिया नहीं कह सकता है। क्योंकि सभी का नाम एनआरसी में भारतीय के रूप में शामिल हो गया है। उल्लेखनीय है कि यह कथन अवैध रूप से भारत में घुसपैठ करने वाले बांग्लादेशी नागरिकों को लेकर था।

भारी दबाव के बीच 2009 में तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने असम के कामरूप (ग्रामीण) और बरपेटा जिलों में एनआरसी अद्यतन के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया तो, इसका मुस्लिम संगठनों ने हिंसक विरोध किया। इसके चलते सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट को बंद कर दिया। इस बीच असम पब्लिक वर्क्स (एपीडब्ल्यू) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर असमिया नागरिकों के हितों की सुरक्षा के लिए एनआरसी के अद्यतन की मांग को लेकर याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि एनआरसी अद्यतन की प्रक्रिया तत्काल शुरू की जाए। केंद्र सरकार ने इसके लिए जहां धन का प्रावधान किया, वहीं राज्य सरकार ने लगभग 52 हजार अधिकारियों व कर्मचारियों के जरिए एनआरसी के अद्यतन की प्रक्रिया शुरू की। 2015 से एनआरसी में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन की प्रक्रिया शुरू हुई। एनआरसी आवेदन फॉर्म की प्राप्ति की प्रक्रिया मई, 2015 के अंत में शुरू हुई और 31 अगस्त,2015 को समाप्त हुई। कुल 3 करोड़ 30 लाख 27 हजार 661 लोगों ने आवेदन किया। 30 जुलाई, 2018 में एनआरसी की पहली मसौदा सूची जारी की गयी। उसमें 2 करोड़,89 लाख,83 हजार,677 लोगों के नाम शामिल कर लिए गये। तब 41 लाख से अधिक लोगों के नाम शामिल नहीं किए गये। इस दौरान एक लाख 87 हजार 633 व्यक्तियों को शामिल किए जाने के खिलाफ आपत्तियां प्राप्त हुईं। इनके नाम पूर्ण प्रारूप में दिखाई दिए थे। एक और अतिरिक्त मसौदा बहिष्करण सूची 26 जून, 2019 को प्रकाशित की गई थी, जिसमें एक लाख दो हजार 462 व्यक्तियों को बाहर रखा गया था।

विरोध में उठी आवाज

एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद राज्य में अधिकांश राजनीतिक दल और गैर राजनीतिक संगठन विरोध में अपनी आवाज बुलंद करना शुरू कर दिए हैं। एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित होने के पूर्व ही ऐसे संकेत मिलने लगे थे कि पहली मसौदा सूची से बाहर किए गए 40 लाख से अधिक लोगों में से 20 लाख से अधिक लोगों के नाम शामिल हो गये हैं। जबकि, 19 लाख से अधिक जिन लोगों के नाम शामिल नहीं हुए हंैं,उनमें से अधिकांश हिंदू -बंगाली व देश के अन्य हिस्सों से आकर असम में रहने वाले नागरिक हैं। ऐसे में इसको लेकर राज्य के अलग-अलग हिस्सों में विरोध और प्रदर्शन शुरू होने लगे।

राज्य सरकार और केंद्र सरकार को भी इस बात का आभास था कि अंतिम सूची के प्रकाशित होने के पश्चात हालात खराब हो सकते हैं। ऐसे में राज्य के 14 जिलों को संवेदनशील घोषित करते हुए बड़े पैमाने पर सुरक्षाबलों को तैनात किया गया। हालांकि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति सामान्य रही। राज्य की सत्ताधारी पार्टी भाजपा, असम गण परिषद (अगप), कांग्रेस, आॅल असम छात्र यूनियना(आसू), अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद समेत अनेक संगठनों ने एनआरसी के प्रदेश संयोजक प्रतीक हजेला पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए पूरी एनआरसी की पुनर्समीक्षा की मांग उठाई है। इतना ही नहीं, प्रतीक हजेला पर स्थानीय नागरिकों के हितों से खिलवाड़ करने का आरोप लगाते हुए अब तक तीन प्राथमिकियां भी दर्ज कराई गईं हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने एनआरसी की पुनर्समीक्षा के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा है। सबसे हास्यास्पद स्थिति राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की है।

कांग्रेस के बराक घाटी के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई समेत अधिकांश नेता एनआरसी की पुनर्समीक्षा की बात कह रहे हैं। जबकि, पार्टी के मुस्लिम नेता इसकी सराहना करते हुए प्रतीक हजेला का समर्थन कर रहे हैं। विरोध करने वाले सभी संगठनों व राजनीतिक दलों का कहना है कि वे अपनी ओर से प्रकृत भारतीयों का सभी तरह की कानूनी मदद करेंगे, जिनका नाम एनआरसी में शामिल होने से छूट गया है। साथ ही एनआरसी में शामिल हुए अवैध बांग्लादेशी नागरिकों के नामों को बाहर निकालने के लिए कानूनी लड़ाई भी लड़ेंगे। इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य के लोगों को भरोसा दिया है कि एक भी बांग्लादेशी नागरिक को भारत में रहने नहीं दिया जाएगा। अब देखना है कि एनआरसी को लेकर सरकार आने वाले दिनों में क्या कदम उठाती है।



 
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