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जनरल बाजवा का सेवा विस्तार एवं न्यायालय

02/01/2020

जनरल बाजवा का सेवा विस्तार एवं न्यायालय

अवधेश कुमार

पाकिस्तान में पहली बार वहां के उच्चतम न्यायालय ने सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा के कार्यकाल विस्तार पर न केवल नकारात्मक टिप्पणियां कीं बल्कि उसे रद्द ही कर दिया। तत्काल उच्चतम न्यायालय ने इमरान सरकार द्वारा बाजवा का कार्यकाल 3 साल बढ़ाने की अधिसूचना को 6 महीने कर दिया है। अब सवाल है कि इमरान सरकार के अंदर ऐसे अयोग्य नेता एवं अधिकारी हैं जो कानून और संविधान को ध्यान में रखते हुए न्यायिक समीक्षा में टिकने वाले एक आदेश पत्र तक नहीं बना सकते। इसके अलावा वहां सेना के अंदर का सत्ता संघर्ष, पर्दें के पीछे से न्यायालय का बाजवा के खिलाफ उपयोग तथा राजनीतिक कशमकश का पहलू तो है ही। मुख्य न्यायाधीश आसिफ सईद खोसा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने फैसला क्या किया,सोशल मीडिया पर इनके खिलाफ आरोपों की बाढ़ आ गई। उन्हें भारत और सीआईए का एजेंट करार दिया जा रहा है। बहरहाल, यहां कई और भी प्रश्न खड़े होते हैं। एक, अब इमरान सरकार क्या करेगी? दो, न्यायालय ने इतना कड़ा रुख क्यों अपनाया? तीन, आखिर इमरान बाजवा का सेवा विस्तार क्यों चाहते हैं? चूंकि छह महीनों का सर्शत सेवा विस्तार है, इसलिए इस बीच संसद में कानून बनाना होगा।

न्यायालय ने पूछा कि क्या इतने बड़े देश में कोई एक शख्स इतना अपरिहार्य हो सकता है, जिसके बिना काम ही न चले? साफ है कि इमरान सरकार ने दबाव में यह फैसला किया है।

पहले कैबिनेट संबंधित संविधान की धारा और आर्मी ऐक्ट में संशोधन के प्रस्ताव को पास करेगी। सरकार को नैशनल असेंबली में तो बहुमत है सीनेट में नहीं। संविधान में संशोधन के लिए दो तिहाई सदस्यों की सहमति चाहिए। सेना प्रमुख मामले में संविधान के अनुच्छेद 243 में संशोधन करना होगा। इस तरह दोनों में विपक्ष के सहयोग की आवश्यकता होगी। इमरान खान पर यह सवाल भी उठ रहा है कि पहले वे सेवा विस्तार का घोर विरोध करते थे। उन्होंने जनरल अशफाक परवेज कियानी को सेवा विस्तार दिए जाने पर कहा था कि इस तरह हम अपने कानून को कमजोर करते हैं। प्रथम और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भी किसी को सेवा विस्तार नहीं दिया गया। इधर, सरकार की ओर से मीडिया मेंं यह फीड किया जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर और भारत-पाकिस्तान सीमा पर भारत के खिलाफ रणनीति बनाने में बाजवा माहिर हंै। इमरान सरकार ने यह कदम तब उठाया था, जब जम्मू-कश्मीर पर भारत के कठोर रुख और अनुच्छेद 370 हटाने के बाद सीमा पर तनाव बढ़ गया था। चूंकि इमरान को सत्ता तक पहुुंचाने में बाजवा के नेतृत्व में सेना की प्रमुख भूमिका थी, इसलिए उनके पास उन्हें सेवा विस्तार देने के अलावा विकल्प नहीं है।

अगर उन्हें वजीर-ए-आजम बने रहना है तो बाजवा को बनाए रखना होगा। माना जा रहा है कि पाकिस्तान में सत्ता संघर्ष चल रहा है जिसमें सेना के उच्चाधिकारियों की ही भूमिका है। मौलाना फजलुर रहमान की आजादी मार्च के पीछे भी इन्हीं की शह मानी गई थी। बाजवा ने मार्च पर आपत्ति उठाई थी। मौलाना ने आंदोलन खत्म करते हुए बयान दिया कि दिसंबर-जनवरी में सरकार बदल जाएगी। पाकिस्तान में तब यही माना गया कि मौलाना के मार्च के निशाने पर बाजवा ही थे। उच्चतम न्यायालय की भूमिका अगर अभूतपूर्व है तो इसे भी इसका अंग मानना होगा। नवाज शरीफ को संसद से लेकर पार्टी अध्यक्ष पद तक से वंचित करना न्यायालय का इस्तेमाल ही था। वास्तव में सैन्य अधिकारियों का वह समूह, जो पाकिस्तानी सत्ता पर दबदबा रखता है, इन रास्तों से ही नेताओं पर नियंत्रण करता है। अंग्रेजी में उन्हें डीप स्टेट का नाम दिया गया है। पाकिस्तान उच्चतम न्यायालय हालांकि पिछले कुछ वर्षों में थोड़ा आजाद रहा है, पर इन शीर्ष सैन्य अधिकारियों का इशारा उसके लिए मायने रखता है। यह पहली बार है जब पद पर रहने वाले किसी सेनाध्यक्ष के संदर्भ में उसने ऐसा रुख अपनाया है। अगर यह सच है, जैसा लगता है तो फिर आने वाले समय में इसके कुछ अलग तरह के परिणाम भी देखने को मिल सकते हैं।


 
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