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वैैश्विक नहीं 'स्वदेशी' ही जीवन की दरकार

22/05/2020

गिरीश्वर मिश्र
कोरोना महामारी ने जहां सबके जीवन को त्रस्त किया है, वहीं उसने जीवन के यथार्थ के ऊपर छाए कई भ्रम भी दूर किए हैं जिनको लेकर हम सभी बड़े आश्वस्त हो रहे थे। विज्ञान और प्रौद्यौगिकी के सहारे हमने प्रकृति पर विजय का अभियान चलाया और उसकी उपलब्धियों के बीच यह भुला दिया कि मनुष्य और प्रकृति के बीच परस्पर निर्भरता और पूरकता का रिश्ता है। परिणाम यह हुआ कि हमारी जीवन पद्धति प्रकृति के अनुकूल नहीं रही और हमने प्रकृति को साधन मानकर उसका मनमाने ढंग से दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। फल यह हुआ कि जल, जमीन और जंगल के प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण शुरू हुआ, उनकी जीवनदायिनी क्षमता क्षीण होती रही। साथ ही मनुष्य के अंधाधुंध हस्तक्षेप से उनके प्रदूषण का अनियंत्रित क्रम शुरू हुआ। धीरे-धीरे हाल यह हुआ कि अन्न, फल, दूध, पानी और सब्जी आदि सभी प्रकार के सामान्यत: उपलब्ध आहार में स्थाई रूप से विष का प्रवेश पक्का होता गया। कीटनाशक रसायन और कृत्रिम खाद आदि के प्रयोग से धरती की स्वाभाविक उर्वरा शक्ति भी प्रभावित हुई। दूसरी ओर विषमुक्त या "आर्गनिकली" उत्पादित आहार (यानी प्राकृतिक या गैर मिलावटी!) जो स्वाभाविक रूप मिलना चाहिए था वह मंहगा और विलासिता का विषय होता गया। इन सबका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि आम आदमी के शरीर की जीवनी शक्ति और उसका प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर पड़ता गया। जीवन शैली भी मनुष्य को शारीरिक श्रम से दूर करती गई। मानव शरीर विभिन्न प्रकार के रोगों के लिए अवसर देने लगा। आज कैसर, हृदय रोग, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जिस तरह बड़े पैमाने पर फैल रहा है वह इसी का प्रमाण दे रहा है।
स्वतंत्र भारत में सामाजिक स्तर पर भी देश की यात्रा विषमताओं से भरी रही। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही रहा कि 'ग्राम स्वराज' का विचार भुलाकर औद्योगिकीकरण और शहरीकरण को ही विकास की अकेली राह चुनते हुए हमने गांवों और खेती किसानी की उपेक्षा शुरू कर दी। यह भारत के स्वभाव के खिलाफ साबित हुआ और गाँव उजड़ने लगे और वहाँ से युवा वर्ग का पलायन शुरू हुआ। शिक्षा और कौशल के अभाव में इन युवाओं की शहरों में खपत ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर के रूप में हुई। बाबूगिरी की तुलना में श्रमजीवी के श्रम का मूल्य कम आंके जाने के कारण मजदूरों की जीवन-दशा दयनीय होती गई और उसका लाभ उद्योगपतियों को मिलता रहा। गरीब मजदूर मलिन बस्तियों में जीवन-यापन करने के लिए बाध्य रहे। इस असामान्यता को भी हमने विकास की अनिवार्य कीमत मान स्वीकार कर लिया। आज लाखों की संख्या में मजदूर शहर छोड़ वापस गाँव की ओर लौट रहे हैं। उन्हें वहीं जीवन की आस दिख रही है। ऐसे में कृषि और ग्राम केंद्रित व्यवस्था को सुदृढ बनाना हमारी आर्थिक नीति की वरीयता होनी चाहिए। गांवों को नगर बनाते जाना विकास की सफल युक्ति साबित नहीं हो सकी और न नगर का इतना विस्तार ही हो सका कि उसमें सबको पर्याप्त अवसर मिल सके। गांवों की परिस्थिति और व्यवस्था को हाशिये से हटाकर हमारी राष्ट्रीय सोच की मुख्यधारा में शामिल करना होगा। उनको समर्थ बनाकर ही देश का विकास हो सकेगा। इसके लिये बाजारकेंद्रित विकास की अवधारणा की सीमाओं को समझना जरूरी है। विकास में बाजार के तर्क को प्रमुखता मिलने से बाजार तंत्र के हावी होता है और उपभोग करने की प्रवृत्ति बढ़ती है। आज महामारी के दौर में भी बाजार की सौदेबाजी चालू है और नफा का व्यापार भी।
सबकुछ बाजार की हद में लाते जाने को ही सभ्यता की निशानी मानने की प्रवृत्ति ने नगरों की व्यवस्था को भी असंतुलित किया। उनपर बढ़ती जनसंख्या के दबाव ने नागरिक सुविधाओं की अपेक्षाओं को बढ़ाया पर उतनी तैयारी और साधन के अभाव में महानगरों की स्थिति बिगड़ती गई। उदारीकरण और निजीकरण के साथ वैश्वीकरण की ओर बढ़ते कदम ने विदेशीकरण को भी बढ़ाया और विचार, फैशन तथा तकनीकी आदि के क्षेत्रों में विदेश की ओर उन्मुखता बढ़ती गई। इसी मानसिकता के अनुकूल हमारी शिक्षा प्रणाली भी पाश्चात्य बाजार प्रधान देशों के मॉडल पर ही टिकी रही। इन सबके बीच आत्म-निर्भरता, स्वावलंबन और स्वदेशी के विचारों को हम नकारते गए। उनको विकास में बाधक मानकर परे धकेल दिया गया।
करोना की महामारी ने यह महसूस करा दिया है कि वैश्विक आपदा के साथ मुकाबला करने के लिये स्थानीय तैयारी आवश्यक है। विचार, व्यवहार और मानसिकता में अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों को पहचान कर उन्हें स्थापित करना पड़ेगा और आचार विचार में जगह देनी पड़ेगी। इस दौर में प्रधानमंत्री मोदी ने 'स्थानीय' के महत्व को रेखांकित किया है और आत्मनिर्भर बनने के लिए देश का आह्वान किया है। आशा है ग्राम स्वराज के स्वप्न को आकार देने का प्रयास नीति और उसके क्रियान्वयन में स्थान पा सकेगा। इसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में भी देश और यहाँ की संस्कृति के लिए प्रासंगिकता पर ध्यान दिया जायगा। जड़ों की उपेक्षा कर वृक्ष स्वस्थ नहीं रह सकता है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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