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नागरिकता कानून हिंसा की लपटें

06/01/2020

नागरिकता कानून हिंसा की लपटें

अवधेश कुमार

नागरिकता संसोधन कानून को आधार बनाकर शुरू हुई आगजनी व हिंसक प्रदर्शन तथा इस पर विपक्षी नेताओं की चुप्पी कई सवालों को जन्म दे रही है। मोदी के खिलाफ नहीं उतरे तो एक दिन दाढ़ी रखने से लेकर बुरका पहनने तक पर रोक लग जाएगी। तथाकथित रहनुमाओं की इस तरह की खतरनाक बातों का उद्देश्य आखिर क्या हो सकता है? क्या इस तरह के भ्रम फैलाकर ये नेता अपना राजनीतिक वनवास खत्म करने के लिए आग से नहीं खेल रहे हैं? इस बार की आवरण कथा इसी के ईर्दगिर्द।

देश को सिर पर उठाने की कोशिश हो रही है। इस कोशिश में हिंसा तो है ही, घृणा है, सांप्रदायिकता है, राजनीति सर्वोपरि है। सवाल वोट बैंक का है। वोट बैंक ने आंखों के सामने इतना अंधियारा पैदा कर दिया है कि अभ्यस्त अपराधियों की तरह हिंसा करने वाले इनको पीड़ित नजर आते हैं और पुलिस का कानून-व्यवस्था के लिए कार्रवाई करना लोकतंत्र का चीरहरण। 15 दिसंबर को दिल्ली के जामिया इलाके से आरंभ हिंसक विरोध प्रदर्शन ने यह संकेत दे दिया था कि इसके पीछे गहरे षडयंत्र हैं लेकिन नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह के विरोध में हमारे नेता अंधे हो गए हैं कि अभी तक एक शब्द भी हिंसा के विरुद्ध नहीं बोला है। किसी नेता का एक ट्विट हिंसा रोकने या न करने की अपील का नहीं है। हां, पुलिस का और सरकार का निंदा अभियान जरुर चल रहा है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो 16 दिसंबर को स्वयं मोर्चा संभालते हुए कोलकाता में विरोध प्रदर्शन किया। जब मुख्यमंत्री सड़क पर उतर जाए तो फिर कैसी स्थिति पैदा हो सकती थी। पूरा कोलकाता शहर जैसे रुक गया। उनकी देखा- देखी तृणमूल के नेताओं ने पूरे पश्चिम बंगाल में इसी तरह विरोध किया। 19 तारीख को नागरिकता कानून के खिलाफ भारत बंद का ऐलान किया गया था। वामपंथी पार्टियों के इस भारत बंद को राजद, सपा, कांग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियों ने अपना समर्थन दिया था। इसके अलावा अलग- अलग संगठनों ने अपने-अपने राज्यों में बंद या विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया थ। कर्नाटक में वाम और मुस्लिम संगठन तो कुछ छात्र संगठनों ने बिहार बंद का आह्वान किया था। उत्तर प्रदेश में भी राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया गया था।

मानवता को शर्मसार करने वाले दृश्य
19 दिसंबर को गुजरात के अहमदाबाद का एक वीडियो आया है जिसमें सैंकड़ों लोग चार-पांच पुलिस वालों पर पत्थरों से हमला कर रहे हैं। वे किसी तरह अपने को बचा रहे हैं। बाद में जब और पुलिस वाले आते हैं तो इनको काबू किया जाता है। उसी तरह बनासकांठा में एक पुलिस वैन को जबरन भीड़ गिराने पर लगी हुई थी। इस तरह की हिंसा पर एक शब्द न बोलना इन नेताओं को केवल राजनीतिक नैतिकता के कठघरे में खड़ा नहीं करता, उनके चेहरे से लोकतांत्रिक आचरण का नकाब भी उतार देता है। शांतिपूर्ण अहिंसक विरोध ताकत है तो हिंसा पुलिस प्रशासन को कार्रवाई का आमंत्रण।

किसी को राज्य या भारत बंद करने में सफलता तो नहीं मिली लेकिन जिस तरह का उत्पात मचाया गया उससे इसकी पुष्टि हो गई कि 15 दिसंबर को की गई हिंसा अचानक प्रस्फुटित नहीं हुई थी। हालांकि जिस तरह का विरोध प्रदर्शन राजधानी दिल्ली में ये राजनीतिक पार्टियां करना चाहती थीं और उससे जो मजबूत संदेश देना चाहती थी उसमें वे सफल नहीं रही। इसका कारण इतना ही था कि गृहमंत्री अमित शाह के निर्देश के बाद पुलिस पहले से ही सक्रिय हो गई थी। राजधानी दिल्ली में लाल किला से जंतर-मंतर तक का मार्च हो, मंडी हाउस से शहीद पार्क तक, या राजघाट से मार्च….पुलिस ने बड़े आराम से लोगों को रोक लिया और उन्हें बसों में बिठाकर जहां-तहां छोड़ा। जामिया, ओखला, न्यू फ्रेंड्स कालोनी, सीलमपुर, जाफराबाद आदि इलाकों में सख्त सुरक्षा व्यवस्था के कारण 18 दिसंबर दोहराया नहीं जा सका। आगे बढ़ने से पहले यह बताना जरूरी है कि खुफिया एजेंसियों ने यह जानकारी दी है कि सीमा पार की एजेंसियों ने भारत में रोहिंग्याओं तथा बांग्लादेशी घुसपैठियों से संपर्क कर उनसे कश्मीर की तर्ज पर पत्थरबाजी, पेट्रोल बमों से हमला और दंगा करने की साजिश रची है।
इस कारण भी पुलिस सतर्क थी। उत्तर प्रदेश प्रशासन ने जगह-जगह धारा 144 लागू किया। ऐसे ही पूर्वोपाय अन्य राज्यों ने भी किया। बावजूद एक समुदाय के लोगों को सड़कों पर उतारने में सफलतांएं मिलीं। अनेक जगह विपक्षी पार्टियां सड़कों पर उतरीं, और हिंसक विरोध प्रदर्शन के अलावा अनेक प्रकार का उत्पात मचाया गया। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जिस ढंग की हिंसा हुई वह जनता के सामान्य आक्रोश का प्रकटीकरण नहीं हो सकता। दो पुलिस चौकियों को जलाना तथा भारी संख्या में वाहनों को फूंक दिया जाना साफ कर रहा था कि हिंसा की पूरी योजना पहले से बनाई गई थी। लखनऊ के डालीगंज और हजरतगंज इलाके में तो ऐसा लगता था मानो पूरा जमात ही अपराधी बन गया है। इलाके में जमकर तोड़फोड़ और पथराव हुआ। मीडिया के कई ओबी वैन को भी आग के हवाले कर दिया। मदेयगंज के बाद ठाकुरगंज स्थित सतखंडा चौकी फूंकी गई।

भ्रम के जरिए भयभीत करने की साजिश
वैसे नागरिकता संशोधन कानून का विरोध ही अनौचित्यपूर्ण एवं अनैतिक है। विरोध पर उतरे लोगों का गुस्सा देखकर साफ हो जाता है कि उनके अंदर गलत बातें फैलाकर डर तथा सरकार के विरोध में गुस्सा पैदा किया गया है। जैसे कोई कहता है कि इस कानून से मुसलमानों की नागरिकता छीन ली जाएगी तो कोई यह कि हमको देश से निकाल दिया जाएगा। जबकि सच यह है कि नागरिकता संशोधन कानून केवल पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफगानिस्तान से धार्मिक रूप से उत्पीड़ित होकर आए हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, ईसाइयों एवं पारसियों को नागरिकता देने के लिए है। बंटवारे के कुछ सालों बाद से लगातार अपने धर्म की रक्षा, स्त्रियों की इज्जत को बचाने के लिए भागकर आने वाले इन लोगों के प्रति भारत का दायित्व है। इन्होंने विभाजन मांगा नहीं था। विभाजन जिन लोगों ने धर्म के आधार स्वीकार किया उनका दायित्व था कि उस पार जो भी गैर मुस्लिम रह गए उनका ध्यान रखे। यह काम पहले होना चाहिए था जिसे अब किया गया है। इसमें मुसलमानों के खिलाफ कुछ होने का कोई कारण नहीं है। भारत एक सेक्यूलर देश है। यहां हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी…..सभी को नागरिक के नाते अपनी उपासना पद्धति के साथ पूरी गरिमा और सम्मान के साथ रहने का अधिकार संविधान देता है। इसे कोई छीन नहीं सकता। भारत की नागरिकता छीनने की तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। किंतु यही दुष्प्रचार किया गया है। मजे की बात देखिए कि विरोधियों के नेताओं से पूछिए कि नागरिकता कानून में क्या है जिसका वो विरोध कर रहे हैं तो वे एनआरसी पर बात करने लगते हैं। एनआरसी की अभी प्रक्रिया शुरू भी नहीं हुई है। जाहिर है, कुत्सित राजनीति के हथियार के तौर पर विरोध के अधिकार का खतरनाक इस्तेमाल किया जा रहा है। किसी एक समुदाय को इस तरह भड़का देने का परिणाम देश के लिए कभी अच्छा नहीं हो सकता।

चौकी के बाहर खड़े वाहनों को भी फूंक दिया गया। खदरा इलाके में भी तोड़फोड़ और आगजनी हुई और यहां उपद्रवियों ने कई गाड़ियों में आग लगा दी। परिवर्तनगंज भी एक समय पुलिस प्रशासन के नियंत्रण से निकल चुका था। संभल में बस के साथ कई गाड़िया फूंकी गई। केरल से लेकर कर्नाटक, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली …सब जगह विरोध का असर दिखा। यह विचार करने वाली बात है कि आखिर नागरिकता संशोधन कानून को लेकर इस तरह के विरोध को किस तरह देखा जाए? 15 दिसंबर को दिल्ली में हुई भयानक हिंसा तथा विरोध ने इसका संकेत दे दिया था कि कहने के लिए विरोध नागरिकता कानून का है लेकिन इरादा कुछ और है। बड़े-बड़े पत्थर, आग लगाने की सामग्रियां, तोड़-फोड़ और हमले के लिए बड़े-बड़े डंडे, पेट्रोल बम, ट्यूब लाइटें आदि विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ मिनट में नहीं आ सकता। जाहिर है, कुछ समय पहले से आगजनी और हिंसा की तैयारी की गई थी।
दिल्ली में 20-25 मिनट में छ: बसों का फूंक दिया जाना अभ्यस्त अपराधियों का ही कार्य हो सकता है। भीड़ ने लोगों के घरों पर भी पत्थर फेंके। उसके दो दिनों बाद सीलमपुर एवं जाफराबाद में जिस तरह की हिंसा हुई वह भी पूर्व तैयारी की ही परिणति थी। बच्चों से भरी बस को रोककर तोड़फोड़ का दृश्य देश ने देखा है। पुलिस वालों को पीटते हुए वीडियो भी सामने है। पूरे देश में हिंसा और विध्वंस की संबंधित राज्यों की पुलिस जांच कर रही है और उम्मीद है साजिश के चेहरों की पहचान होगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह घोषणा बिल्कुल उचित है कि जिसने भी हिंसा की है उनको पकड़ेंगे और उनकी संपत्तियां जब्त कर,बेच कर सरकारी सपंत्तियों के हुए नुकसान की भरपाई करेंगे। ऐसे हिंसक, उपद्रवी तत्वों के साथ यही होना चाहिए।
आप किसी स्थान पर हो रहे विरोध पर नजर गड़ा लीजिए आपको अहसास हो जाएगा कि इसे प्रायोजित किया गया है। स्वत: स्फूर्त विरोध उत्तर पूर्व में अवश्य हुआ था। हालांकि वहां भी जिन लोगों ने विरोध का आह्वान किया था उन्हें भी समझ में नहीं आया कि इतनी हिंसा और आगजनी किसने की खासकर असम में। लेकिन जैसा आरंभ में कहा गया इसका सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है भारत के नेताओं का व्यवहार। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन एक स्वाभाविक स्थिति है। शांतिपूर्ण विरोध से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। उसकी आवश्यकता- अनावश्यकता, तार्किकता-अतार्किकता, सही-गलत पर तो बहस हो सकती है लेकिन न उससे भय पैदा होगा न उसकी निंदा की आवश्यकता होगी। अगर कोई लोकतांत्रिक विरोध का मायने यह समझता है कि उसे कुछ भी करने का अधिकार है। यानी पुलिस पर पत्थरों की, ट्यूबलाइटों जैसे घायल करने वाले शीशे की सामग्रियां और यहां तक कि पेट्रोल बम फेंकने का तो फिर अपराध और सत्याग्रह में अंतर क्या रह जाएगा? उस पर तुर्रा यह कि आप हिंसा करें तो सही और पुलिस आपके साथ अपनी जिम्मेवारी के तहत कठोरता बरते तो वह बर्बर! जामिया मिलिया इस्लामिया में पुलिस के घुसने तथा छात्रों को पीटने को लेकर देश भर में तूफान खड़ा करने की कोशिश हुई है। लेकिन वह वीडियो सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है जिसमें पुलिस जामिया के गेट नं. सात और छ: के बीच खड़ी होकर लाउडस्पीकर से अपील कर रही है कि बच्चों आपलोग पत्थर, शीशा आदि हम पर न फेंके, हम आपकी सुरक्षा के लिए हैं।
आपके बीच अगर बाहरी लोग हैं तो उनका साथ न दें। लंबे समय तक पुलिस अपने ऊपर हमले झेलते हुए अपील कर रही है। बावजूद यदि पत्थरों, शीशों से हमला होता रहे तो पुलिस फूल का माला पहनाने नहीं जाएगी। वह भी उस स्थिति में जब बाहर कुछ ही दूरी पर बसें जल रहीं हो, गाड़ियां तोड़ी गईं हों…। उसके बाद पुलिस हमला करने वालों को खदेड़ते हुए अंदर घुसी और उसमें यह व्यावहारिक है कि दोषी के साथ निदोर्षों पर भी गुस्सा उतरा होगा। अपराधियों का समूह अपराध करके यदि विश्वविद्यालय में घुसेगा तो पुलिस उसका पीछा करते हुए किसी शिक्षण संस्थान के दरवाजे पर खड़ी होकर प्रवेश की अनुमति की प्रतीक्षा नहीं कर सकती। वह अंदर जाएगी। अब पुलिस का कहना है कि वो लगातार विश्वविद्यालय के प्रोक्टर के साथ संपर्क में थे।
यह तो स्पष्ट हो रहा है कि दिल्ली के शाहिन बाग से लेकर ओखला, न्यू फ्रेंडस कॉलोनी, जामिया नगर आदि में 15 दिसंबर को हिंसा करने वाले ऐसे लोग छात्रों के विरोध प्रदर्शन में शामिल थे। हो सकता है कुछ छात्र भी इसमें हों। जामिया की उप कुलपति नजमा अख्तर का कहना है कि पुलिस बिना अनुमति अंदर नहीं प्रवेश करती। इसे सहन नहीं किया जाएगा। हम भी मानते हैं कि विश्वविद्यालय परिसरों में पुलिस को सामान्यत: प्रवेश नहीं करना चाहिए। किंतु ऐसा कोई कानून नहीं है जो पुलिस के प्रवेश का निषेध करता हो। वह भी उस स्थिति में जब भयानक हिंसा और आगजनी करने वालों के विश्वविद्यालय परिसर में छिपे होने की आशंका हो। मोहतरमा अख्तर क्या इस बात की गारंटी लेंगी कि उनके विश्वविद्यालय परिसर में अपराधी, हिंसक जेहादी जैसे अवांछित तत्व नहीं जाते? पुलिस आंसू गैस के गोले छोड़ रही हो तो इसका मतलब है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर थी। हालांकि जितने छात्र हिरासत में लिए गए थे वो सब बाद में रिहा भी कर दिए गए। लेकिन हमारे देश के महान नेतागण जामिया विश्वविद्यालय में पुलिस की कार्रवाई की तुलना जालियांबाल बाग में जनरल डायर के गोली चालन से कर रहे हैं।

नागरिकता संसोधन कानून में
नागरिकता देने का प्रावधान है,
लेने का नहीं। यह किसी की भी नागरिकता
नहीं छीनता। विपक्ष संशोधित नागरिकता
अधिनियम को लेकर झूठा अभियान चला रहा
है और हिंदू-मुसलमानों के बीच खाई पैदा कर
रहा है। – अमित शाह

कैसी त्रासदी है। इतने के बावजूद पुलिस की ओर से एक भी गोली नहीं चली, जबकि गोली चलाने की परिस्थितियां पैदा हो गईं थी। काफी पुलिस वाले और अग्निशमन विभाग के कर्मी घायल हुए। उनकी चिंता हमारे नेताओं को नहीं है। प्रियंका बाड्रा इंडिया गेट पर जामिया में पुलिस कार्रवाई के विरोध में धरने पर बैठ गईं। उनके साथ कांग्रेस के अनेक बड़े नेता थे। जिस समय न्यू फ्रेंड्स कौलोनी में हिंसा हुई वो वहां के अपने घर में थीं। वहां से निकलते समय टीवी कैमरों की नजर उनकी ओर पड़ी। पत्रकारों ने प्रतिक्रिया लेनी चाही पर वो कार का शीशा तक खोलने को तैयार नहीं हुईं। लखनऊ के नदवा कॉलेज के छात्र किस तरह अंदर से पुलिस पर पत्थरों से हमला कर रहे थे वह दृश्य किसने नहीं देखा होगा। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के डरावने दृश्य को कौन भूल सकता है। वहां पांच दर्जन से ज्यादा लोग घायल हुए जिसमें पुलिस वाले भी थे।
जाधवपुर विश्वविद्यसालय में तो सरकारी संरक्षण में ही हंगामा मचा हुआ था। क्या इस दुर्भाग्यपूर्ण सच को नजरअंदाज किया जा सकता है कि विरोध के किसी नेता ने एक बार भी हिंसा न करने की न अपील की है और न उसकी निंदा ही? सोनिया गांधी के नेतृत्व में 18 दिसंबर को विपक्ष के नेता राष्ट्रपति से मिलने गए और पुलिस हिंसा की जांच की मांग की। उन्होंने नागरिकता कानून वापस लेने के लिए सरकार से कहने की भी मांग की। बाहर आने पर बयान भी दिया। पर उपद्रवियों और जेहादी तत्वों की हिंसा के विरुद्ध एक शब्द नहीं। आप अगर अपराधियों, उपद्रवियों, जेहादियों की हिंसा की निंदा नहीं करते तो परोक्ष रूप से उनको प्रोत्साहित करते हैं। अगर सरकार का विरोध करते हुए भी ये हिंसक तत्वों के खिलाफ एकजुटता दिखाते तो शायद दूसरी जगह इसका असर होता।
तो यह क्यों न माना जाए कि ये नेतागण चाहते हैं कि नागरिकता कानून के विरोध के नाम पर स्थिति सरकार के नियंत्रण से बाहर जाए और उनके लिए राजनीति करने का आधार बने? यह सच है कि पहले दिन से ही नरेन्द्र मोदी सरकार को मुस्लिम विरोधी छवि देने की कोशिश होती रही है। इसके सबूत के लिए असहिष्णुता, पुरस्कार वापसी, मॉब लिंचिंग जैसे अभियान हमें याद रखना होगा। अब इस एक मानवीयता और स्वाभाविक जिम्मेवारी वाले कानून को मुसलमान विरोधी बताकर पूरे देश में सांप्रदायिक माहौल बनाने का खेल चल रहा है। मुसलमानों के एक वर्ग के अंदर दुर्भाग्य से किसी न किसी तरह की आशंका सरकारों को लेकर मन में रही है। उनके कुछ नेता हमेशा बताते रहते हैं कि भारत की सरकारें मुसलमानों के साथ अन्याय करती रहीं हैं। मोदी के आने के बाद यह झूठ ज्यादा आक्रामकता से फैलाया गया है।

मैं भारत के सभी नागरिकों को
विश्वास दिलाना चाहता हूं कि
नागरिकता संशोधन एक्ट किसी
भी धर्म के नागरिक को प्रभावित नहीं करता है।
किसी भी भारतीय को इस एक्ट के बारे में चिंता
करने की जरूरत नहीं है। ये सिर्फ उनके लिए
है जिन्होंने बाहर के देश में जुल्म झेला है और
भारत के अलावा उनके लिए कोई जगह
नहीं है। – प्रधानमंत्री मोदी

एक साथ तीन तलाक के विरुद्ध कानून को शरियत विरोधी बताकर भड़काया गया लेकिन कुछ नहीं हुआ। उसके बाद अनुच्छेद 370 हटाने को भी मुलसमानों के खिलाफ बताया गया। लोग सड़कों पर नहीं आए। अयोध्या का फैसला हो गया जिसका कुछ नेताओं ने सार्वजनिक विरोध किया एवं उच्चतम न्यायालय तक की निंदा की। भड़काने की पूरी कोशिश हुई। बावजूद इसके शांति कायम रही। नागरिकता कानून और इसके बाद एनआरसी लाने की घोषणा ने इनको अवसर दे दिया कि लोगों के अंदर नागरिकता छीनने और ट्रांजिट कैम्प में रखने या बाहर निकाले जाने का भय पैदा करके कोहराम मचा दो। देश में एक ऐसा वर्ग है, जिसे वामपंथी उदारवादी प्रगतिशील जो भी कह दें, मोदी सरकार की छवि कलंकित करने तथा विश्व स्तर पर इसे मुस्लिम विरोधी, अनुदार, सांप्रदायिक फासीवादी साबित करने के लिए किसी सीमा तक जाने को तैयार है। वह इसे फिर एक अवसर के रूप में देखकर उतर गया है।

नागरिकता संशोधन विधेयक देश
के किसी भी नागरिक पर लागू
नहीं होता। ये देश जितना हिन्दुओं का है उतना
ही मुस्लिमों का भी है, मक्का के बाद सबसे
पुरानी मस्जिद केरल के कोच्चि में है। कांग्रेस
केवल राजनीतिक कारणों से टुकड़े-टुकड़े गैंग
के साथ खड़ी है और हिंसा को बढ़ावा दे रही है।
– रविशंकर प्रसाद

मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में उतरे फिल्मी कलाकारों से लेकर अलग-अलग शहरों में चिन्हित बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, एक्टिविस्टो, वकीलों, एनजीओ मालिकों को आप आसानी से पहचान सकते हैं। दूसरी ओर ऐसे मुस्लिम नेता हैं जिनकी राजनीति का पूरा आधार ही मजहबी है। इनमें केवल असदुद्दीन ओवैसी नहीं है। उनकी संख्या काफी है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के एक विधायक अमानतुल्ला खान तथा कांग्रेस के एक पूर्व विधायक मोहम्मद आसिफ के भाषणों का वीडियो उपलब्ध हो गया है। उसमें वे यहां तक डरा रहे हैं कि मोदी के खिलाफ नहीं उतरे तो एक दिन तुमको दाढ़ी रखने से लेकर बुरका पहनने तक पर रोक लग जाएगी। इस तरह की खतरनाक बातों का उद्देश्य क्या हो सकता है? यह बात छिपी नहीं है कि भारी संख्या में मुस्लिम युवाओं को रैडिकलाइज किया जा चुका है। उनके अंदर कट्टरपंथी विचार इतना घर करा दिया गया है कि वे मजहब के नाम पर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं।
हिंसा में उनकी भूमिका को कोई नकार नहीं सकता। जो लोग पकड़े जा रहे हैं उनके ऐसे लोग शामिल है जिनका कोई न कोई आपराधिक रिकॉर्ड है। इसीलिए कहना पड़ता है कि हमारे नेतागण अपना राजनीतिक वनवास खत्म करने के लिए आग से खेल रहे हैं। एक बार आग लगा देने के बाद बुझाना कठिन हो जाता है। हालांकि इससे देश के बहुमत के अंदर भी गुस्सा पैदा हो रहा है। कारण, बहुमत इस कानून के साथ है। संभव है इस तरह के राजनीतिक विरोध, हिंसा एवं दंगों के समानांतर कानून के समर्थक भी सड़कों पर उतरने लगें।


 
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