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संवैधानिकता पर तार्किक बहस की जरूरत

21/02/2020

मनोज ज्वाला

इन दिनों देश में संविधान के प्रति विभिन्न प्रकार के
विमर्श छिड़े हैं। कोई समूह यह प्रचारित
करने में जुटा हुआ है कि संविधान के समक्ष भाजपा सरकार की नीतियों से
खतरा उत्पन्न हो गया है तो कोई संविधान को उन कथित खतरों से बचाने में डटा है। कोई समूह किसी कानून को असांवैधानिक बताने के
लिए धरना-प्रदर्शन करने में लगा हुआ तो कोई संवैधानिक
प्रावधानों को परिभाषित करने में लगा है। किन्तु क्या संवैधानिक और क्या असंवैधानिक है, कोई कानून क्यों संवैधानिक और कोई
अधिनियम क्यों असंवैधानिक है; इसपर तार्किक बहस-विमर्श नहीं हो रहा है। क्योंकि विरोध और धरना-प्रदर्शन करने वाले
समूह का सूत्र-संचालन उन लोगों के हाथों में है जो असल में संविधान लागू
होने के साथ ही संविधान के नाम पर मनमानी करते आ रहे
हैं। आज भी अपनी मनमानी को ही संवैधानिकता बनाम असंवैधानिकता के
निर्धारण का मापदण्ड बनाने की जबर्दस्ती पर तुले हैं।

सच यह है कि ‘इण्डिया दैट इज भारत का संविधान’ देश के 389 प्रतिनिधियों की संविधान सभा के सिर्फ 284 सदस्यों ने स्वयं को ही ‘हम भारत के लोग’ बताते हुए अपने हस्ताक्षर से
आत्मार्पित किया हुआ है। गौर करने वाली बात है कि हिन्दू-मुस्लिम नामक
धर्म व मजहब के आधार पर देश का बंटवारा कर हमारी मातृभूमि के 30 फीसदी भू-भाग
में मुस्लिम राष्ट्र बना देने वालों की ‘संविधान सभा’ द्वारा उक्त विभाजन
के बावजूद शेष भू-भाग पर स्वतः हिन्दू-राष्ट्र बने रहने की स्वाभाविकता
को जबरिया नकार देने की मनमानी की गई। फिर भी देश की जनता ने संविधान सभा की मनमानी को स्वीकार करते हुए सन् 1950 में संविधान को आत्मसात कर लिया।

उसी संविधान के तहत 540 सदस्यों की लोकसभा और 250 सदस्यों की राज्यसभा वाली संसद का गठन हुआ। इसके द्वारा जो कानून बनाये गए उसे देश की जनता ने स्वीकार कर बहुदलीय
प्रजातंत्र को अपनाया। फिर सन 1976 में जब सारे विपक्षी दलों के
नेता-कार्यकर्ता जेलों में कैद थे और संसद की ये दोनों
विधायी-सभायें प्रजातंत्र का गला दबा चुकी कांग्रेस की मुट्ठी में थीं, तब संसद ने संविधान में
‘सेक्युलर’ शब्द जोड़कर भारत को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित कर दिया। इसे भी देश की जनता ने सांवैधानिक प्रावधान मानकर चुपचाप
स्वीकार कर लिया।

इसी तरह कांग्रेस द्वारा समय-समय पर और भी अनेक
वाजिब-गैरवाजिब कानून बनाये जाते रहे, जिनकी वैधानिकता पर कभी सवाल नहीं उठाया गया। किन्तु अब वही कांग्रेस
जब देश की केन्द्रीय सत्ता से बेदखल होकर पुनः सत्तासीन होने का सपना
देख रही है, 2019 में विपक्ष की उपस्थिति से युक्त संसद की
दोनों सभाओं के बहुमत से बने नागरिकता संशोधन कानून को असंवैधानिक
बता रही है। संवैधानिकता व असंवैधानिकता को जरूरत के हिसाब से
परिभाषित करते रहने वाली कांग्रेस के इशारे पर उसके कारिन्दों का एक समूह
इस कानून के विरोधस्वरूप जहां-तहां तोड़फोड़ व आगजनी करता फिर रहा है। तो
एक समूह दिल्ली के शाहीनबाग में सड़क जाम को अंजाम दिए हुए है। ऐसे में यह विचारणीय है कि संविधान है क्या और इसकी भावना आखिर क्या है?

मालूम हो कि जिस संविधान से हम शासित हो रहे हैं वह असल में
ब्रिटिश पार्लियामेण्ट द्वारा भारत को शासित करने के बाबत समय-समय पर
पारित कानूनों यथा- ‘इण्डिया काऊंसिल ऐक्ट- 1861’ तथा ‘भारत शासन
अधिनियम- 1935’ और ‘कैबिनेट मिशन प्लान- 1946’ एवं ‘इण्डियन इंडिपेण्डेन्स
ऐक्ट- 1947’ का संकलन है। इस संकलन को ही स्वतंत्र भारत के
संविधान का जामा पहनाने के निमित्त ब्रिटेन की सरकार के निर्देशानुसार
तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय बावेल ने बी.एन. राव नामक आई.सी.एस. अधिकारी
को संविधान-सभा का परामर्शदाता नियुक्त कर रखा था। उस ब्रिटिश नौकरशाह
ने ब्रिटिश योजना के तहत संविधान का जो प्रारूप तैयार किया, उसे ही
संविधान सभा ने थोड़ा-बहुत वाद-विवाद कर स्वीकार कर लिया। भारत के
सामान्य लोगों से संविधान की पुष्टि भी नहीं करवायी गयी। बल्कि
संविधान में ही धारा 384 सृजित कर, उसी के तहत इसे ‘हम भारत के लोगों’
पर थोप दिया गया। बावजूद इसके संविधान सभा के 389 बनाम 284 सदस्यों के निर्णय को ‘हम भारत के लोग’ आत्मसात किये हुए हैं। 

जाहिर है जिन 284 लोगों ने स्वयं को ‘हम भारत के लोग’ बताते हुए
अपने हस्ताक्षरों से इसे देश के नाम आत्मार्पित किया हुआ है उनकी
जो भावना रही होगी, वही ‘इण्डिया दैट इज भारत’ के इस संविधान की मूल भावना
हो सकती है; अर्थात ब्रिटिश कानूनों के तहत शासन-व्यवस्था कायम करने और
उस व्यवस्था से निर्मित सत्ता का सुख भोगने के सिवाय उनकी दूसरी कोई
भावना थी ही नहीं; अन्यथा यह संविधान भारत की सनातन परम्पराओं से
निर्मित हुआ होता। यह संविधान धर्म व मजहब के आधार पर विभाजित होकर ‘अवशेष भारत’ की भावनाओं को अभिव्यक्त करने की युक्ति नहीं क्योंकि बाद में इससे ‘धर्मनिरपेक्षता’ नाम का प्रावधान जोड़ दिया गया। संविधान बनाने और इसे आत्मार्पित करने वालों ने
जब धर्म व मजहब के आधार पर देश का विभाजन कर दिया तब शेष भारत को
धर्मनिरपेक्ष बनाने का औचित्य क्या रह गया? इसके बावजूद संविधान के दायरे में भी देखें तो धर्मनिरपेक्षता का जो
प्रावधान किया गया है, निहायत असांवैधानिक है; क्योंकि यह एक
संशोधन के जरिये संविधान से तब जोड़ा गया जब संसद में विपक्ष की
उपस्थिति नहीं थी; जबकि इसे जोड़ने वाले लोग संविधान के मूल तत्व
अर्थात प्रजातंत्र का ही गला दबाये हुए थे।

ऐसे में सवाल उठता है
कि जब महज 284 लोगों द्वारा स्वीकार किये गए संविधान को पूरा भारत
आत्मसात कर सकता है तथा विपक्ष की अनुपस्थिति व प्रजातंत्र की बर्खास्तगी के दौरान संविधान से जोड़ी गई
धर्मनिरपेक्षता को सांवैधानिक प्रावधान मानने से इनकार नहीं किया जा सकता तो यह नागरिकता संशोधन कानून किस आधार पर
असांवैधानिक हो गया? इस सवाल का जवाब इस कानून का विरोध करने
वाले व्यक्ति, समूह या दल के पास नहीं है। कांग्रेस जिस मनमाने ढंग से संविधान में धर्मनिरपेक्षता
का प्रावधान कर मनमानी करती रही है, उसी तरह अब संवैधानिकता व
असंवैधानिकता का भी मनमाना राग अलाप रही है। कांग्रेस
द्वारा प्रजातंत्र का गला घोंट कर संविधान में ‘धर्मनिरपेक्षता’ नाम का
जो प्रावधान जोड़ा गया है सो अगर सांवैधानिक है तो भरी संसद में
पक्ष-विपक्ष के बीच हुए बहस-विमर्श के पश्चात नियमानुसार निर्मित
नागरिकता संशोधन कानून असांवैधानिक कैसे हो सकता है? यह कानून भी उतना ही संवैधानिक है जितना कि कोई दूसरा कानून।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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