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फीकी पड़ती नेताओं की बायोपिक

13/11/2019

फीकी पड़ती नेताओं की बायोपिक


रसे से तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता पर फिल्म बनाने की कोशिश हो रही है। हर बार उसमें कोई न कोई अड़चन आ जाती है। हालिया सुगबुगाहट यह है कि कंगना रानाउत को केंद्रीय भूमिका में लेकर एक नई कोशिश रंग ले रही है। सफल हो पाएगी या नहीं, यह बाद की बात है। फिलहाल यही बात गले नहीं उतर पा रही है कि छोटे कद की दुबली पतली कंगना जयललिता के रूप में कितनी फिट बैठ पाएंगी? राजनीतिक शख्सियत को छोड़ दिया जाए तो भी फिल्मी स्वरूप में जयललिता खासी गोल मटोल रही थीं। बहरहाल, यह फिल्म अगर बन पाती है तो भी आम दर्शकों के बीच स्वीकार्य हो पाएगी? जयललिता भले ही कितनी भी लोकप्रिय क्यों न रही हों, उन पर बनी बायोपिक उतना ही दुलार बटोर पाए, इसकी संभावना कम है। इसका कारण है। पिछले कुछ समय में कई ख्याति प्राप्त नेताओं पर बायोपिक बनी है। कुछ विवादास्पद भी हुईं लेकिन बॉक्स आॅफिस पर उनका हश्र बेहद खराब रहा है। ज्यादातर फिल्मों के लिए अपनी लागत निकाल पाना भी संभव नहीं हो पाया। ऐसा क्यों? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदा लोकप्रियता को देखते हुए उन पर हिंदी व गुजराती में बनी फिल्में सुपरहिट हो जानी चाहिए थीं। नहीं हुईं। 2014 के आम चुनाव के तत्काल बाद अभिनेतासांसद परेश रावल ने मोदी पर फिल्म बनाने की पहल की थी। मुख्य भूमिका भी वे ही करने वाले थे। लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पाई।

यह अपने आप में विचित्र स्थिति है कि विदेशी फिल्म ‘गांधी’ को छोड़ कर गांधी जी से जुड़े प्रसंगों या उनके विचारों का प्रसार करने वाली फिल्मों में से एक ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ को छोड़ कर किसी को भी विशेष चर्चा के लायक तक नहीं माना गया। अन्य नेताओं पर बने बायोपिक का हाल तो और भी बुरा है।

परेश रावल का हालांकि दावा है कि प्रोजेक्ट अभी जिंदा है। यह अलग बात है कि मोदी पर गुजराती और हिंदी में बनी फिल्मों की नाकामी के बाद वे कुछ समय और इंतजार करें, शायद 2024 के चुनाव तक। मोदी की ही तरह एक समय नंदमुरि तारक रामराव का आंध्र प्रदेश की राजनीति में जलवा था। बस फर्क यह है कि रामराव उर्फ एनटीआर फिल्मी लोकप्रियता के बल पर राजनीति में प्रस्थापित हुए थे। पिछले साल एनटीआर पर तेलुगू में फिल्म बनी ‘कथानायकुडु’, एनटीआर की भूमिका उनके बेटे नंदमुरि बालकृष्ण राव ने की। दो हिस्सों में बनी इस फिल्म को विद्या बालन, राना डग्गूबाती व जिशू सेनगुप्ता का सहारा भी डूबने से बचा नहीं पाया। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की जीवनी पर पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता संजय राउत ने फिल्म बनाई ‘ठाकरे’। मराठी व हिंदी में बनी इस फिल्म में बाल ठाकरे बने नवाजुद्दीन सिद्दीकी। फिल्म 1993 तक के घटनाक्रम पर थी। आगे का किस्सा दूसरे भाग में आएगा, लेकिन कब, यह किसी को पता नहीं है। संजय राउत इन दिनों जॉर्ज फर्नांडीज पर फिल्म बनाने को लेकर गंभीर हैं। फिल्म पचास के दशक से लेकर 1975 में इमरजेंसी लगने तक के समय काल में जॉर्ज का संघर्ष दिखाएगी। संजय राउत की मानें तो सुजित सरकार हिंदी व मराठी में बनने वाली इस फिल्म का निर्देशन करेंगे। मौलाना अबुल कलाम आजाद पर बनी फिल्म कब आई और कब चली गई, पता ही नहीं चला। यही हाल बांग्ला में बनी ममता बनर्जी की वृत्त शैली की बायोपिक का भी हुआ।

विवादास्पद हो जाने के बाद भी राजनेताओं पर बनी कुछ फिल्में लोकप्रिय नहीं हो पाईं। ताजा उदाहरण है, ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’, जो मनमोहन सिंह के दस साल के प्रधानमंत्रित्व काल पर कटाक्ष थी और ‘इंदू सरकार’ जिसमें आपातकाल के 1975 से 1977 तक के घटनाक्रम का चित्रण था। राजनीतिक शख्सियतों पर फिल्में हालांकि पहले भी बनीं। 1993 में केतन मेहता के निर्देशन में बनी ‘सरदार’में 1945 से 1950 तक सरदार वल्लभ भाई पटेल की राष्ट्रीय भूमिका को रेखांकित किया गया था। परेश रावल ने पटेल की भूमिका में अपने करिअर का शानदार अभिनय जरूर किया पर फिल्म नाकाम रही। 2000 में डाक्टर जब्बार पटेल ने डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर पर अंग्रेजी में फिल्म बनाई। महाराष्ट्र सरकार और सामाजिक न्याय व सशक्तिकरण मंत्रालय के पैसे से बनी इस फिल्म में केरल के सुपर स्टार मम्मूटी आंबेडकर बने थे। फिल्म कायदे से रिलीज ही नहीं हो पाई। 2004 में श्याम बेनेगल ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर फिल्म बनाई। फिल्म में चित्रित कुछ दृश्यों पर बवाल हुआ। फारवर्ड ब्लाक को नेताजी की आस्ट्रियन युवती एमिली शेंकी से 1937 में शादी और 1945 के विमान हादसे में नेताजी की मौत जैसे तथ्य हजम नहीं हुए। विरोध में उन्होंने कोलकाता में फिल्म का प्रीमियर नहीं होने दिया। फिल्म को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समीक्षकों की सराहना तो खूब मिली लेकिन दर्शक नहीं मिले। इसी साल आई फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में हुई मौत के रहस्य पर से परदा उठाने का दावा किया गया था।

इन तमाम फिल्मों की नाकामी से यह बात तो साबित हो जाती है कि राजनीति या राजनीतिक हस्तियों पर बनी फिल्में आम दर्शकों को उद्वेलित नहीं कर पातीं। वजह दो हैं। एक तो नेताओं की बायोपिक तथ्यों की बजाए संबंधित हस्तियों के महिमा मंडन पर ज्यादा केंद्रित रही हैं।

फिल्म कुछ भी साबित नहीं कर पाई। इन तमाम फिल्मों की नाकामी से यह बात तो साबित हो जाती है कि राजनीति या राजनीतिक हस्तियों पर बनी फिल्में आम दर्शकों को उद्वेलित नहीं कर पातीं। वजह दो हैं। एक तो नेताओं की बायोपिक तथ्यों की बजाए संबंधित हस्तियों के महिमा मंडन पर ज्यादा केंद्रित रही हैं। दूसरे, इस तरह की ज्यादातर फिल्में किसी संस्था, ट्रस्ट या सरकार के पैसे से बनी हैं। ऐसे में उन फिल्मों से जुड़े लोगों पर किसी तरह का व्यावसायिक दबाव नहीं रहता। ऐसी फिल्मों को योजनाबद्ध तरीके से रिलीज भी नहीं किया जाता। 1982 में बनी रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’अगर अपवाद रही तो इसलिए कि उसे भव्यता से लागत की परवाह किए बिना बनाया गया था और बनने के बाद उसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय बाजार मिल गया। उसका हिंदी संस्करण तो भारतीय बाजार में सामान्य समर्थन ही पा सका। 2006 में राज कुमार हिरानी के निर्देशन में बनी ‘लगे रहे मुन्ना भाई’ में एक अपराधी के गांधीगीरी अभियान को लोकप्रियता जरूर मिली लेकिन कई गांधीवादियों ने फिल्म में गांधी जी के अधकचरे चित्रण पर एतराज भी उठाया। महात्मा गांधी के सत्य के प्रति आग्रह को सांकेतिक रूप से गांव के एक बच्चे के माध्यम से उठा कर विजय भट्ट ने 1962 में एक फिल्म बनाई ‘बापू ने कहा था’। वह सफल नहीं हो पाई। गांधी जी पर फिल्म बनाने की कई बार कोशिश हुई। मूक दौर में कांजीभाई जे राठौड़ के निर्देशन में बनी फिल्म ‘भक्त विदुर’ को 1921 में ब्रिटिश सरकार ने इस आधार पर प्रतिबंधित कर दिया कि फिल्म में विदुर के बहाने गांधी जी का महिमा मंडन किया गया है।

ब्रिटिश राज में प्रतिबंधित होने वाली यह पहली फिल्म थी। इसी तरह का आरोप ब्रिटिश सेंसर बोर्ड ने वी शांताराम की फिल्म ‘महात्मा’ पर भी लगाया। लिहाजा फिल्म का शीर्षक बदल कर ‘धर्मात्मा’ कर दिया गया। 1953 में दत्ता धर्माधिकारी ने महात्मा शीर्षक को जीवंत किया। हिंदी, मराठी व अंग्रेजी में बनी इस फिल्म में गांधीजी के आदर्शों से प्रभावित एक स्वतंत्रता सेनानी के माध्यम से गांधी जी को श्रद्धांजलि दी गई थी। महात्मा गांधी पर सबसे ज्यादा तथ्यात्मक फिल्में दो बनीं। एक 1996 में श्याम बेनेगल ने ‘गांधी से महात्मा तक’ बनाई। यह दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के दो दशक के संघर्ष पर केंद्रित थी। फिल्म को समीक्षकों के बीच सराहना तो खूब मिली लेकिन व्यावसायिक सफलता नहीं मिल पाई। व्यावसायिक फिल्मों के प्रतिष्ठित अभिनेता अनिल कपूर ने बतौर निर्माता 2007 में फिल्म बनाई ‘गांधी माय फादर’। फिरोज अब्बास खान ने फिल्म का निर्देशन किया था।

महात्मा गांधी और उनके बड़े बेटे हरिलाल गांधी के बीच के तनावपूर्ण रिश्ते उभारने वाली इस फिल्म को पुरस्कार तो खूब मिले लेकिन उसकी तुलना में दर्शक नसीब नहीं हो पाए। 2005 में जाहनु बरुआ के निर्देशन में बनी फिल्म ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ में एक रिटायर्ड और मानसिक रूप से अस्थिर प्रोफेसर इस ग्रंथि में उलझा रहता है कि उसने गांधी जी को मारा है। करीब दो दशक पहले कमल हासन ने फिल्म बनाई ‘हे राम’। फिल्म के नायक की पत्नी से मुसलमान बलात्कार कर उसकी हत्या कर देते हैं। महात्मा गांधी को मुस्लिमों का हितैषी मान कर वह गांधी जी की हत्या की साजिश रचने वालों से मिल जाता है लेकिन अंत में उसे अपनी गलती का अहसास होता है। पांच साल पहले ए बालाकृष्णन ने रोचक परिकल्पना कर तमिल में फिल्म बनाई। ‘मुदालवर महात्मा’। इसमें निधन के साठ साल बाद गांधी जी सत्याग्रह आंदोलन चलाने आते हैं और विचित्र स्थितियों में उलझ कर रह जाते हैं। इन तमाम फिल्मों की असफलता से यह संकेत तो मिलता है कि गांधी जी के पूजने के अलावा आम लोगों में उनके बारे में जानने की रुचि नहीं है।


 
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