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किसान विरोधियों के दुर्वासा थे स्वामी सहजानंद सरस्वती

21/02/2020

22 फरवरी स्वामी सहजानंद सरस्वती जयंती पर विशेष
सुरेंद्र किशोरी
22 फरवरी 1889 को महाशिवरात्रि के दिन उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिला के देवा गांव में जुझौटिया ब्राह्मण बेनी राय के घर जब सोहर गूंजने लगा तो किसी को पता नहीं था कि बेनी राय का यह पुत्र न केवल देश में किसान आंदोलन की शुरुआत करेगा बल्कि मां भारती को अंग्रेजों की बेड़ी से मुक्त करने में भी अमूल्य योगदान देगा। इस बालक ने आदि गुरु शंकराचार्य को अपना गुरू बनाया और स्वामी सहजानंद सरस्वती के रूप में अपना नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षर से दर्ज करवा लिया।
आदि शंकराचार्य सम्प्रदाय के दसनामी संन्यासी अखाड़ा के दण्डी संन्यासी स्वामी सहजानन्द सरस्वती न केवल भारत के राष्ट्रवादी नेता एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। भारत में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है। दण्डी संन्यासी होने के बावजूद सहजानंद ने रोटी को ही भगवान कहा और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया। स्वामी जी ने नारा दिया था 'जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, अब सो कानून बनायेगा, ये भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वही चलायेगा।' गाजीपुर के जर्मन मिशन स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अट्ठारह वर्ष की उम्र में संन्यास लिया और वेदान्तों के विचारों को दैनिक जीवन में प्रचलित किया। वेदांतों के अर्थ के अनुसार धर्म, कार्य, मोक्ष में मार्क्स के अर्थ को प्रथम स्थान दिया। इसी कारण उन्होंने राजनीति को आर्थिक कसौटी के रूप में अपनाया। इसके कारण स्वामी जी ने उग्र अर्थवाद, वर्ग संघर्ष, किसान हितों के प्रति लड़ने के लिए क्रांति जैसे रास्ते को अपनाया।
संन्यासी बनकर ईश्‍वर और सच्चे योगी की खोज में हिमालय, विंध्याचल, जंगलों-पहाड़ों और गुफाओं की यात्रा की। काशी और दरभंगा के विशिष्ट विद्वानों के साथ वेदान्त, मीमांसा और न्याय शास्त्र का गहन अध्ययन किया। 1919 में बाल गंगाधर तिलक के निधन के बाद राजनीति की ओर अग्रसर हुए और तिलक स्वराज्य फंड के लिए कोष इकट्ठा करना शुरू किया। 1920 में पटना में मजहरुल हक के आवास पर महात्मा गांधी से मिले तथा कांग्रेस में शामिल होने का निश्चय किया। कांग्रेस में रहते भी उन्होंने किसानों को जमींदारों के शोषण और आतंक से मुक्त करवाने के लिए अभियान जारी रखा। महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए असहयोग आंदोलन ने बिहार में गति पकड़ी तो स्वामी सहजानंद उसके केन्द्र में थे। उन्होंने घूम-घूमकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों को खड़ा किया।
इस दौरान उन्हें अनुभव हुआ कि किसानों की हालत गुलामों से भी बदतर है। जिसे देखकर युवा संन्यासी का मन एकबार फिर नये संघर्ष की ओर उन्मुख हुआ और किसानों को एकजुट करने की मुहिम में लग गए। 1927 में पश्‍चिमी किसान सभा की नींव रखी तथा शोषितों के लिए संघर्ष शुरू कर दिया और 'मेरा जीवन संघर्ष' लिखी। 1928 में बेगूसराय समेत बिहार के अन्य जगहों पर स्वामी सहजानंद सरस्वती और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह समेत अन्य किसान हितैषियों ने किसान सभा का सदस्य बनाने और संगठन खड़ा करने का काम शुरू किया। 1929 में सोनपुर मेला के अवसर पर बिहार प्रान्तीय किसान सभा की नींव रखी तथा स्वामी सहजानंद सरस्वती सभापति और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह सचिव बनाए गए।
1934 में बिहार जब प्रलयंकारी भूकंप से तबाह हुआ तो स्वामीजी ने डॉ. श्रीकृष्ण सिंह को साथ लेकर राहत और पुनर्वास कार्य में काफी सक्रियता सेे भाग लिया। इसी दौरान पटना में महात्मा गांधी से मुलाकात कर जनता का हाल सुनाया तो गांधीजी ने दरभंगा महाराज से मिलकर किसानों के लिए जरूरी अन्न का बंदोबस्त करने की बात कही। इसके साथ ही उनका रास्ता अलग हो गया। उन्होंने बिहार प्रान्तीय किसान सभा को विस्तारित करते हुए 11 अप्रैल 1936 को अखिल भारतीय किसान सभा को पुनर्गठित किया तथा कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई, जिसमें स्वामी सहजानंद सरस्वती को पहला अध्यक्ष चुना गया। इसकेे बाद उन्होंने किसानों को हक दिलाने के लिए जीवन का लक्ष्य घोषित किया और नारा दिया 'कैसे लोगे मालगुजारी, लट्ठ हमारा जिंदाबाद।' इसकेे बाद उन्होंने पूरे बिहार में दो सौ से अधिक जगहों पर किसान सभा की, किसानों को एकत्रित और जागरूक किया।
1938 में बेगूसराय जिला के बलिया में जमींदारों केे विरुद्ध किसान आंदोलन शुरू हुआ तो जमींदार के लठैतों ने जमकर लाठियां चलाई और यहीं से जमींदार के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया। साहेबपुर कमाल से बछवाड़ा तक गांव-गांव में किसान आंदोलन तेज हो गया। स्थिति गंभीर हो गई तो किसान सभा ने जमींदार को स्थिर रहने की सलाह दी। स्वामी सहजानंद सरस्वती बलिया आए तथा उन्होंने बलिया, तेघड़ा और बेगूसराय में युवक सम्मेलन कर ओजस्वी भाषण दिया।
1938 में ही तेघड़ा थाना के बछवाड़ा गांव में कांग्रेस के विरोध के बाद भी यदुनंदन शर्मा के सभापतित्व में बिहार प्रांतीय किसान सम्मेलन हुआ और इसमें स्वामी सहजानंद सरस्वती, जयप्रकाश नारायण, गंगाशरण सिंह, डॉ. कयूम अंसारी, कार्यानंद शर्मा, ब्रजमोहन शर्मा समेत किसान नेताओं ने किसानों की समस्या पर बढ़-चढ़कर बातें की। कांग्रेस की ओर से सुरेश चंद्र मिश्र ने गांव-गांव घूमकर लोगों को सभा में नहीं जाने का अनुरोध किया था। इसके बावजूद सभा में इतनी भीड़ जुट गई कि लोगों को पंडाल में जगह नहीं मिली। एक ही समय में दो अलग-अलग सभा करनी पड़ी। जिसमें एक का नेतृत्व रामवृक्ष बेनीपुरी कर रहे थे तो दूसरे में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने भाषण दिया था। इन्हीं आंदोलनों का असर था कि बिहार में जब डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी तो देश में सबसे पहले यहां जमींदारी उन्मूलन कानून बनाया गया। राजा चंद्रचूड़ देव द्वारा नीलाम की गई रामदिरी की जमींदारी रद्द कर यह देश का सबसे पहला जमींदार मुक्त गांव बना और देश में नई मिसाल बनी।
1949 में महाशिवरात्रि के दिन स्वामी सहजानंद सरस्वती ने पटना के बिहटा में सीताराम आश्रम स्थापित किया जो किसान आंदोलन का केन्द्र बना तथा यहीं से वह पूरे आंदोलन को संचालित करते थे। जमींदारी प्रथा के खिलाफ लड़ते हुए स्वामी जी 26 जून 1950 को मुजफ्फरपुर में हाईब्लड प्रेशर के कारण स्वर्ग सिधार गए। उनके निधन पर देश और बिहार के साथ बेगूसराय भी खूब रोया था। स्वतंत्रता सेनानी ब्रजमोहन शर्मा ने बेगूसराय में सर्वोदय नगर और सहजानंद नगर की स्थापना की। आज भी लोग स्वामी सहजानंद सरस्वती को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं।
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


 
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