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नैतिक समस्याओं का मर्म और साहित्य से उपजा संभ्रम

17/02/2020

मनोज ज्वाला
आज देश के सामने जितनी भी समस्याएं और चुनैतियां हैं, उनका मूल कारण वस्तुतः बौद्धिक संभ्रम है। यह अज्ञानतावश या अंग्रेजी मैकाले शिक्षा व साहित्य से निर्मित औपनिवेशिक सोच का परिणाम है अथवा वैश्विक महाशक्तियों के भारत विरोधी साम्राज्यवादी षड्यंत्र का दुष्परिणाम। राष्ट्रीय एकता-अखण्डता पर प्रहार करता रहने वाला आतंकवाद, अलगाववाद, क्षेत्रीयतावाद, सम्प्रदायवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद हो या आर्थिक विषमता की खाई चौड़ी करने वाली समस्याओं में शुमार भूख, बेरोजगारी, गरीबी, पलायन, शोषण-दमन हो अथवा सामाजिक जीवन की शुचिता-नैतिकता को निगलने वाला अनाचार, व्याभिचार, भ्रष्टाचार या व्यैक्तिक-पारिवारिक जीवन में घर करती जा रही स्वार्थपरायणता व संकीर्णता, सबका मूल कारण अनर्गल बौद्धिक-शैक्षिक परिपोषण ही है। जबकि किसी भी व्यक्ति-परिवार-समाज-राष्ट्र की बौद्धिकता-शैक्षिकता का सीधा सम्बन्ध साहित्य से है। साहित्य न केवल संस्कृति के संवर्द्धन में सहायक है, अपितु लोकमानस व लोक-प्रवृति के निर्माण में भी साहित्य की कारगर भूमिका होती है।
उल्लेखनीय है कि अपने देश की विभिन्न भाषाओं के साहित्य में जबतक राष्ट्रीयता का स्वर प्रमुखता से मुखरित होता रहा, तबतक राष्ट्रीय एकता अखण्डता की भावनायें राजनीतिक दासता से स्वतंत्रता-प्राप्ति तक पुष्ट होती रहीं। किन्तु स्वतंत्र्योत्तर साहित्य में जब वामपंथी धारा के बहाव से जनवाद, दलितवाद, नारीवाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद जैसी प्रवत्तियां मुखरित हो उठीं; उनके प्रभाव-दुष्प्रभाव से देश में पृथकतावाद व जातिवाद ही नहीं, आतंकवाद व नक्सलवाद का हिंसक विषवमन भी होने लगा, जो आज राष्ट्र के समक्ष गम्भीर चुनौतियां बनी हुई है। इन अनुचित-अवांछित ‘वादों’ का किसी न किसी रूप में साहित्य से भी पोषण हो रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। आज जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जैसे शीर्षस्थ शिक्षण संस्थानों में भारत-विरोधी नारे मुखरित हो रहे हैं, गोमांस भक्षण के समारोह आयोजित हो रहे हैं; तो समझा जा सकता है कि ऐसी मनःस्थिति व राष्ट्र-विरोधी प्रवृति के निर्माण में साहित्य की खास धारा प्रभावी भूमिका निभा रही है।
इसी तरह से व्यक्ति के नैतिक पतन और लगातार बढ़ रहे पारिवारिक विघटन में भी कहीं-न-कहीं ऐसी प्रवृत्तियों का निर्माण करने वाले साहित्य का ही योगदान है। साहित्य के नाम पर जनमानस को अवांछित-गर्हित विचारों का मानसिक आहार परोसा जाना इसके लिए कम जिम्मेवार नहीं है। यह साहित्य की एक खास धारा का ही प्रभाव है, जिसकी वजह से परिवार की परिभाषा बदलकर पति-पत्नी व बच्चे तक सिमट गई। ‘प्रेम’ व ‘प्यार’ जैसे पवित्र शब्दों को युवक-युवती या स्त्री-पुरुष के दैहिक आकर्षण एवं मैथुनिक आचरण में परिणत कर देने और इसके परिणामस्वरूप समाज में बढ़ रहे व्याभिचार-बलात्कार की प्रवृत्तियों के लिए साहित्य जिम्मेवार है। स्थिति यह हो गई है कि किसी युवती-स्त्री के प्रति मैथुन-प्रेरित पशुवत आचरण करने वाले निकृष्ट अपराधी को भी उस स्त्री-युवती का प्रेमी कहा जाने लगा है, तो दूसरी ओर भाई-बहन के परस्पर सम्बन्ध के स्वरूप को ‘प्रेम’ या ‘प्यार’ कहे जाने में लोगों को संकोच होने लगा है।
यह साहित्य ही है, जिसके आधार पर समाज में नैतिक पतन व चारित्रिक क्षरण को बढ़ावा देने वाली फिल्मों के निर्माण हो रहे हैं। समाज में व्याभिचार फैलाने वाली फिल्मों के निर्माण व अभिनयन हेतु कच्चे माल के तौर पर फूहड़ गीतों व कहानियों की आपूर्ति साहित्य से ही हो रही है। आज किशोर-किशोरियों, युवक-युवतियों को फिल्मी कथा-कहानियों से प्रेरित होकर अपने जीवन की दिशा स्वयं निर्धारित करने तथा जीवनसाथी स्वयं चयनित करने और उस निर्धारण-चयन में माता-पिता की उपेक्षा करने में साहित्य ही प्रेरक बना हुआ है। पारिवारिक विघटन के लिए और भी तत्व चाहे जितने भी जिम्मेवार हों, किन्तु साहित्य इसके लिए सर्वाधिक जिम्मेवार है। अपने देश में संयुक्त परिवारों का विघटित सिर्फ सामाजिक चुनौती के रूप में चिन्हित हो रहा है, मगर यह पारिवारिक विघटन प्रकारान्तर से राष्ट्रीय चुनौती भी है; क्योंकि इससे एकता की भावना खण्डित होती है, स्वार्थपरता बढ़ती है और सामूहिक-पारिवारिक विकास अवरुद्ध होता है, जिससे अंततः राष्ट्र कमजोर होता है।
आज देश की राष्ट्रीय अस्मिता एवं पुरातन संस्कृति और भारतीय धर्म-दर्शन, जीवन-दृष्टि तथा भारतीय ज्ञान-विज्ञान के प्रति हमारी पीढ़ियों में बढ़ती अरुचि एवं निष्ठाहीनता तथा पश्चिम के प्रति बढ़ती पलायनवादिता के लिए भी कहीं न कहीं वर्तमान साहित्य भी जिम्मेवार है। हालांकि इन सबके प्रति लोगों में बची-खुची थोड़ी-बहुत निष्ठा, रुचि व आकर्षण भी पूर्ववर्ती साहित्य के कारण ही कायम है; इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। आज हमारे देश में जिस तरह की शिक्षा-पद्धति है, उससे हमारी अस्मिता अबतक तो समाप्त हो जानी चाहिए थी; इसके बावजूद अगर हमारे भीतर राष्ट्रीयता अभी जीवित है तो निस्संदेह इसका श्रेय साहित्य को ही है। जिससे यह प्रमाणित होता है कि साहित्य की तत्सम्बन्धी सृजनशीलता से यह और पुष्ट हो सकती है; जबकि यथास्थितिवादिता से हमारी अस्मिता धीरे-धीरे मिट भी सकती है।
देश की समस्याओं व चुनौतियों का कारण राजनीतिक प्रदूषण है और इस राजनीति का अभीष्ट सिर्फ शासनिक सत्ता है। ऐसे में इन चुनौतियों का समाधान साहित्य में ही ढूंढना वांछित है। कहा भी गया है गया है कि राजनीति जब डगमगाती है तो साहित्य उसे गिरने से बचाता है। किन्तु यह तभी सम्भव है जब साहित्य अपने धर्म-पथ पर अडिग रहे। किन्तु देश की वर्तमान स्थिति भिन्न है। साहित्य की एक धारा साहित्य के स्वधर्म के पथ पर नहीं, बल्कि राजनीति के एक पथ-विशेष पर उन्मुख हो उसी की हां में हां मिलाता रहा है। स्वातंत्र्योत्तर भारत का लोकमानस गढ़ने में राजनीति व साहित्य की इसी दुरभिसंधि का योगदान रहा है, जिसके तहत अब राजनीतिक परिदृश्य बदल जाने पर पुरस्कार-सम्मान वापसी से लेकर सहिष्णुता-असहिष्णुता को मापने तक के प्रहसन किये जा रहे हैं। ऐसे में साहित्य की भूमिका न केवल बढ़ी है बल्कि बदल भी गई है। साहित्य व राजनीति की दुरभिसंधि अगर कायम रही, तो स्थिति और बिगड़ती जाएगी। अतएव साहित्य को अपने स्वधर्म पर लौटना होगा और धर्म के मार्ग पर ही अडिग रहना होगा। तभी बौद्धिक संभ्रम के कारण कायम तमाम नैतिक समस्याओं का समाधान हो पाएगा और स्वस्थ बौद्धिक विमर्श का वातावरण निर्मित होगा।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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