युगवार्ता

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रात के उस पार का उजाला

11/09/2019

रात के उस पार का उजाला

वसीम

कविता अभिव्यक्ति की हृदस्पर्शी विधा है। अगर किसी कविता की चंद पंक्तियों को पढ़कर हम भारी संवेदना से सिहर उठते हैं, तो यह उस कविता की उपलब्धि है। और सच्ची कविता की पहचान भी। अमित गुप्ता ऐसे ही फनकार हैं, जो उन तमाम दबी जबानों को अपनी आवाज देना चाहते हैं, जिनके हिस्से में मजबूरियां सबसे ज्यादा होती हैं। दूसरे के दर्द को जबान देना ही तो कविता का उद्देश्य है और यही कवि-कर्म भी है। जिस दौर में कविता की पठनीयता कुछ कम हुई है, उस दौर में कविता लिखना और प्रकाशक के लिए उसे छापना बिरले का काम है। अगर दिल्ली की हिंदी अकादमी किसी कविता संग्रह को प्रोत्साहित करती है, तो यह संस्थान बधाई का पात्र है।
हिंदी अकादमी, दिल्ली के प्रकाशन सौजन्य से हिंद युग्म से छपा अमित गुप्ता का पहला कविता संग्रह ‘रात के उस पार’ संवेदना के एक ऐसे कोने की तलाश करता है, जहां इस धरती का ध्वंस होता हुआ न दिखे। पूंजीवाद के इस घोर अनैतिक दौर में पेशे से एक कॉरपोरेट प्रोफेशनल अमित गुप्ता में अगर हम ऐसी संवेदना पाते हैं, तो निश्चित रूप हम कह सकते हैं कि कविता हर हाल में कामयाब हो ही जाती है। किसी शायर ने कहा था, लंबी है गम की शाम मगर शाम ही तो है। बेशक शाम या रात इस बात की उम्मीद हमेशा लिए रहती हैं कि कल का सूरज एक बेहतरीन दिन लेकर आएगा। इस ऐतबार से कविता संग्रह का नाम ‘रात के उस पार’ भी एक नयी उम्मीद की किरण जगाता है, जहां कवि कहता है, ‘मुट्ठीभर उजाला बिखेर दो, थोड़ा ही सही उजाला तो है’।
आज के इस समय में जहां आकांक्षाएं हम इंसानों पर हर तरह से हावी है, वहां लाखों-करोड़ों लोगों को एक उम्मीद की तलाश रहती है। किताब में मानवीय आकांक्षाओं से लेकर सपनों तक, समाज में स्थापित होने के लिए नौकरी से लेकर बेरोजगारी तक, कवि अमित ने पूरी कोशिश की है कि चाहे जो भी परिस्थितियां हों, उम्मीद को जिंदा रखना है। उम्मीद एक जिंदा शब्द है, इस सच के साथ ही रचनाकार का रचनाकर्म सार्थक हो सकता है, अन्यथा तो आज का दौर सच लिखने की इजाजत नहीं देता। अमित गुप्ता उर्दू के उस्ताद शायर मिर्जा गालिब, गीतकार गुलजार और गुरुदेव रबिंद्रनाथ टैगोर को अपना आदर्श मानते हैं।
आदर्श उच्च हो तो ख्याल उच्च हो ही जाते हैं। इसलिए यह आदर्श ही इस संग्रह का हासिल भी लगता है। अमित की कलम बिना मौजूदा बाजार और पूंजी की मार की फिक्र किए सच को बयान करने में यकीन रखती है और यह सीख शायद उन्हें अपने आदर्श स्वरूपा गुरुओं से ही हासिल हुई होगी। सोच, फिक्र, भाषा और संवेदना के धरातल पर अमित गुप्ता खुद अपनी रूह से दो-चार होने की इच्छा रखते हैं, तो सिर्फ इसलिए कि रूह से फूटने वाला साहित्य का उजाला इस मार-काट वाली दुनिया को कुछ रोशनी दे सकेगा, जिससे कि संवेदनहीनता अपनी जड़ें न जमाने पाए। हर कोई इस रोशनी का वाहक बन सकता है। इसलिए मेरा मानना है कि इस किताब को एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए।
कविता के शिल्प और उसके रिदम के स्तर पर अमित कहीं-कहीं कमजोर नजर आते हैं। लेकिन संवेदना और यथार्थ के धरातल पर वे मजबूती से खड़े हैं। एक कवि और उसकी कविता के लिए अपनी जमीन पर मजबूती से खड़े रहना आज के समय की मांग भी है और जरूरत भी है।


 
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