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बच्चों के लिए कहर बना चमकी बुखार, कहां हो सरकार

18/06/2019

योगेश कुमार गोयल
बिहार में अब तक चमकी बुखार से 100 से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। मौतों का यह आंकड़ा कहां जाकर थमेगा, कोई नहीं जानता। बिहार में इस बीमारी का सर्वाधिक कहर मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर, मोतिहारी, बेतिया और वैशाली जिलों में देखा गया है। इन जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बदतर है। इसीलिए बच्चों के इलाज के लिए परिजन मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल  (एसकेएमसीएच) की ओर भाग रहे हैं। 1995 से यह बीमारी विशेषकर बिहार में बच्चों को अपना शिकार बनाती आ रही है। रहस्यमयी मानी जाती रही इस बीमारी का असल कारण जानने में स्वास्थ्य महकमा नाकाम रहा है। नतीजतन, हर साल बच्चे इस बीमारी के कारण मौत के आगोश में समाते जा रहे हैं। चमकी को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ अब तक सही-सही कारणों का पता नहीं लगा पाए हैं।
चमकी बुखार के चलते बिहार में वर्ष 2010 में 24 मौतें हुई थी। 2011 में 45,  2012 में 120,  2013 में 39,  2014 में 86,  2015 में 11,  2016 में 4,  2017 में 4 तथा 2018 में 11 बच्चों की मौत हुई थी। इस साल बच्चों की मौत के आंकड़े बहुत डरावने हैं। आखिर क्या वजह है कि यह बीमारी हर साल खासकर गर्मी के मौसम में बिहार में दस्तक देती है। चमकी बुखार, जिसे दिमागी बुखार, जापानी इंसेफेलाइटिस, नवकी बीमारी इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। मेडिकल भाषा में इसे एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) नाम दिया गया है। यह एक गंभीर बीमारी है। यह बीमारी शरीर के मुख्य नर्वस सिस्टम अर्थात तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती है। हर साल चमकी बुखार से होती बच्चों की मौतों के बीच अहम सवाल यह है कि आखिर यह बुखार होता कैसे है? गर्मी के मौसम में ही इसके इतने मामले क्यों सामने आते हैं? बच्चे ही इस बीमारी के शिकार क्यों होते हैं? क्या हैं इसके प्रमुख लक्षण? कैसे इसकी चपेट में आने से बचा जा सकता है?
यह बुखार अत्यधिक गर्मी और नमी के मौसम में फैलता है। सामान्यतया 15 साल तक की उम्र के बच्चे इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। बच्चों की शारीरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कम होती है। इसके चलते शरीर में पानी की कमी होने पर बच्चे बहुत जल्द हाइपोग्लाइसीमिया के शिकार हो जाते हैं। बहुत से मामलों में बच्चों के शरीर में सोडियम की कमी भी हो जाती है। लो इम्युनिटी पावर के चलते बच्चे शरीर पर पड़ती कड़क धूप के प्रभाव को नहीं झेल पाते और बीमार पड़ जाते हैं। चमकी बुखार से प्रभावित बच्चों की सामाजिक स्थिति का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि ये सभी निम्न आय वर्ग परिवारों के ऐसे बच्चे हैं, जो भीषण गर्मी में भी दोपहर के समय बगैर गर्मी से बचाव के उपाय किए खेत-खलिहान में खेलने के लिए निकल पड़ते हैं। इस दौरान बहुत कम पानी पीते हैं। ऐसे में सूर्य की प्रचण्ड गर्मी के प्रभाव को उनका शरीर झेल नहीं पाता। ऐसे बच्चे चमकी बुखार की चपेट में आसानी से आ जाते हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में प्रायः मई से जुलाई माह के दौरान ही चमकी बुखार से बच्चों की मौतों के मामले सामने आते रहे हैं।
ज्यादातर खाली पेट लीची खाने वाले बच्चे ही चमकी की चपेट में आ रहे हैं। इंडियाज नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल की एक रिपोर्ट में भी इस बीमारी की कई वजहों में से एक लीची को बताया गया है। खाली पेट लीची खाने को इस बीमारी की अहम वजह माना गया है। दरअसल लीची में कुछ ऐसे टॉक्सिंस मौजूद होते हैं, जो खाली पेट लीची खाने से बच्चे के लीवर में जमा होते रहते हैं। तापमान बढ़ने पर ये विषैले तत्व शरीर में फैलने लगते हैं। 2017 में 'द लैंसेट मेडिकल हेल्थ जर्नल' की एक रिपोर्ट में भी कहा गया था कि इंसेप्लोपैथी अथवा दिमागी बुखार फैलने की एक अहम वजह लीची है। इस रिपोर्ट के अनुसार जब बच्चों के शरीर में शुगर की मात्रा कम हो जाती है तो शरीर में ग्लूकोज बढ़ाने के लिए मैटाबॉलिज्म सिस्टम फैटी एसिड का निर्माण करता है। लीची एक अधपका फल है। उसके बीज में बहुत ज्यादा टॉक्सिंस होते हैं। इन विषैले तत्वों में ग्लूकोज सिंथेसिस नामक पाया जाने वाला तत्व बेहद खराब होता है। बच्चों के शरीर में शुगर की कमी होने पर शरीर इसका नियंत्रण बनाए जाने पर ज्यादा ग्लूकोज रिलीज करता है। उसी दौरान लीवर में पहले से ही जमा ग्लाइकोजेन नामक विषैला तत्व पूरे शरीर में फैल जाता है, जो दिमागी बुखार 'चमकी' का अहम कारण बनता है।
अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जिन बच्चों ने भोजन के बजाय लीची ज्यादा खाई हो और रात में भोजन न किया हो, उनके हाइपोग्लाइसीमिया (रक्त में एकाएक शुगर की मात्रा कम हो जाना) के शिकार होने का खतरा बढ़ जाता है। इसी प्रकार सुबह खाली पेट काफी मात्रा में लीची खाने के बाद अगर बच्चे ने दिनभर पानी बहुत कम पीया हो तो उनमें सोडियम की कमी हो जाती है। अगर खाली पेट लीची खाकर सो जाएं तो भी यह खतरनाक साबित हो सकता है क्योंकि लीची से निकलने वाला विषैला तत्व शरीर में शुगर की औसत मात्रा को कम कर देता है। बिहार में जितने भी बच्चों की चमकी से जान गई है, उनके यूरिन सैंपल में पाया गया कि उन्होंने लीची का सेवन किया था। सभी बच्चों के ब्लड सैंपल में शुगर लेवल भी औसत से कम पाया गया।
बिहार के जिन इलाकों में चमकी से बच्चों की मौतें हुई हैं, वे सभी इलाके लीची के बागों के लिए विख्यात हैं। वहां बड़े पैमाने पर लीची का उत्पादन होता है। देश-विदेश तक वहां की लीचियां पहुंचाई जाती हैं। जिस जहरीले पदार्थ के कारण बच्चों की मौत हुई हैं, वो लीची में पाया जाता है। यह जांच का विषय है कि क्या वाकई लीची में पाए जाने वाले विषैले तत्व के कारण ही बच्चों की मौतें हो रही हैं। हालांकि चिकित्सक बच्चों की मौत का कारण सीधे तौर पर इंसेफेलाइटिस को न मानकर शुरूआती तौर पर हाइपोग्लाइसीमिया या सोडियम की कमी को ही बता रहे हैं। इस बीमारी पर नियंत्रण के लिए शुरूआती दौर में न ही बिहार सरकार ने कोई ठोस कदम उठाए और न केन्द्र ने कोई दिलचस्पी दिखाई। जब बच्चों की मौतों का आंकड़ा बढ़ते-बढ़ते 50 की संख्या को पार कर गया, तब जाकर स्वास्थ्य विभाग की केन्द्रीय टीम बिहार पहुंची। चूंकि अभी तक इस बीमारी का कोई कारगर इलाज ढूंढ़ने में सफलता नहीं मिली है। इसीलिए सावधानी को ही इस बीमारी से बचने का इलाज माना जाता है।
अब बात करें चमकी बुखार के लक्षणों की तो इस बुखार से पीड़ित बच्चे को निरन्तर तेज बुखार बना रहता है। पूरे शरीर में या शरीर के किसी खास अंग में ऐंठन होती है। शरीर सुन्न हो जाता है। बच्चा दांत पर दांत चढ़ाए रहता है। कमजोरी की वजह से बार-बार बेहोश होता है। इन लक्षणों को नजरअंदाज करना प्रायः जानलेवा साबित होता है। इसलिए जरूरी है कि ऐसे लक्षण नजर आते ही बच्चे को योग्य चिकित्सक के पास ले जाया जाए। सावधानी अपनाकर बच्चों को इस जानलेवा बीमारी से बचाया जा सकता है। 
इसके लिए जरूरी है कि साफ-सफाई का पर्याप्त ध्यान रखें। खाने से पहले और खाने के बाद बच्चों के हाथ अवश्य धुलवाएं। नाखून न बढ़ने दें, क्योंकि नाखूनों में जमा होती गंदगी बीमारियों का कारण बनती है। गर्मी होने पर बच्चों को थोड़ी-थोड़ी देर में तरल पदार्थ देते रहें ताकि शरीर में पानी की कमी न होने पाए। गर्मी के मौसम में बच्चों को धूप में हरगिज न खेलने दें। बच्चे को खाली पेट लीची न खिलाएं। अधपकी या कच्ची लीची खिलाने से बचें। अगर बच्चे ने दिन में ज्यादा लीची खाई हैं तो उसे रात में भरपेट भोजन अवश्य कराएं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


 
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