लेख

Blog single photo

केन्द्रीय मंत्रिमंडल में राज्यों का संतुलन

31/05/2019

सियाराम पांडेय 'शांत' 
ये भारत के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई यात्रा तो चुनाव नतीजे के दिन ही तय  हो गई थी। अब शपथ ग्रहण के साथ उसका आगाज भी हो गया है। सरकार के गठन में अनुभव और युवा जोश का सामंजस्य दिखता है। विशेषज्ञता और दक्षता को महत्व दिया गया है। प्रधानमंत्री ने पांच आईएएस और पांच आईएफएस को अपने मंत्रिमंडल में जगह देकर देश के लगभग सभी राज्यों से अपनी टीम के लिए हीरे तलाशे, उससे यह तो पता चल गया है कि भारत का भविष्य सुरक्षित हाथों में हैं। प्रधानमंत्री ने अपने सबसे करीबी अमित शाह को गृह मंत्रालय और जवानों को हाथ खोलने की सीख देनेवाले राजनाथ सिंह को रक्षा मंत्रालय का प्रभार देकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। विदेश मामले के जानकार एस जयशंकर को विदेश मंत्री बनाया गया है तो पहली बार महिला रक्षा मंत्री का सौभाग्य प्राप्त करनेवाली निर्मला सीतारमण को पहली महिला वित्त मंत्री बनने का गौरव मिला है। अपने देश में अभी तक महिलाएं घर का बजट संभालती रही हैं। अब पहली बार कोई महिला देश का बजट तय करेगी। ऐसा करके प्रधानमंत्री ने आधी आबादी का सम्मान किया है। प्रधानमंत्री का यह कदम देशहित में उठाया गया कदम माना जाना चाहिए। इसी तरह नितिन गडकरी को राजमार्ग मंत्रालय का काम दोबारा सौंपकर प्रधानमंत्री ने जनता को भरोसा दिया है कि विकास की रफ्तार इस बार पहले से तेज होगी। मोदी के मंत्रिमंडल में सही मायने में 'सबका साथ,सबका विकास के साथ सबका विश्वास' की भावना प्रतिध्वनित हुई है।
   अपने मंत्रिमंडल में नरेंद्र मोदी ने पुराने लोगों पर विश्वास जताया है। साथ ही 18 नए सांसदों को मंत्रिमंडल में लेना नहीं भूले। गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ 24 कैबिनेट मंत्री, 9 राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और 24 राज्यमंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। मोदी का मंत्रिमंडल बेहद संतुलित और सूझ-बूझ भरा है। उन्होंने बेहतर परफार्म करने वाले मंत्रियों को तरजीह तो दी है, उन्हें प्रमोट भी किया है। कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों को भी अपनी कैबिनेट में जगह दी। यहां तक कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी मंत्रिमंडल में जगह देकर उन्होंने भाजपा में सांगठनिक स्तर पर बड़े बदलाव के भी संकेत दे दिए हैं। सबसे ज्यादा 8 मंत्री उत्तर प्रदेश से बनाए गए हैं। प्रधानमंत्री को जोड़ लिया जाए तो यह संख्या 9 हो जाती है। महाराष्ट्र और बिहार से 6 मंत्री बनाए गए हैं। गुजरात से 7 मंत्री बनाए गए हैं। कर्नाटक और मध्यप्रदेश से 4-4, हरियाणा और पंजाब से 3-3, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु से 2-2 तथा झारखंड ,तेलंगाना, जम्मू -कश्मीर, छत्तीसगढ़, असम, गोवा और केरल से 1-1, मंत्री बनाकर उन्होंने देश का भौगोलिक संतुलन बनाने की कोशिश की है। मोदी सरकार के दूसरे मंत्रिमण्डल में देश के 22 राज्यों को प्रतिनिधित्व मिला है। हालांकि 6 राज्य मंत्रिमंडल में अपनी जगह नहीं बना सके। इस मंत्रिमंडल में 6  महिलाओं को स्थान देकर नरेंद्र मोदी ने आधी आबादी को मान देने की यथासंभव कोशिश की है।  
पुराने साथियों को अपने साथ बनाए रखना भी बड़ी उपलब्धि है। नरेंद्र मोदी अपने पुराने साथियों को खोना नहीं चाहते। सहयोगी दलों के एक-एक सांसद को अपने मंत्रिमंडल का सदस्य बनाकर उन्होंने मित्रता धर्म का निर्वाह किया है। भले ही जदयू ने प्रतीकात्मक रूप से सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया हो लेकिन नरेंद्र मोदी ने चुनाव के अंतिम दौर में प्रज्ञा ठाकुर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता पर असहमतिपूर्ण बयान के बाद भी नीतीश कुमार को अपने दल के एक सांसद को कैबिनेट में भेजने का मौका दिया था। यह अलग बात है कि पैंतरे पर चल रहे नीतीश ने हाथ आया मौका खो दिया। नरेंद्र मोदी ने एक रुपये खर्च किए बगैर सांसद बनने वाले प्रताप चंद्र सारंगी को भी अपने मंत्रिमंडल में स्थान दिया। इससे भाजपा की नीति और नीयत का पता चलता है। बेहतर प्रदर्शन न कर पाने वाले राज्यवर्धन राठौर और मेनका गांधी को मंत्रिमंडल से बाहर रखने का उनका निर्णय बौद्धिकों के चर्चा केंद्र में तो रहेगा ही। भाजपा के पास खुद का सुस्पष्ट बहुमत है। 542 लोकसभा सीटों में से उसके 303 सांसद जीते हैं। ऐसे में अगर वह गठबंधन के साथी दलों के लोगों को मंत्री नहीं बनाते तो भी कोई हर्ज नहीं था। लेकिन गठबंधन धर्म का तकाजा यही था कि उन्हें भी उचित सम्मान मिले और यह सम्मान नरेंद्र मोदी ने उन्हें बखूबी दिया है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। 
 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्षों को तो अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया ही, अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के 300 मतदाताओं को भी वे दिल्ली बुलाना नहीं भूले। पुलवामा में मारे गए शहीदों के परिजनों को तथा पश्चिम बंगाल की चुनावी हिंसा में जिन भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपनी जान गंवाई, उनके परिजनों को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाकर उनके जख्म पर मरहम लगाने का काम भी उन्होंने बड़े सलीके के साथ किया है। 
वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दक्षेस देशों के प्रमुखों सहित 3500 से अधिक मेहमानों की मौजूदगी में शपथ दिलाई थी। इस बार नजारा बदला है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन परिसर में प्रधानमंत्री और उनके सहयोगी मंत्रियों को शपथ दिलाई है। बिम्सटेक के कई राष्ट्राध्यक्ष इस शपथ ग्रहण समारोह के साक्षी बने हैं। राष्ट्रपति भवन के प्रांगण का इस्तेमाल आम तौर पर राष्ट्राध्यक्षों एवं सरकार के प्रमुखों के औपचारिक स्वागत के लिए किया जाता है। इससे पहले 1990 में चंद्रशेखर और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी को राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में शपथ दिलाई गई थी। पाकिस्तान को इस समारोह के बहाने नरेंद्र मोदी ने बड़ा झटका दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष इमरान खान को शपथ ग्रहण समारोह के लिए आमंत्रित ही नहीं किया। इसका साफ संदेश यह भी है कि दोस्ती और दुश्मनी एक साथ नहीं चल सकती। 
  कुल मिलाकर नये मंत्रिमंडल में पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों में भाजपा की बढ़ती ताकत की भी झलक मिली है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पूर्वोत्तर और उत्तराखंड को तो अहमियत मिली ही है। वैसे मोदी ने जिस तरह अपने मंत्रिमंडल में हर प्रदेश को तरजीह देने की कोशिश की है, उससे पहली बार लगा है कि कोई सरकार अपने मंत्रियों को लेकर कितनी गंभीर है? अमूमन मंत्री पद मिलने के बाद मुंह मीठा कराने की परंपरा रही है लेकिन नरेंद्र मोदी ने शपथ ग्रहण से पहले भावी मंत्रियों से चाय पर चर्चा की और अपना मंतव्य जाहिर कर दिया। उन्हें यह बताने और जताने का प्रयास किया है कि यह दायित्व सामान्य नहीं है। आपके सिर पर जिम्मेदारियों का ताज रखा जा रहा है, जिसे हर हाल में पूरा ही करना है। मंत्रिमंडल के गठन में जिस तरह तालमेल दिखा है, कदाचित वह पांच साल बना रहे तो देश का कायाकल्प होते देर नहीं लगेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार सरकार जो कुछ भी करेगी, अलहदा करेगी, अद्वितीय करेगी। 
(लेखक हिदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)


News24 office

News24 office

Top