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चम्पारण में महात्मा

28/09/2019

प्रो. अरविंद नाथ तिवारी
'दे दी हमें आजादी, बिना खड्‍ग बिना ढाल। साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।' यह गीत बचपन से सुनता आ रहा हूँ। छात्र जीवन में जब आया तो मालूम हुआ कि यह गाँधीजी के लिए है। मस्तिष्क में यह प्रश्न बार- बार उठता था कि गाँधीजी कैसे संत थे कि हथियार छुआ नहीं और देश को आजादी दिला दी। इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते अमेरिका, फ्रांस, रूस, इंगलैण्ड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, प्रशिया का जब इतिहास पढ़ा तो यही जाना कि अभिव्यक्ति और आजादी बगैर हथियार के नहीं मिलती। फिर भारत में कैसे सम्भव था बगैर हथियार के आजादी मिल जाना।
देश में सुशासन स्थापित करने के लिए अंग्रेजी सरकार के लॉर्ड डफरिन की सलाह पर ए.ओ. ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना की थी। अंग्रेजी सरकार का यह उद्देश्य था कि जैसे इंगलैण्ड की संसद में विपक्षी दल की भूमिका होती है, उसी तरह की भूमिका कांग्रेस की हो अर्थात सरकार की कमियों को साल में एकबार बैठक करके यह बताये कि सरकार इन चीजों में सुधार करे। पहली बार के कांग्रेस अधिवेशन में आये हुए लोगों को डफरिन ने भोज भी खिलाया, परन्तु बाद में कांग्रेस के रूख को देखते हुए नीति परवर्तन कर ली। कांग्रेस के प्रथम सन् 1885, द्वितीय सन् 1886, तृतीय सन् 1887 के अधिवेशन में अंग्रेजी सरकार के प्रति निष्ठा जाहिर करते हुए अंग्रेजी सिस्टम में सुधार की माँग की गई, पर कांग्रेस की माँग पर अंग्रेजी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। कांग्रेस के लोगों ने यह समझ लिया कि सरकार कुछ भी मानने वाली नहीं।बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय के नेतृत्व में कांग्रेस ने गर्म दल का रूप अख्तियार कर लिया था। इसी गर्माहट भरे वातावरण में गाँधीजी सन् 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारतीयों के लिए हीरो बनकर भारत लौटे। गोपाल कृष्ण गोखले ने भारत भ्रमण दौरान अपने भाषण द्वारा बता दिया था कि गाँधी में वो सारे गुण हैं, जो एक वीर बलिदानी में होना चाहिए। गाँधीजी देश लौटने के उपरांत भारत को जानने के लिए दो साल तक पूरे भारत का भ्रमण करते रहे। इसी दौरान 1917 और 1918 के आरम्भ में गाँधी जी ने तीन संघर्षों चम्पारण, अहमदाबाद और खेड़ा आंदोलन में हिस्सा लिया।
चम्पारण का मामला बहुत पुराना था।19वीं सदी के आरम्भ में ही गोरे बागान मालिकों ने किसानों से एक अनुबन्ध करा लिया था, जिसके तहत किसानों को अपने 3/20वें हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था, जिसे तीनकठिया पद्धति कहा जाता था।19वीं सदी के खत्म होते-होते जर्मनी के रासायानिक रंगों ने (डाई) नील को बाजार से बाहर खदेड़ दिया था।चम्पारण के यूरोपीय बागान मालिक नील की खेती बन्द करने के लिए मजबूर हो गये। किसान भी नील के खेती से छुटकारा पाने चाहते थे,जिसका गोरे बागान मालिक किसानों से फायदा उठाना चाहते थे। किसानों को अनुबन्ध से मुक्त करने के लिए लगान की दरें मनमाने ढंग से बढ़ा दी गयी। सन् 1908 में किसानों के विरोध के बावजूद गोरे बागान मालिकों का शोषण 1917 तक जारी रहा।
दक्षिण अफ्रीका में गाँधीजी की सफल राजनीति को देखते हुए चम्पारण सतवरिया के पं.राजकुमार शुक्ल ने गाँधी जी को बुलाने का फैसला लिया और वो कोलकता के दमदम हवाई अड्डा से ही गाँधी जी के पीछे लग गये। गाँधी जी को चम्पारण का हाल बताकर उन्हें 10 अप्रैल 1917 को चम्पारण लाये। गाँधीजी के चम्पारण आने पर कमिश्नर ने तुरन्त गाँधी जी को चम्पारण छोड़ने को कहा। गाँधी ने कमिश्नर और पुलिस सुपरिटेन्डेंट के आदेश का शांतिमय ढंग से विरोध करते हुए दंड भुगतने के लिए तैयार हो गये। गाँधी जी ने अपने संत होने का परिचय पहले पहल यहीं पर दिया। अगले दिन गांधीजी को कोर्ट में हाजिर होना था। हजारों किसानों की भीड़ कोर्ट के बाहर जमा थी। गांधीजी के समर्थन में नारे लगाये जा रहे थे। हालात की गंभीरता को देखते हुए मजिस्ट्रेट ने बिना जमानत के गांधीजी को छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन गांधीजी ने कानून के अनुसार सजा की माँग की।
भारत में गाँधीजी ने सत्याग्रह का पहला प्रयोग चम्पारण की भूमि पर किया। प्रथम सत्याग्रह आंदोलन का सफल नेतृत्व किया, अब उनका पहला उद्देय लोगों को 'सत्याग्रह' के मूल सिद्धातों से परिचय कराना था। चंपारन के इस गांधी अभियान से अंग्रेज सरकार परेशान हो उठी। सारे भारत का ध्यान अब चंपारन पर था। तिलक और ऐनी बेसेण्ट के लिए गाँधी जी का यह रूख अचम्भित करने वाला था क्योंकि ये लोग कड़े ढंग से अंग्रेजी सरकार का विरोध करते हुए आदेश का पालन किया था। गाँधी जी के इस रूख पर कमिश्नर को झुकना पड़ा और चम्पारण के गाँवों में गाँधीजी के जाने का आदेश देना पड़ा। गाँधीजी ने जी.बी. कृपलानी, राजेंन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई, नरहरि पारेख, ब्रज किशोर अन्य के साथ चम्पारण के गाँवों का भ्रमण कर किसानों का दुख दर्द समझा और जाना, सही पाने पर उनका बयान गाँधी जी दर्ज करते। गाँधी जी ने चम्पारण के दुख-दर्द को सरकार तक पहुंचाया। फिर तत्कालीन सरकार ने एक जाँच आयोग बनाया, जिसमें गाँधीजी को सदस्य बनाया। गाँधी जी ने तो पहले से ही सारे सबूत एकत्रित कर रखा था। गाँधीजी आयोग को बताने और समझाने में सफल रहे कि बागान मालिक चम्पारण में कैसे किसानों का शोषण कर रहे हैं। आयोग और अंग्रेजी सरकार से कहा कि किसानों के शोषण का हरजाना मिलना चाहिए। इसपर तत्कालीन सरकार के आदेश पर बागान मालिकों ने 25 फीसदी वापस हर्जाना देने को तैयार हो गये। इसका नतीजा यह हुआ कि एक दशक के भीतर बागान मालिकों को चम्पारण छोड़ना पड़ा।
गाँधीजी ने चम्पारण में शिक्षा का महत्व बताने और स्थापित करने के लिए 13 नवंबर 1917 को पूर्वी चंपारण के बरहरवा लखनसेन गांव में पहली बार बुनियादी विद्यालय की स्थापना की। ग्रामीणों के आत्मविश्वास पर निर्माण, गांवों की सफाई, स्कूलों और अस्पतालों के निर्माण की शुरुआत की और गांव नेतृत्व के प्रधान को अस्पृश्यता और महिलाओं के दमन को समाप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। गांधी ने 30 सितंबर 1917 और 17 जनवरी 1918 को पश्चिम चंपारण और मधुबन में संत राउत की मदद से भितिहारवा में बुनियादी विद्यालय की स्थापना की। इन विद्यालयों की स्थापना के पीछे उद्देश्य निरक्षरता से लड़ना और ग्रामीण लोगों के बीच जागरूकता पैदा करना था। अहमदाबाद में मजदूरों और खेड़ा पहुँचकर किसानों के लिए गाँधीजी ने आंदोलन किया, जहाँ उनको सफलता मिली। इसके बाद पूरे भारत में राष्ट्रीयता जग चुकी थी और गांधीजी पूरे भारत के लिए आंदोलन करने के लिए तैयार हो गये। असहयोग आंदोलन एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व किया। गांधीजी के उच्चादर्शों एवं सत्य के सम्मुख अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा और अंग्रेजी सरकार को देश छोड़कर जाना पड़ा। इस प्रकार 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ।
इतिहास के स्रोत बताते हैं कि गाँधी जी की माता पुतलीबाई धार्मिक स्वभाव वाली सहज सरल महिला थी। मोहनदास के व्यक्तित्व पर माता के चरित्र की छाप स्पष्ट पड़ी थी। पिता कर्मचँद गाँधी राजकोट के दीवान थे। गाँधीजी का जन्म 2 अक्टूबर सन् 1869 को गुजरात में पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचन्द्र गाँधी था।प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर में पूर्ण करने के पश्चात राजकोट से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर इंग्लैण्ड वकालत पढ़ने चले गए। वकालत पढ़कर लौटने पर वकालत प्रारंभ की। एक मुकदमे के सिलसिले में गाँधीजी को दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ भारतीयों की दुर्दशा देख बड़े दुखी हुए, उनमें राष्ट्रीय भावना जागी और वे वहीं भारतीयों के लिए आंदोलन शुरू किया जिसमें उन्हें सफलता मिली। गाँधीजी ने समाज में अछूतों के प्रति सह्दयता दिखलायी। गांधीजी ने अछूतों का उद्धार किया। उन्हें 'हरिजन' नाम दिया और गले लगाया। भाषा, जाति और धर्म संबंधी भेदों को समाप्त करने का आजीवन प्रयत्न किया। स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर जोर दिया। सूत कातने, सब धर्मों को आदर से देखने और सत्य, अहिंसा को जीवन में अपनाने की शिक्षा दी। गांधीजी ने विश्व को शांति का संदेश दिया। गांधीजी ने प्रेम और भाईचारे की भावना से भारत की जनता का हृदय जीता। वे देश में रामराज्य स्थापित करना चाहते थे। भारत की आजादी भारत और पाकिस्तान बनने के नाम पर मिला, देश दो टुकड़ों में विभाजित हुआ। इसका उन्हें बहुत दुख पहुंचा। भारत का दुर्भाग्य था कि इस नेता का मार्गदर्शन स्वतंत्रता पश्चात अधिक समय तक नहीं पा सके किंतु उनके आदर्श और सिद्धांत हमें सदैव याद रहेंगे।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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