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रहा न कोई पूछनहार

09/10/2019

रहा न कोई पूछनहार

कुमार नरेन्द्र सिंह

भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता को सुनिश्चित करने वाला संवैधानिक अनुच्छेद 370 को समाप्त किये जाने के साथ ही पाकिस्तान असहज नजर आने लगा है। उसकी बोली आक्रामक हो चली है। तेवर तल्ख नजर आने लगे हैं। यह अलग बात है कि उसके बोल- वचन और उसके तिलमिलाने को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने लगभग अनसुना, अनदेखा ही किया है। यह बिल्कुल स्वाभाविक भी था, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जगत में पाकिस्तान की कोई साख नहीं बची है। सच है कि दुनिया के तमाम देश अपने राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर ही अपनी नीतियां तय करते हैं।Þ इसीलिए कतिपय देश पाकिस्तान की तरफ भी झुकते या उसे समर्थन देते दिखायी दे रहे हैं। मालूम हो कि कश्मीर मामले पर केवल तीन देश- चीन, तुर्की, मलेशिया ही पाकिस्तान के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर उनका भी यही मानना है कि कश्मीर एक द्विपक्षीय मामला है। इसलिए भारत-पाकिस्तान को स्वयं ही इस समस्या का समाधान करना चाहिए।

यह भारतीय कूटनीति का ही असर है कि फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) के एशिया-पैसिफिक समूह ने पाकिस्तान को एनहैंस्ड एक्सपेडाइटेड फॉलो अप में डाल दिया है। इसका परिणाम यह होगा कि अब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं यथा वर्ल्ड बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि से वित्तीय सहायता पाने में नाकाम होगा। इस कदम के जरिये भारत ने पाकिस्तान की मुश्कें कस दी हैं।

कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने के तुरंत बाद पाकिस्तान इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश में जुट गया। दुनियाभर में वह दुष्प्रचार करने लगा कि वहां भारतीय सेना मुसलमानों का दमन कर रही है। वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान और राष्ट्रपति आरिफ अल्वी सहित अनेक मंत्रियों एवं पूर्व राजनयिकों ने अपने वक्तव्यों से यही साबित करने की कोशिश की कि आज भारत में एक हिन्दूवादी सरकार है। वह सरकार मुसलमानों पर अत्याचार कर रही है। इसलिए विश्व समुदाय को इसका संज्ञान लेना चाहिए। लेकिन अंतरराष्ट्रीय जगत ने पाकिस्तान के रोने को कोई तवज्जो नहीं दी। इसके दो कारण हैं। पहला तो यह कि भारत ने तमाम एहतियातों के साथ अपना कार्ड खेला। यानी वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह समझाने में सफल रहा कि कश्मीर उसका आंतरिक मामला है और इसीलिए अन्य देशों को उसके संबंध में प्रतिक्रिया देने का कोई हक नहीं है।

ठीक है कि शुरुआत में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की इच्छा जतायी थी। इसी तरह की इच्छा चीन ने भी जतायी थी, लेकिन भारत ने उन्हें स्पष्ट शब्दों में संकेत दे दिया कि कश्मीर के मामले में उसे किसी की मध्यस्थता की जरूरत नहीं है। इसके बाद अमेरिका और चीन दोनों ने कश्मीर मामले पर कुछ कहने से परहेज रखा है। वैसे यह भारत का कोई नया रुख नहीं है, क्योंकि भारत शुरू से ही कश्मीर को द्विपक्षीय मामला मानता रहा है। विगत में भी अनेक बार दुनिया के देशों ने मध्यस्थता की पेशकश की थी, लेकिन भारत का स्टैंड नहीं बदला। पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने का प्रयास एक बार जरूर हमें असहज करनेवाला था, जब कश्मीर मामले पर राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद की बैठक हुयी। वहां भी चीन को छोड़कर अन्य किसी भी देश ने पाकिस्तान को समर्थन नहीं दिया और न बैठक के बाद कोई बयान ही दिया गया। यह पाकिस्तान को परेशान करने वाला था। उसे उम्मीद थी कि वहां चीन की मदद से वह कश्मीर मामले को सुरक्षा परिषद तक घसीट ले जाएगा।

भारतीय कूटनीति के आगे पस्त

बहरहाल, पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं मिलने का कारण केवल यही नहीं है कि दुनिया की नजर में उसका आचरण संदेहास्पद रहा है या वह आतंकवाद को प्रश्रय देता है। इसके लिए भारत, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वह सक्रियता है, जिसने पाकिस्तानी दुष्प्रचार की हवा निकाल दी। पाकिस्तान के दुष्प्रचार को बेअसर करने के लिए प्रधानमंत्री ने एक के बाद एक फ्रांस की दो यात्राएं कीं और उसके सामने अपना पक्ष मजबूती से रखा। आज भारत और फ्रांस के आपसी हित इस कदर जुड़े हैं कि वे एकदूसरे से अलग नहीं हो सकते। कोई अनहोनी ही यह स्थिति बदल सकती है। इमरान खान को गुमान था कि कश्मीर में मुसलमानों के दमन की बात कर वह मुस्लिम देशों को अपने पाले में कर लेंगे। चूंकि पूर्व में ऐसा करने में पाकिस्तान कई बार कामयाब रहा था, इसलिए उसे भरोसा था कि इस बार भी वह मुस्लिम देशों का समर्थन जुटाने में सफल हो जाएगा। भारत अपना कूटनीतिक दांव संभाल कर चल रहा था। प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल ट्रंप से बात की, बल्कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन से भी बातचीत की। इसके अलावा उन्होंने संयुक्त अरब अमिरात और बहरीन की यात्राएं भी कीं। उधर विदेश मंत्री ने चीन और नेपाल की यात्रा की। सच तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं ही इस कूटनीतिक प्रयासों की तमाम कड़ियां संभाल रहे थे। इस क्रम में उन्होंने श्रीलंका, मालदीव, अफगानिस्तान आदि देशों के प्रमुखों से स्वयं बातचीत की और उनके सामने अपना पक्ष रखा। कहने की आवश्यकता नहीं कि मोदी उन्हें यह समझाने में सफल रहे कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। इसीलिए किसी दूसरे देश को उस मामले में किसी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं करना ही उचित होगा। हम देख सकते हैं कि भारत ने बड़े ही सुनियोजित और संयत तरीके से पाकिस्तानी दुष्प्रचार को रोका।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान को समर्थन नहीं मिलने का दूसरा कारण उसका वादाफरोश आचरण है। दुनिया जानती है और मानती भी है कि पाकिस्तान अपने वादे पर कायम नहीं रहता। सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान दुनिया का अकेला देश है, जो एक राज्य के रूप में आतंकवाद का पोषण करता है। जहां भी आतंकवाद है, वहां पाकिस्तान है, यह दुनिया के मन में समा चुकी है और उचित ही समायी है। अब यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान दुनियाभर में आतंकवाद का निर्यात करता है। आखिर ओसामा बिन लादेन भी तो वहीं छुपा हुआ था। समय-समय पर अमेरिका समेत अनेक देश उसे चेतावनी भी देते रहे हैं कि वह आतंकवाद को प्रश्रय देने से बाज आए। जहां तक पाकिस्तान की बात है, तो कश्मीर में भारत द्वारा उठाए गए कदम से वह इस कदर बौखला गया कि युद्ध की भाषा बोलने लगा। यह अलग बात है कि अब वह फिर बातचीत की वकालत कर रहा है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय में पाकिस्तान की विश्वसनीयता कितनी कम है, इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि जब इमरान खान ने अफगानिस्तान से कहा कि वहां फिर आतंकवाद बढ़ सकता है, तो अफगानिस्तान का जवाब था कि वहां पाक-प्रशिक्षित और पाक-प्रेषित आतंकवादी ही हमले करते हैं। यह भारतीय कूटनीति का ही असर है कि फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) के एशिया-पैसिफिक समूह ने पाकिस्तान को एनहैंस्ड एक्सपेडाइटेड फॉलो अप में डाल दिया है। इसका परिणाम यह होगा कि अब पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं यथा वर्ल्ड बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि से वित्तीय सहायता पाने में नाकाम होगा। इस कदम के जरिये भारत ने पाकिस्तान की मुश्कें कस दी हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि आज पाकिस्तान आर्थिक रूप से जर्जर है। भारत के प्रयासों से अब वह अंतरराष्ट्रीय वित्तिय संस्थाओं समेत अन्य बाहरी देशों से भी वित्तिय सहायता से महरूम हो जाएगा। यही कारण है कि पाकिस्तान अपना संयम खो चुका है और बेवजह प्रलाप कर रहा है। वैसे उसका प्रलाप सुनने को कोई तैयार नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि कूटनीतिक स्तर पर आज पाकिस्तान भारत के हाथों मात खा चुका है, लेकिन यह सोचकर भारत निंिश्चत नहीं हो सकता। अंतरराष्ट्रीय जगत में समीकरण हमेशा बनते-बिगड़ते रहते हैं।

आज मालदीव, नेपाल आदि देश भारत के खिलाफ नहीं दिखायी देते, लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि वे कभी भी पैंतरा बदल सकते हैं। स्मरण रहे कि यह वही मालदीव है, जिसने एक साल पहले भारतीयों के वहां नौकरी करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसी तरह नेपाल भी कई बार चीन के पाले में जाता दिखायी देता है। इसलिए सबसे बड़ी जरूरत यह है कि भारत और पाकिस्तान आपसी बातचीत को बहाल करें क्योंकि दोनों के बीच कायम समस्याओं का यही एकमात्र उचित उपाय है।


 
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