यथावत

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भ्रम में पड़ी रही कांग्रेस

19/06/2019

गभग छह महीने पहले मध्य प्रदेश में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मध्यप्रदेश में जीत की संजीवनी मिली थी। जीत की ये खुमारी अभी उतरी भी नहीं थी और लोकसभा चुनाव में जबरदस्त झटका लग गया। पार्टी इस बुरे सपने को जल्द भूलना चाहेगी। लेकिन ये सपना नहीं एक हकीकत है। जिसको भूलना आसान नहीं होगा। विधानसभा चुनावी परिणाम के बाद से ‘मोदी लहर’ के समाप्ति की घोषणा में लगी कांग्रेस को ये अंदाजा भी नहीं था कि 2019 में ‘मोदी सुनामी’ आने वाली है। कुल 29 सीटों में से भाजपा ने 28 पर जीत दर्ज की। कांग्रेस बमुश्किल एक सीट बचाने में सफल हो पाई। मध्यप्रदेश से आये लोकसभा चुनाव परिणाम ने राजनीति के कई मिथ तोड़ दिये। कांग्रेस का गढ़ कही जाने वाली सीटें और कई बड़े नेता अपना किला नहीं बचा सके। जिसमें दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम प्रमुख रूप से शामिल हैं। सिंधिया को हराने वाले कोई और नहीं बल्कि उनके ही ईर्द-गिर्द घूमने वाले शख्स केपी यादव रहे। गुना लोकसभा सीट पर केपी यादव ने सिंधिया को हरा कर कुछ ऐसा इतिहास रच दिया जैसे उत्तर प्रदेश में अमेठी सीट से स्मृति ईरानी ने।

बमुश्किल बचा पाए सीट
छिंदवाड़ा मुख्यमंत्री कमलनाथ का गढ़ माना जाता है। वे यहां से लगातार नौ बार चुनाव जीतते रहे हैं।
2014 के मोदी लहर में भी कमलनाथ यहां से चुनाव जीते थे। मुख्यमंत्री बनने के कारण यहां से उन्होंने
अपने बेटे नकुल नाथ को उतारा। यह सीट कमलनाथ के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन चुकी थी।
मुख्यमंत्री किसी तरह इस सीट को बचा पाए। नकुलनाथ ने करीब 37 हजार वोट से जीत हासिल की।
नकुलनाथ को 5,87,305 वोट मिले। वहीं, बीजेपी उम्मीदवार नत्थन शाह को 549769 वोट मिले हैं।

लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के मुख्य सिपहसलाहकार के रूप में जाने, जाने वाले सिंधिया की हार 1 लाख 25 हजार 549 जैसे बड़े अंतर से हुई है। सिंधिया की हार के साथ दूसरा बड़ा झटका कांग्रेस को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की हार के रूप में मिला। हालांकि भोपाल सीट हमेशा से भाजपा की गढ़ मानी जाती थी। लेकिन कांग्रेस की तरफ से दिग्विजय सिंह के नाम की घोषणा के बाद से एक आस जरूर जागी थी। लेकिन उम्मीद ज्यादा समय तक कायम नहीं रही। प्रज्ञा ठाकुर का नाम सामने आते ही पड़ला भाजपा का भारी हो गया। लेकिन प्रज्ञा ठाकुर की कट्टर छवि उनके लिए लाभदायक जरूर थी लेकिन उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता उनके और पार्टी के लिए लगातार मुसीबत बनती रही। लेकिन हर परिणामों की तरह भोपाल में मोदी के नाम का चस्पा लगते ही जीत पार्टी के खाते में आ गई।

नहीं बची दिग्विजय की साख
दिग्विजय सिंह के भोपाल लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अपने बेटे
जयवर्धन सिंह के साथ प्रचार और व्यवस्था की कमान संभाली थी।
भोपाल सीट से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को 8 लाख 66 हाजार 482
वोट मिले जबकि दूसरे नंबर पर रहे दिग्विजय सिंह 5 लाख 01 हाजार
660 वोट ही हासिल हो सके। प्रज्ञा सिंहठाकुर ने भोपाल की सीट को
3 लाख 64 हाजार 822 के बड़े अंतर से जीत लिया। भाजपा की प्रज्ञा
को 61 फीसदी से भी ज्यादा वोट मिला। जबकि दस साल तक लगातार मुख्यमंत्री रहे एवं 15 साल के बनवास
से लौटने के बाद भी दिग्विजय सिंह केवल 35.63 फिसदी वोट ही ला पाए।

मध्य प्रदेश
दल का नाम        सीट
बीजेपी                  28
कांग्रेस                 01
कुल                   29

2014 लोकसभा चुनाव के बाद बदले सियासी हालात में मध्य प्रदेश लोकसभा चुनाव 2019 के परिणाम पर सबकी निगाहें थी। लोकसभा चुनाव में देश सहित मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस बुरी तरह हारी है। यहां सिर्फ एक सीट छिंदवाड़ा (मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ) पर कांग्रेस मामूली अंतर से जीत पायी। यानी मुख्यमंत्री सिर्फ अपने बेटे की जीवा पाए। इससे प्रदेश कांग्रेस के नेताओं का मुख्यमंत्री पर बयान वार शुरू हो गया है। प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता गोविंद सिंह कमलनाथ पर सवाल उठा चुके हैं। करारी हार के बाद दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह ने सीधे संगठन नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने कहा है सही व्यक्ति को संगठन सौंपने की जरूरत है। 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य में दस साल तक बीजेपी की सरकार होने के बाद भी 2014 लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर था। मध्य प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने 27 सीटों पर जीत हासिल की थी। कांग्रेस महज दो सीटें ही निकाल पाने में कामयाब हो पाई थी। मगर इस बार राज्य में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार है। यहां बीजेपी के सामने 27 सीटों को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती थी। पर बीजेपी ने न केवल उस चुनौती को स्वीकारा बल्कि उसे सफलतापूर्वक खत्म भी किया।

छत्तीसगढ़

राज्य में पिछले साल के दिसंबर महीनों में हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की 15 साल पुरानी सरकार ढह गई थी। कांग्रेस को लंबे इंतजार के बाद एक बड़ी जीत मिली थी। समय का पहिया घूमा और इस लोकसभा चुनाव में एक बार फिर राज्य में कमल खिला। बीजेपी को 2014 के चुनावों में कुल 11 में से 10 सीटें मिली थीं। इस बार भाजपा ने अपने सभी सांसदों का टिकट काटते हुए नए चेहरों को मौका दिया। भाजपा का ये दांव पूरी तरह कामयाब भी रहा। पार्टी ने इस बार 50 फीसदी से ज्यादा मत लेकर नौ सीटों पर कब्जा किया। राज्य में यहां भी राष्ट्रवाद बड़ा मुद्दा था। छत्तीसगढ़ के मतदाताओं ने भी एयर स्ट्राइक, परिवारवाद, विकास की नीति, विदेशी कूटनीति, अजहर मसूद पर बैन, जैसे मुद्दों पर अपना मत दिया।

वीआईपी सीट पर भारी पड़ी बीजेपी 
छत्तीसगढ़ की राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र नक्सल प्रभावित होने के बावजूद वीआईपी सीटों में गिनी जाती है।
कांग्रेस के दिग्गज नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोती लाल वोरा का गढ़ हुआ करती थी। वहीं अब
लगातार 15 सालों तक मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह का क्षेत्र माना जाता है। उनके बेटे अभिषेक सिंह का
टिकट काटकर इस बार संतोष पांडे को बीजेपी ने प्रत्याशी बनाया था। संतोष पांडे का सीधा मुकाबला कांग्रेस
के कांग्रेस पार्टी ने भोला राम साहू से था। संतोष पांडे को 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिला और उन्होंने
अपने निकटतम प्रतिद्वण्दी कांग्रेस के भोला राम को एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया।

छत्तीसगढ़
दल का नाम           सीट
बीजेपी                09
कांग्रेस               02
कुल                 11

छत्तीसगढ़ की राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र नक्सल प्रभावित होने के बावजूद वीआईपी सीटों में गिनी जाती है। कांग्रेस के दिग्गज नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मोती लाल वोरा का गढ़ हुआ करती थी। वहीं अब लगातार 15 सालों तक मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह का क्षेत्र माना जाता है। उनके बेटे अभिषेक सिंह का टिकट काटकर इस बार संतोष पांडे को बीजेपी ने प्रत्याशी बनाया था। संतोष पांडे का सीधा मुकाबला कांग्रेस के कांग्रेस पार्टी ने भोला राम साहू से था। संतोष पांडे को 50 फीसदी से ज्यादा वोट मिला और उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वण्दी कांग्रेस के भोला राम को एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हराया।

बिहार

जाति और क्षेत्रीयता के ताने-बाने में बुना बिहार की राजनीति हमेशा से केंद्र में रहा है। राजनीतिक पंडित यहां की जातीय गणना और मतों के बंटवारे को अपने हिसाब से समझते और समझाते हैं। लेकिन 2019 के चुनावी परिणाम ने सभी पंडितों की जातीय गणना को उलट दिया। सभी के आंकड़े पलट गये। ‘भूराबाल साफ करो’ का नारा उछालने वालो की राजनीतिक पीढ़ियां हासिये पर पहुंच गई। विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी आरजेडी एकएक सीट पर जीत के लिए तरसती दिखी। खुद लालू यादव की पुत्री को हार का समाना करना पड़ा। आरजेडी अपना खाता तक नहीं खोल पाया। कांग्रेस मात्र एक सीट पर जीत पाई। बीजेपी के साथ आने पर पिछले लोकसभा चुनाव में दो सीटों पर सिमटने वाली जेडीयू 17 में से 16 सीटें जीत गई। वहीं बीजेपी ने एक बार फिर से इतिहास रचते हुए 17 में से 17 सीटें अपने नाम कर ली। एलजेपी ने भी 6 में से 6 सीटें जीता।

गिरिराज पास, कन्हैया फेल 
बेगूसराय में भाजपा नेता एवं केंद्रीय राज्यमंत्री गिरिराज सिंह के
सामने कन्हैया के मैदान में उतरने से यह देश की हॉट सीटों में
से एक बन गई। बेगूसराय कभी वामपंथ का गढ़ हुआ करता था।
मगर आज वह गढ़ ढह गया है। उसे फिर से मजबूत करने का
जिम्मा इस बार कन्हैया कुमार के कंधों पर डाला गया था। भाजपा
ने गिरिराज सिंह की सीट बदलकर यहां से उतारा। दोनों भूमिहार
बिरादरी के हैं और दोनों अपने बयानों से मीडिया में छाये रहते है।
लगातार जीत का दावा कर रहे कन्हैया को बेगुसराय ने बेहद
निराश किया। गिरिराज सिंह ने कन्हैया कुमार को 4,22,217 मतों के बड़े अंतर से पराजित किया।
साल 2014 में डॉ. भोला सिंह बीजेपी के टिकट से यहां से विजयी हुए थे। उन्होंने पचास हजार के करीब
वोट से जीत मिली थी। 2014 में भाजपा को यहां 39.72 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं इस बार पार्टी को
56.48 फीसदी वोट मिले।

बिहार
दल का नाम                   सीट
बीजेपी                         17
जदयू                           16
लोजपा                        06
कांग्रेस                        01
कुल                           40

बिहार में महागठबंधन को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। वह कांग्रेस की एक मात्र सीट जीत पाई। एनडीए ने 40 सीटों में से 39 सीटों पर कब्जा किया। महागठबंधन का जातीय समीकरण और जातिगत आंकड़ा इन चुनावों में पूरी तरह से फेल होता नजर आया। बिहार की राजनीति के किंग लालू यादव के परिवार के दोनों सदस्य समधी चंद्रिका राय और बेटी मीसा भारती को हार झेलनी पड़ी। बिहार में मुस्लियम-यादव गठजोड़ के अलावा महागठबंधन ने कोइरी जाति को साधने के लिए उपेंद्र कुशवाहा (रालोसपा), दलितों के लिए जीतन राम मांझी (हम) और मल्लाह को साधने के लिए मुकेश सहनी (वीआईपी) को साथ लाकर बड़ा जातीय समीकरण बनाने की कोशिश की। कभी यह तीनों एनडीए में हुआ करते थे। मगर यह समीकरण जमीन पर वोट में बदलता नजर नहीं आया।

स्पष्ट तौर पर बिहार में भी इस चुनाव में राष्ट्रवाद और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यों का जादू मतदाताओं के सिर चढ़कर बोला। रघुवंश प्रसाद वैशाली लोकसभा क्षेत्र में आरजेडी के प्रत्याशी थे। 1996 से 2009 तक लगातार पांच बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद रघुवंश प्रसाद 2014 में लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के राम किशोर सिंह से चुनाव हार गए थे। 2019 में एक बार फिर एलजेपी इनके सामने थी लेकिन इस बार उम्मीदवार बदला हुआ था। इस बार उनके सामने वीणा देवी थीं। वीणा देवी ने उन्हें 2,34,584 वोटो से हरा दिया। वीणा देवी को 52.87 फीसदी वोट मिले तो वहीं रघुवंश प्रसाद को 31.04 फिसदी मत मिले।

2009 के परिसीमन में पटना लोकसभा क्षेत्र को बांटकर पटना साहिब और पाटलिपुत्र क्षेत्र बनाए गए। 2014 के मोदी लहर में भाजपा के रामकृपाल यादव पाटलिपुत्र से जीत हासिल किए थे। वे कभी लालू यादव के सबसे करीबी नेता हुआ करते थे। उन्होंने लालू यादव की बड़ी बेटी मीसा भारती को हराया था। तब भाजपा को 39.16 फीसदी वोट मिले थे। इस चुनाव में भाजपा ने एक बार फिर रामकृपाल यादव को यहां से मैदान में उतारा। उनके सामने महागठबंधन ने मीसा भारती थी। मुकाबला 2014 की तरह ही था। नतीजा में समान आया। मीसा भारती को 40 हजार के करीब वोटों से हार का मुंह देखना पड़ा। वही भाजपा को इस चुनाव में 47.28 फीसदी वोट मिले। जबकि महागठबंधन को 43 प्रतिशत वोट ही मिला।

ओडिशा

पूरे देश में मोदी की सुनामी चली लेकिन ओडिशा आते-आते यह कुछ कमजोर पड़ गई। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक अपना अभेद्य किला बचाने में लगभग कामयाब रहे। सूबे की कुल 21 लोकसभा सीटों में से बीजेडी 12 और 8 सीटों पर बीजेपी जीतने में कामयाब रही। वहीं कांग्रेस के खाते में मात्र एक सीट आई। बावजूद इसके राज्य में बीजेपी की बढ़ती राजनीतिक जमीन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 2014 की तुलना में बीजेपी ने यहां अपनी ताकत काफी बढ़ाई। उस चुनाव में बीजेडी ने 20 सीटों पर कब्जा जमाया था। बीजेपी को सिर्फ 1 सीट से संतोष करना पड़ा था। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की बेहतर रणनीति और मोदी लहर ने पार्टी की एक सीट को बढ़ाकर 9 कर दिया। बीजेडी को 42.76 प्रतिशत मत मिले। वहीं बीजेपी 38.37 फिसद वोट शेयर के साथ दूसरे स्थान पर रही।

जबकि कांग्रेस को 13.8 प्रतिशत मत मिला। लोकसभा में महिलाओं की ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी की बात होती रही है । महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का मुद्दा जोर शोर से उठता रहा है। लेकिन अभी तक ये बिल पास हो नहीं सका है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने इस बार अपने मैनिफेस्टो में कहा था कि अगर वो सत्ता में आती है तो महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखेग। लेकिन 17वीं लोकसभा में सबसे ज्यादा महिलाएं संसद पहुंची हैं। इनमें से सात सांसद ओडिशा से हैं। जिनमें से 5 बीजू जनता दल से और दो बीजेपी से। बीजेडी की इन सांसदों में अब तक की सबसे कम उम्र की आदिवासी महिला सांसद चंद्राणी मुर्मू भी शामिल हैं।

नहीं चला संबित का जादू
संबित पात्रा का इस सीट पर मुकाबला बीजेडी के पिनाकी मिश्रा से था। पिनाकी मौजूदा सांसद हैं और पिछली
बार लोकसभा चुनाव में उन्हें सवा पांच लाख से ज्यादा वोट मिले थे। कांग्रेस ने इस सीट से सत्य प्रकाश
नायक को टिकट दिया था। ये सीट चर्चा में भाजपा नेता और प्रवक्ता संबित पात्रा के कारण बनी रही। पहली
बार चुनावी मैदान में उतरे संबित पात्रा अपने अलग चुनाव प्रचार के कारण खूब चर्चा में रहे। हालांकि इन
चर्चाओं को पात्रा वोट में तब्दील करने में चूक गए और पिनाकी मिश्रा से कड़े मुकाबले में 11,714 वोटों से
हार गये। संबित को 46.37 फिसदी तो पिनाकी को 47.4 मत मिले।

 

ओडिशा
दल का नाम                           सीट
बीजेडी                                12
बीजेपी                                08
कांग्रेस                               01
अन्य                                 00
कुल                                 21

मुर्मू की उम्र अभी केवल 25 साल है और वह इंजीनियर हैं। मुर्मू ने ओडिशा की केन्झार लोकसभा सीट से जीत दर्ज की है। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने चुनाव से पहले कहा था कि इस बार के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी 33 प्रतिशत सीट महिलाओं को देगी। नवीन ने अपना वादा निभाया और 21 सीटों में से 7 सीटों पर महिला उम्मीदवारों को लड़ाया। इन सात में से पांच उम्मीदवारों ने जीत भी हासिल की। ओडिशा से बीजेपी की भी दो महिला उम्मीदवार इस बार संसद पहुंच रही हैं। बीजेपी ने छह महिलाओं को उम्मीदवार बनाया था। राज्य से इस बार कुल मिलाकर सात महिला सांसद लोकसभा में बैठेंगी। वहीं अगर ओडीशा विधान सभा परिणाम की बात करें तो यहां से भी बीजेडी और नवीन पटनायक के लिए अच्छी खबर आई। 147 सदस्यों वाली विधानसभा में बीजेडी ने 105 सीटें जीत ली हैं। इस तरह उसे स्पष्ट बहुमत मिल है। बीजेपी को राज्य में 26 सीटें मिली हैं। जबकि यूपीए को 15 सीटें। नवीन पटनायक लगातार पांचवीं बार राज्य की कमान संभाल रहे हैं।



 
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