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भगवान चित्रगुप्त और कलम दवात की पूजा

28/10/2019

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

चित्रगुप्त जयंती का त्योहार कायस्थ वर्ग में प्रचलित है। कायस्थ समुदाय के लोग भगवान चित्रगुप्त जी को अपना ईष्ट देवता तथा अपने को इनका वंशज मानते हैं। कहा जाता है कि ब्रह्माजी ने चार वर्ण बनाए तब यम जी ने उनसे मानवों का विवरण रखने में सहयोग मांगा। ब्रह्माजी ने 11 हजार वर्षों की तपस्या की, जब आंखें खोली तो देखा कि आजानभुज करवाल पुस्तक कर कलम मसिभाजनम" अर्थात एक पुरुष को अपने सामने कलम, दवात, पुस्तक तथा कमर में तलवार बांधे अपने सामने पाया। तब ब्रह्मा जी ने कहा कि `हे पुरुष तुम कौन हो, तब वह पुरुष बोला मैं आपके चित्त में गुप्त रूप से निवास कर रहा था, अब आप मेरा नामकरण करें और मेरे लिए जो भी दायित्व हो मुझे सौपें। तब ब्रह्माजी बोले जैसा कि तुम मेरे चित्र (शरीर) में गुप्त (विलीन) थे इसलिये तुम्हे चित्रगुप्त के नाम से जाना जाएगा।'

आधुनिक विज्ञान की अगर बात करें तो उसने यह सिद्ध कर दिया है कि हमारे मन में जो विचार आते हैं वे सभी चित्रों के रूप में महसूस होते हैं। इसलिए चित्रगुप्त की प्रासंगिकता आज के या फिर आदिकाल के संदर्भ में सर्वोपरि और प्रमाणित मिलती है। कहा जाता है कि भगवान चित्रगुप्त धरती पर विचरण करने वाले सभी जीवों के विचारों को संग्रहित कर कर्मों के आधार पर जीवों के परलोक व पुनर्जन्म का निर्णय सृष्टि के प्रथम न्यायाधीश के तौर पर करते हैं। भगवान चित्रगुप्त जी के हाथों में किताब, कलम, दवात का अर्थ होता है कुशल लेखक हैं और इनकी लेखनी से जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय दिए जाने का लेखा-जोखा। आदिकाल से कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान है। ये भी माना जाता है कि यमराज और चित्रगुप्त की पूजा एवं उनसे अपने बुरे कर्मों के लिए क्षमा मांगने से नरक से मुक्ति मिलती है। 

कायस्थ परिवारों में आदि काल से चित्रगुप्त पूजन में दूज पर एक कोरा कागज लेकर उस पर 'ॐ' अंकित कर पूजने की परंपरा है। 'ॐ' परात्पर परम ब्रह्म का प्रतीक है। सनातन धर्म के अनुसार परात्पर परम ब्रह्म निराकार विराट शक्तिपुंज हैं, जिनकी अनुभूति सिद्धजनों को 'अनहद नाद' (कानों में निरंतर गूंजनेवाली भ्रमर की गुंजार) के रूप में होती है। सृष्टि में कोटि-कोटि ब्रह्मांड हैं, हर ब्रम्हांड के रचयिता ब्रम्हा, पालक विष्णु और नाशक शंकर हैं किन्तु चित्रगुप्त कोटि-कोटि नहीं हैं, वे एकमात्र हैं। वे ही ब्रम्हा, विष्णु, महेश के मूल हैं।

कालांतर में मूर्ति पूजा का प्रचलन बढ़ने और विविध पूजा-पाठों, यज्ञों, व्रतों से सामाजिक शक्ति प्रदर्शित की जाने लगी तो कायस्थों ने भी चित्रगुप्त जी का चित्र व मूर्ति गढ़कर जयंती मानना शुरू कर दिया। इसे 300 वर्षों के बीच हुआ माना जाता है, जबकि कायस्थों का अस्तित्व वैदिक काल से है। विभिन्न पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा की कई विभिन्न संतानें थीं, जिनमें ऋषि वशिष्ठ, नारद और अत्री जो उनके मन से पैदा हुए, उनके शरीर से पैदा हुए कई पुत्र जैसे धर्म, भ्रम, वासना, मृत्यु और भरत सर्वविदित हैं। लेकिन चित्रगुप्त के जन्म की कहानी भगवान ब्रह्मा के अन्य संतानों से कुछ अलग मिलती है। ग्रंथों की मानें तो भगवान चित्रगुप्त को महाशक्तिमान राजा के नाम से सम्बोधित किया गया है। ब्रह्मदेव के 14 मानस पुत्र होने के कारण इन्हें ब्राह्मण माना जाता है। इनकी दो शादियां हुई, पहली पत्नी ब्राह्मण कन्या सूर्यदक्षिणा नंदनी थीं। इनसे चार पुत्र रत्नों भानू, विभानू, विश्वभानू और वीर्यभानू का जन्म हुआ। दूसरी पत्नी ऋषि कन्या एरावती शोभावति थी। इनसे आठ पुत्रों चारु, चितचारु, मतिभान, सुचारु, चारुण, हिमवान, चित्र और अतिन्द्रिय का जन्म हुआ।

एक कथा के अनुसार सौराष्ट्र में एक राजा हुए जिनका नाम सौदास था। राजा अधर्मी और पाप कर्म करने वाला था। इस राजा ने कभी कोई पुण्य का काम नहीं किया था। एकबार शिकार के समय जंगल में भटक गया। वहां उन्हें एक ब्राह्मण दिखा जो पूजा कर रहे थे। राजा उत्सुकतावश ब्राह्ममण के समीप गया और उनसे पूछा कि यहां आप किनकी पूजा कर रहे हैं। ब्राह्मण ने कहा आज कार्तिक शुक्ल द्वितीया है, इस दिन मैं यमराज और चित्रगुप्त महाराज की पूजा कर रहा हूं। इनकी पूजा नरक से मुक्ति प्रदान करने वाली है। राजा ने तब पूजा का विधान पूछकर वहीं चित्रगुप्त और यमराज की पूजा की। 

काल की गति से एक दिन यमदूत राजा के प्राण लेने आ गये। दूत राजा की आत्मा को जंजीरों में बांधकर घसीटते हुए ले गये। लहुलुहान राजा यमराज के दरबार में जब पहुंचा तब चित्रगुप्त ने राजा के कर्मों की पुस्तिका खोली और कहा कि हे यमराज यूं तो यह राजा बड़ा ही पापी है इसने सदा पाप कर्म ही किए हैं परंतु इसने कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को हमारा और आपका व्रत पूजन किया है अत: इसके पाप कट गये हैं और अब इसे धर्मानुसार नरक नहीं भेजा जा सकता। इस प्रकार राजा को नरक से मुक्ति मिल गयी। इस तरह से कायस्थ समाज के लोगों द्वारा प्रति वर्ष आयोजित होने वाले इस पूजन में सभी जाति-धर्म के लोग शामिल होते हैं। पूजन के उपरांत भोज खिलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस पूजन की खास बात ये है कि पूजन के समय कलम और दवात की पूजा करने के बाद कायस्थ समुदाय के लोग वर्ष में इसी एकदिन अपनी कलम को नहीं चलाते हैं और फिर दूसरे दिन पूजन के स्थान से लेकर अपनी दिनचर्या में कलम का उपयोग करते हैं। कायस्थों के लिए चित्रगुप्त पूजा एक अनुष्ठान के तौर पर है, इसे बड़े हर्षोल्लास के साथ इन परिवारों द्वारा मनाया जाता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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