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पूरे हुए जज, न्याय होगा जल्द

01/07/2019

च्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में लंबित मुकदमों की लगातार बढ़ती संख्या और न्यायाधीशों के रिक्त पद हमेशा ही चिंता का सबब रहे हैं। उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 31 और उच्च न्यायालयों में 1079 है। पिछले महीने, शीर्ष अदालत में चार नये न्यायाधीशों की शपथ के साथ ही पहली बार ऐसा हुआ जब उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश का एक भी पद रिक्त नहीं है। उच्च न्यायालयों में अभी भी न्यायाधीशों के करीब 390 पद रिक्त हैं। सरकार ने 2008 में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों की संख्या 26 से बढ़ाकर 31 की थी। शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों के एक- दो ही नहीं, बल्कि छह पद तक रिक्त रहे हैं। कुछ महीनों के अंदर प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे सेवानिवृत्त होने वाले हैं। न्यायमूर्ति सप्रे का 27 अगस्त को और प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति गोगोई का कार्यकाल 17 नवंबर को पूरा हो रहा है। समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाये गये तो शीर्ष अदालत में न्यायाधीशों के दो पद रिक्त हो जायेंगे।

पहली बार यहां न्यायाधीशों का एक भी पद रिक्त नहीं है लेकिन यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रहेगी।

उच्चतम न्यायालय के इतिहास में पहली बार एक साथ तीन महिला न्यायाधीश -न्यायमूर्ति आर भानुमति, न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी- कार्यरत हैं। इससे पहले दो महिला न्यायाधीश रही हैं। इनमें न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा और न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई, बाद में न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति आर भानुमति और इसके बाद न्यायमूर्ति आर भानुमति और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा शामिल हैं। संसद ने 2008 में उच्चतम न्यायालय, न्यायाधीशों की संख्या, कानून 1956 में संशोधन कर प्रधान न्यायााधीश के अलावा इसके न्यायाधीशों की संख्या 25 से बढ़ाकर 30 करने संबंधी विधेयक को मंजूरी दी थी। इसके बावजूद पिछले 11 साल में कभी भी उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों के सारे पद भरे नहीं थे।

सरकार ने 2008 में उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर देते हुये संसद में कहा था कि 31 मार्च 2007 की स्थिति के अनुसार शीर्ष अदालत में 41,581 मुकदमे लंबित हैं। सरकार ने यह दलील भी दी थी कि प्रधान न्यायाधीश के अनुसार मुकदमों की लगातार बढ़ती संख्या की वजह से न्यायाधीशों को बहुत अधिक दबाव में काम करना पड़ रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार देश की शीर्ष अदालत में आज भी 58 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें से 36,856 विचारणीयता के स्तर पर हैं जबकि 21312 मुकदमे नियमित सुनवाई के लिये रखे जाते हैं। इस समय न्यायालय में संविधान पीठ के विचारार्थ 558 मुकदमे लंबित हैं, जिनमे सिर्फ 55 ही मुख्य मामले हैं और शेष 503 इन मामलों से जुड़े हुये हैं। एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि 1950 के मूल संविधान में उच्चतम न्यायालय के लिये प्रधान न्यायाधीश और सात न्यायाधीशों की कल्पना की गयी थी। जरूरत पड़ने पर इनकी संख्या बढ़ाने का मसला संसद पर छोड़ दिया गया था।

प्रारंभिक चरण में उच्चतम न्यायालय के सारे न्यायाधीश एकसाथ बैठकर मामलों की सुनवाई करते थे। मुकदमों की संख्या बढ़ने पर संसद ने 1956 में शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाकर 11 की। फिर 1960 में इनकी संख्या 14, वर्ष 1978 में 18 और 1986 मेंं 26 की गयी थी। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने के साथ ही न्यायाधीशों ने दो और तीन सदस्यीय पीठ में बैठना शुरू किया। किसी विवाद या मतभिन्नता को सुलझाने के लिये ऐसे विषयों की पांच या उससे अधिक न्यायाधीशों की पीठ सुनवाई करती थी। इस समय उच्चतम न्यायालय में पांच न्यायाधीशों की पीठ के विचारणीय 408, सात न्यायाधीशों की पीठ के विचारणीय 13 और नौ न्यायाधीशों की पीठ के विचारणीय 137 मामले लंबित हैं। उधर, उच्च न्यायालयों में 31 मई को लंबित 43,49,887 मुकदमों में से 27,39,595 मुकदमे एक साल से भी अधिक समय से लंबित हैं। सवाल जनहित याचिकाओं का भी है। फरवरी 2008 में न्यायालय ने मेडिकल और अन्य शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश, मकान मालिक किरायेदार के विवाद, नौकरी, पेंशन और ग्रेच्युटी तथा कुछ अपवादों को छोड़ केन्द्र तथा राज्य सरकारों के खिलाफ दायर मुकदमों पर जनहित याचिका के रूप में विचार नहीं करने का फैसला किया था। विचारणीय सवाल यह है कि क्या वास्तव में ऐसा हो रहा है?


 
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