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सीएम: बंदरबांट का फॉर्मूला

06/07/2019

सीएम: बंदरबांट का फॉर्मूला


चुनाव हुए नहीं और सीएम पद को लेकर नये-नये फॉर्मूले आने शुरू हो गये हैं। 2+2+1 का नया फॉर्मूला दिया है आरपीआई नेता रामदास अठावले ने। उनके मुताबिक गठबंधन के तीनों दलों को बारी- बारी से मुख्यमंत्री पद मिलना चाहिए।

लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतने के बाद से शिवसेना का भाजपा पर दबाव फिर शुरू हो गया है। नंबर दो रहने के बावजूद शिवसेना लगातार यह क्यों कह रही है कि अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। शिवसेना के 53 वें स्थापना दिवस समारोह में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि शिवसेना को सब कुछ सम समान चाहिए। ठाकरे के इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि शिवसेना राज्य की 288 सीटों में से 144 सीटें भाजपा से मांगेगी। हालांकि भाजपा किसी भी कीमत पर शिवसेना को 144 सीटें नहीं देने जा रही।
पिछले विधानसभा चुनाव में शिवसेना तथा भाजपा ने अलग अलग चुनाव लड़ा था। उस वक्त शिवसेना सिर्फ 63 सीटें जीत सकी थी। बहरहाल, अकाल प्रभावित क्षेत्रों में जाकर मुख्यमंत्री को ललकारने। अगला मुख्यमंत्री शिवसेना का होने, दो कैबिनेट मंत्री पद देने। उप मुख्यमंत्री पद को लेकर राजनीति करने जैसी बातों से साफ हो जाता है कि शिवसेना दबाव तंत्र का सहारा लेकर भाजपा को यह बताना चाहती है कि वह जितना मिला है, उससे संतुष्ट नहीं है। हमारे बीच सब कुछ पहले से ही तय है, यह कहकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भले ही सात्वंना दे रहे हों। लेकिन शिवसेना झुकने को तैयार नहीं है। भाजपा-शिवसेना तथा आरपीआई इन तीनों राजनीतिक दलों के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर मची होड़ के बीच भाजपा नेता गिरीश महाजन का कहना है कि अगला मुख्यमंत्री भाजपा का ही होगा तो शिवसेना प्रवक्ता ताल ठोंककर शिवसेना का मुख्यमंत्री होने का दावा कर रहे हैं।
इस सब के बीच आर पी आई नेता रामदास आठवले ने एक नया प्रस्ताव सामने रखा है। उनका कहना है कि अगर आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा, शिवसेना तथा आरपीआई गठबंधन की सरकार बनी तो पहले दो साल सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी का मुख्यमंत्री बनेगा, उसके बाद के दो साल दूसरे दल और अंतिम एक वर्ष आरपीआई का मुख्यमंत्री होगा। आठवले ने इससे पहले भाजपा-शिवसेना को यह सलाह दी थी कि 2019 में एक बार फिर उनकी सरकार बनी तो मुख्यमंत्री पद ढाई-ढाई साल के लिए दो पक्षों को दिया जाए। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री पद के लिए अभी से जंग क्यों। जिस पद के लिए चुनाव परिणाम सामने आने के बाद जंग छिड़नी चाहिए थी, उस पद के लिए अभी से हंगामा क्यों मचा है।
दरअसल, पिछले विधानसभा चुनाव में शिवसेना, भाजपा के मुकाबले सीट पाने के मामले में बहुत पीछे रही थी। ऐसे में शिवसेना चाहती है कि सीटें भले ही कम आये लेकिन मुख्यमंत्री पद उसे भी मिले। पिछले दिनों पहली बार यह देखने को मिला कि भाजपा तथा शिवसेना के विधायकों की बैठक एक साथ हुई। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की भाजपा मुख्यालय में हुई बैठक में अबकी बार 220 के पार का नारा देने के साथ साथ सहयोगी दल के उम्मीदवारों को जिताने में पूरी ताकत लगाने पर जोर दिया गया। ऐसे में शिवसेना की ओर से अगला मुख्यमंत्री हमारा ही होगा, यह कहना यह बता रहा है कि शिवसेना मन से नहीं अपितु केवल दिखावे के लिए भाजपा के साथ है। भाजपा के मुकाबले हमारा हिंदुत्व प्रखर है, यह बताने के लिए शिवसेना ने राम मंदिर का मुद्दा सामने लाया है।
राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में मेरा महाराष्ट्र भगवा महाराष्ट्र अभियान के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत में शाखा प्रमुख, ग्राम पंचायत के हर वार्ड में उपशाखा प्रमुख की नियुक्ति शिवसेना की ओर से की जा रही है। विभाग प्रमुखों से यह कहा गया है कि वे 14 से 27 जुलाई की कालावधि में उक्त अभियान चलाएं। अयोध्या में राम मंदिर बनाने का शंखनाद करने के बाद औरंगाबाद, नासिक तथा शिर्डी में किसानों के साथ संवाद साधने के पीछे का सच क्या है, यह बताने की जरूरत नहीं है। कुल मिलाकर शिवसेना के व्यवहार को देखकर यह लगता है कि शिवसेना भाजपा से आगे निकलना चाहती है, इसीलिए कभी उसे भगवान राम याद आते हैं तो कभी किसान। लेकिन सच तो यह है कि शिवसेना प्रमुख की यह जंग शिवसेना के अस्तित्व को बचाने के अलावा कुछ और नहीं है।


 
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