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आरसेप : गरज सिर्फ हमारी नहीं

08/11/2019

अनिल बिहारी श्रीवास्तव

रीजनल कंप्रेहेंसिव इकॉनामिक पार्टनरशिप (आरसेप) में फिलहाल शामिल नहीं होने के भारत के फैसले से जुड़ा नफा-नुकसान एक अलग बात है। लेकिन हमारे यहां मीडिया का एक वर्ग, अर्थशास्त्र के कुछ विद्वान और चीन अवश्य परेशान है। चीन में सरकारी नियंत्रण वाले अंग्रेजी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने सुझाव दिया है कि भारत को आरसेप में शामिल होने के लिए मनाना चाहिए। भारत को किस तरह से समझाया जाए इस पर विचार करना जरूरी है। ग्लोबल टाइम्स ने सलाह दी है कि महाशक्ति बनने के अपने सपने को साकार करने के लिए भारत को आरसेप में शामिल होना चाहिए। बैंकाक में आयोजित आरसेप सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समझौते में शामिल नहीं होने की घोषणा की थी। सात वर्ष पूर्व भारत आरसेप या मुक्त व्यापार समझौते पर विचार-विमर्श में शामिल हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि अपने किसानों, मध्यम और लघु उत्पादकों और डेयरी सेक्टर पर नकारात्मक प्रभाव की आशंकाओं के कारण भारत इस समझौते में शामिल नहीं हो रहा है। ऐसे फैसलों से हमारे किसानों, व्यवसायियों, पेशेवरों और उद्योगपतियों का काफी कुछ दांव पर लगता है। भारत को विशाल बाजार और क्रय शक्ति के बूते दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने वाले हमारे कामगार और उपभोक्ता महत्वपूर्ण हैं। आरसेप मुक्त व्यापार समझौते के संबंध में हमारी चिंताओं और मुद्दों का समाधान नहीं होने से भारत के लिए इसमें शामिल होना संभव नहीं है। 
भारत की आपत्तियों में एक बात उत्पाद की उत्पत्ति के नियमों से जुड़ी आशंकाओं की भी थी। भारतीय वार्ताकारों ने मुक्त व्यापार समझौते को तैयार करने के तरीके पर आपत्ति उठाई। इसमें सेवाओं और निवेश के नियमों को आसान करने के साथ 80 से 90 प्रतिशत सामान पर आयात शुल्क लगभग समाप्त करने की बात है। स्वाभाविक है कि सस्ता और घटिया माल अपने बाजारों में भरवाने का जोखिम कैसे उठाया जा सकता है? यहां  एक वाजिब सवाल है, मुद्दों का हल निकले बगैर भारत ऐसे किसी समझौते में कैसे शामिल हो सकता है? दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी वाले क्षेत्र में बन रहे नए मुक्त व्यापार ब्लाक से भारत के अलग रहने का फैसला चीन, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के लिए झटका है। मंदी, बेरोजगारी और गिरती जीडीपी से जूझ रहे चीन को अमेरिका से ट्रेड वॉर के चलते एक वैकल्पिक बड़े बाजार की जरूरत है। आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की आंखें विशाल भारतीय बाजार से चौंधियाई हुई हैं। उन्हें दुग्ध उत्पाद खपाने के लिए भारत से बेहतर बाजार नहीं दिख रहा। समझौते में आसियान देश ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम के अलावा पांच मुक्त व्यापार पार्टनर-चीन, जापानए,साउथ कोरिया, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया शामिल हैं। अधिकांश आसियान देश भारत की चिंताओं से सहमत हैं, लेकिन चीनी दबदबे के चलते चुप रहे। उन्हें अभी भी भारत के साथ आने का भरोसा है। 
वैसे ही चीन और अन्य देशों के साथ व्यापार घाटे से भारत परेशान है। चीन के साथ यह 53 से 54 अरब डॉलर, साउथ कोरिया से 12 अरब डॉलर, इंडोनेशिया से 10.6 अरब डॉलर, जापान से 7.9 अरब डॉलर, सिंगापुर से  4.7 अरब डॉलर और थाईलैंड के साथ 3 अरब डॉलर है। भारत को इन देशों में पर्याप्त मार्केट एक्सेस नहीं मिल रहा। चीनी माल से अटे हमारे बाजार को और अधिक खोलने पर स्थानीय उत्पादकों और कृषकों के हितों की रक्षा कैसे होगी? चीन एक बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब है। चीन में लेबर सस्ता है। उनके माल की गुणवत्ता जगजाहिर है। न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया में दुग्ध उत्पादन बहुत अधिक है। वहां का 12.15 रुपये लिटर का दूध स्थानीय डेयरी सेक्टर के लिए खतरा नहीं खड़ा कर देगा? नि:संदेह भारत ऐसे विशाल मुक्त व्यापार ब्लाक से अलग रहने का जोखिम अधिक समय तक नहीं उठा सकता। लेकिन उसकी चिंताओं का निराकरण भी जरूरी है। मुद्दों का समाधान होने पर भारत आरसेप में शामिल हो सकता है। सरकार व्यापार में प्रतिस्पर्धा का महत्व जानती है पर हमारे कई क्षेत्र अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं। भारत में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना होगा। साथ ही तकनीकी विकास से उद्योगों, कृषि और डेयरी सेक्टर को प्रतिस्पर्धी बनाना जरूरी है। 
मोदी सरकार के निर्णय पर देश में ही दो तरह की प्रतिक्रियाएं आईं। अधिकांश उद्योगपतियों, कृषि और डेयरी क्षेत्र की हस्तियों और कई अर्थशास्त्रियों ने इसे राष्ट्रहित में सही कदम माना है। आरसेप पर मोदी सरकार को घेरने वाले विपक्षी दलों विशेषकर कांग्रेस ने इसे अपनी जीत बता दिया। कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट किया है कि राहुल गांधी और कांग्रेस के विरोध के कारण मोदी सरकार पीछे हटने पर बाध्य हुई है। ऐसी बातों का कोई मतलब नहीं है। एक बात और नोटिस की गई कि वामपंथी झुकाव वाले देशी मीडिया का एक बड़ा वर्ग सरकार के फैसले को सही नहीं मान रहा। प्रचारित किया जा रहा है कि मानो आरसेप से दूर रहने का फैसले के पीछे अमेरिकी दबाव है। उनके अनुसार इससे एक बड़े बाजार का फायदा उठाने से भारत वंचित हो जाएगा। कुल  मिलाकर जितने ज्ञानी उतनी बातें हो रही हैं। बाजार की जरूरत अकेले भारत को नहीं है। जितनी गरज हमारी हैए उससे अधिक चीन या अन्य देशों की भी है। सरकार का फैसला सही है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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