लेख

Blog single photo

स्वच्छता का सम्मान

11/09/2019

प्रमोद भार्गव

अंतरराष्ट्रीय 'बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन' द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को स्वच्छता के परिप्रेक्ष्य में सम्मानित करने का फैसला लिया गया है। यह एक तरह से 'स्वच्छ भारत अभियान' के संकल्प और उसके सफल क्रियान्वयन का सम्मान है। जब मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो उन्होंने गांवों में शौचालयों के निर्माण को एक संकल्प का रूप दिया। इसके तहत खुले में शौच की प्रवृत्ति को समाप्त करने का लक्ष्य तय किया गया था। गांधी जयंती 2 अक्टूबर 2014 को जब इस संकल्प का आरंभ हुआ तब देश में केवल 38.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास शौचालयों की सुविधा थी। नवीन आंकड़ों के मुताबिक अब तक 9.26 करोड़ से अधिक अतिरिक्त शौचालयों का निर्माण हो चुका है। नतीजतन शौचालय-युक्त घरों का आंकड़ा 99.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है। हालांकि 2018-19 के 'राष्ट्रीय ग्रामीण स्वच्छता सर्वेक्षण' के अनुसार 31 मार्च 2019 तक शौचालयों की सुविधा वाले परिवारों की संख्या का अनुपात 90.7 प्रतिशत बताया गया है। शौचालय और स्वच्छता को प्राथमिकता दिए जाने की वजह से ही प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्था 'बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन' द्वारा प्रधानमंत्री को सम्मानित करने का निर्णय लिया गया है। इस दृष्टि से संयुक्त राष्ट्र संघ के सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान के बाद स्वच्छ भारत के लिए बिल गेट्स फाउंडेशन का यह सम्मान उनकी उपलब्धियों को रेखांकित व प्रमाणित करना है। यदि आगामी कुछ सालों में देश के समूचे 5.6 लाख गांव खुले में शौच से मुक्त हो जाते हैं, तो गांव तो स्वच्छ होंगे ही, ग्रामीण गंदगी से उपजने वाली बीमारियों से भी मुक्त हो जाएंगे। साथ ही स्वच्छता के परिप्रेक्ष्य में गांधी का स्वप्न भी उनकी 150वीं जयंती के साल में साकार होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश की मूलभूत समस्याओं को जितनी गहराई से समझा था, उतना किसी अन्य नेता ने नहीं समझा। इसके मूल में कारण था कि गांधी ने सबसे पहले गांव और गांववासियों को ठीक से समझा। उन्होंने ग्राम और ग्रामीण विकास को ही महत्वपूर्ण माना। गांधी औद्योगिक विकास या आवश्यकता से ज्यादा मशीनीकरण के पक्षधर नहीं थे। भविष्यद्रष्टा होने के नाते उन्होंने जान लिया था कि आबादी के अनुपात में हमने मशीनीकरण को ज्यादा महत्व दिया तो बेरोजगारी बढ़ेगी। लघु व कुटीर उद्योगों को मशीनें निगल जाएंगी और इन मशीनों के खराब होने पर जो कचरा निकलेगा, उसे ठिकाने लगाना मुश्किल होगा। असल में तकनीक उस सर्पिणी की तरह है, जो अपने ही शिशुओं को निगल जाती है। हम देख रहे हैं कि भारी मशीनों के साथ जो इलेक्ट्रोनिक कचरा उत्पादित हो रहा है, स्वच्छता के लिए वह और भी बड़ा संकट बनकर सामने आया है। 400 साल तक नष्ट नहीं होने वाले प्लास्टिक कचरे ने थल, जल और नभ तक को भयंकर रूप से प्रदूषित कर दिया है। यह प्लास्टिक कचरा पशुधन के भी विनाश का एक बहुत बड़ा कारण बनकर उभरा है। इसीलिए प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से आह्वान किया है कि प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाएंगे।
अंतरिक्ष भी कचरे से अछूता नहीं रह गया है। अंतरिक्ष यानों और उपग्रहों के 17 हजार करोड़ टुकड़े अंतरिक्ष की कक्षाओं को न केवल प्रदूषित किए हुए हैं, बल्कि संकट का सबब भी बने हुए हैं। यदि ये इन कक्षाओं में स्थापित उपग्रहों से टकरा जाते हैं तो उपग्रह तो नष्ट होंगे ही, ये धरती पर गिरकर भारी हानि पहुंचा सकते हैं। इसीलिए गांधी मशीनों से की जाने वाली कृत्रिम वस्तुओं के सीमित उत्पादन के पक्ष में थे। लेकिन हमने गांधी के दार्शनिक मूल्यों को आजादी के बाद से ही लगभग नजरअंदाज कर दिया, जिसका परिणाम हम आज भोगने को विवश हुए हैं। नतीजतन कई रूपों में स्वच्छता अभियान चलाना पड़ रहा है।
गांधी ने लिखा है, 'मैंने जितने भी उपवास किए हैं, करीब-करीब वे सभी नैतिक दृष्टि से किए हैं। फिर भी वे असाध्य रोगों के निवारण में उपयोगी हो सकते हैं। यही बात स्वच्छता के साथ है। यदि जनता का सहयोग हो तो हमारे गांव भी स्वच्छ व सुंदर बन सकते हैं।' गांधी ने जब यह विचार दिया था, तब गांव हो या शहर औद्योगिक व इलेक्ट्रोनिक कचरे से लगभग मुक्त थे। खुले में केवल मल-विसर्जन गंदगी फैलाने का बड़ा कारण था। इससे बीमारियां फैलती थीं, जो कभी-कभी महामारी का रूप भी ले लेती थीं। इसलिए गांधी ने मल-मूत्र व अन्य प्रकार के कचरे को एक तो जैविक रूप से नष्ट करने के उपाय सुझाए, दूसरे कचरे से उपयोगी वस्तुएं बनाने की पहल की। जिससे स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के साधन सुलभ हों और खासतौर से युवा आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन जाएं। इस उद्देश्य पूर्ति के लिए गांधी ने गलियों और मार्गों के किनारे पड़े कूड़ा-करकट को हटाकर उसके उपयोगी सह-उत्पाद बनाने की नसीहत दी थी। गांधी ने कहा था, 'कचरे को जमीन में गड्डा खोदकर गाड़ देना चाहिए। यह कुछ ही दिनों में संपत्ति के रूप में परिणत हो जाएगा। यही उपाय जानवरों की हड्डियों के साथ करना चाहिए। इन्हें पीसकर बहुमूल्य जैविक खाद में बदला जा सकता है। फटे-पुराने कपड़ों और व्यर्थ रद्दी से कागज बनाया जा सकता है। मल-मूत्र से जैविक खाद बना लेना चाहिए।' गांधी के सुझाव बिल्कुल वही हैं, जो कृषि वैज्ञानिक मोटी-मोटी पोथियां पढ़कर दे रहे हैं। गांधी ने यह ज्ञान परंपरा से लिया, जबकि वैज्ञानिक लाखों रुपये खर्च करके और कठिन पढ़ाई करके ले पाए हैं। दरअसल, गांधी मानते थे कि प्राकृतिक संपदा का दोहन उतना ही किया जाए, जितनी इसकी आवश्यकता है। वैसे भी प्रकृति ने हमें इतना दिया है कि इससे सबका पोषण आसानी से हो सकता है। गांधी जानते थे कि प्राकृतिक संपदा के रूप में जो हमारी पूंजी है, उसका अधिकतम दोहन कर लिया गया तो गरीब आदमी का जीना मुश्किल हो जाएगा। गांधी अपने अनुभव से जानते थे कि प्रकृति में विद्यमान जो पंच-तत्व धरती, आकाश, हवा, पानी और अग्नि हैं, इनका रूपांतरण तो किया जा सकता है, किंतु किसी भी तत्व का निर्माण कृत्रिम तरीके से वैज्ञानिक नहीं कर सकते हैं।
महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर हम मूलतः उसी दर्शन को दोहराएंगे, जो गांधी ने करीब सौ साल पहले अपने उद्बोधनों, पुस्तकों और आचरण से दिए थे। गांधी के कार्य और व्यवहार में कोई भेद नहीं था। वे अपना शौचालय स्वयं साफ करते थे। इस वजह से उनके समय में शौच की गंदगी से मुक्ति का अभियान देखते-देखते स्व-स्फूर्त मुहिम में तब्दील हो गया। दरअसल, गांधी जानते थे कि कोई भी सरकार जनता की आदतों में पर्याप्त सुधार नहीं ला सकती है। लेकिन जनता स्वमेव जागरूक हो जाए तो सरकार को बहुत कुछ करने को बचा ही नहीं रहेगा। स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत राष्ट्रपिता की प्रेरणा से यही सब कुछ नरेंद्र मोदी ने कर दिखाया है। अच्छी बात है, इसे अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी मिल रही है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
Top