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पाला बदलते रहे पत्रकार भी

02/07/2019

पाला बदलते रहे पत्रकार भी


लोकसभा चुनाव के आंकलन में वक्त के हिसाब से बयान बदलने वालों में पहला नाम इंडिया टुडे ग्रुप के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई का है। वह हमेशा से ही मोदी सरकार की नीतियों को लेकर मुखर रहे हैं। 10 मई 2019 को हिंदुस्तान टाइम्स में अपने प्रकाशित लेख ‘द बीजेपी जुगरनॉट इज इन हाई गियर’ में राजदीप मोदी सरकार के वापस आने की संभावनाओं का विश्लेषण करते हैं। वह अपने लेख में पूछते हैं कि क्या चुनाव 2019 के नतीजे एक त्रिशंकु लोकसभा बनाएगी या फिर 2014 की तरह बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनेगी? इसके जवाब में राजदीप लिखते हैं कि प्रत्यक्ष रूप से बहुमत की संभावना अधिक नहीं है।

2019 का लोकसभा चुनाव कई मायनों में रोचक रहा। एक तरफ नेताओं ने कुछ विवादास्पद बयान दिए तो पत्रकारों की तरफ से भी उनकी बदलतीटिप्पणियां और बयान सामने आए। कुछ बयान मोदी ब्रिगेड के पक्ष में थे तो कुछ उनके खिलाफ। हम आपके सामने ऐसे ही कुछ पत्रकारों के लोकसभा चुनाव के पहले और नतीजों के बाद के बयानों और उनके पक्षों को प्रस्तुत कर रहे हैं।

आखिरकार, 2014 और 2019 के बीच एक बड़ा अंतर है। पहला 2014 में बीजेपी एक दावेदार के रूप में उभरी थी जो मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए 2 सरकार के प्रति उमड़ी सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठा सकी थी। दूसरा, उत्तर और पश्चिमी भारत के कई राज्य जीतने के बाद यहां एक भी सीट हारना एक पतन को दर्शाएगा। तीसरा, और महत्वपूर्ण रूप से, इस बार अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी) का मायावती (बहुजन समाज पार्टी) के साथ उत्तर प्रदेश (यूपी) में महागठबंधन भारत के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य में अधिक एकीकृत विपक्ष का उदाहरण है। परिणाम आने के बाद राजदीप अपनी ही बातों को काटते हुए दिखे। उन्होंने अपनी वेबसाइट पर एक लेख लिखा, लेख का शीर्षक था ‘पीएम मोदीस थैंक यू कार्ड्स’। इसमें राजदीप ने अमित शाह से लेकर मोदी की तारीफ के कसीदे कसे हैं। वह लिखते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंदिरा गांधी के बाद लगातार दो बार बहुमत से चुनाव जीतने वाला पहला नेता बनकर इतिहास का एक अंश लिख दिया है।

बालाकोट से वाराणसी, वाराणसी से केदारनाथ तक, टीम मोदी ने छवि निर्माण करने में कोई भी मौका नहीं गंवाया है। यह प्रधानमंत्री मोदी की छवि ही थी, जिसके सामने विपक्ष बौना नजर आया। पत्रकारों की इस श्रेणी में दूसरा नाम आता है टाइम्स आॅफ इंडिया में कंसल्टिंग एडिटर के तौर पर तैनात सागरिका घोष का, जिनकी मोदी सरकार की विरोधी की छवि बनी है। 10 मई 2019 को वह अपने ट्विटर हैंडल से लिखती हैं, ‘‘ग्रामीण पश्चिमी भारत में बीजेपी को सबक सिखाने के लिए नाराज किसान दृढ़ संकल्पित है। सत्ता पक्ष को विदर्भ में नुकसान हो सकता है क्योंकि विमुद्रीकरण और दिवालिया नीतियों के खिलाफ किसान और कश्तकार गुस्से में हैं।’’ वह यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने लिखा ‘‘एक मजबूत नेता और हिंदुत्ववादी राष्ट्रवादी की भावनाओं की अपील अधिक है, हालांकि जुमलों, झूठे वादों में थोड़ी थकावट सी आयी है।’’ सागरिका बीजेपी की जीत के बाद सुर बदलते हुए अपने लेख ‘‘टीना और टिमो- एट द एंड आॅफ ए लॉन्ग इलेक्शन आॅल आर सिंगिंग जो जीता वही सिकंदर’’ में मोदी की तारीफ में लिखती हैं- आज हर जगह उसी तरह मोदी हैं, जैसे कभी इंदिरा गांधी हुआ करती थीं।

प्रधानमंत्री न केवल अपने समर्थकों के लिए एक सुपर हीरो हैं, बल्कि अन्य लोग भी जो जीता वही सिकंदर गीत गा रहे हैं। तीसरा नाम आता है योगेन्द्र यादव का जो एक भारतीय सामाजिक वैज्ञानिक, चुनाव विश्लेषक के साथ स्वराज अभियान संगठन के अध्यक्ष भी हैं। योगेन्द्र ने ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ा जब उन्होंने बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाने पर न लिया हो। कभी उन्होंने मोदी सरकार को किसान विरोधी बताया तो कभी उन पर बालाकोट एयर स्ट्राइक के संदर्भ में निशाना साधा। मोदी पर पुलवामा और बालाकोट हमले को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा था कि यह देश को खतरनाक दिशा में ले जाने की कोशिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने की आड़ में वोट की राजनीति कर रहे हैं। लोकसभा चुनावों पर टिप्पणी करते हुए योगेन्द्र ने दावा किया था कि इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी 100 सीटें गंवा सकती है। उन्होंने कहा ‘‘बीजेपी की लोकप्रियता में तो गिरावट आई ही है, साथ ही पीएम मोदी की लोकप्रियता भी गिरी है।’’

योगेंद्र यादव ने कांग्रेस की भी आलोचना की और कहा कि पार्टी की नींद अभी तक नहीं टूटी है और आत्मतुष्टि का भाव बना हुआ है। योगेन्द्र यादव भी लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी के प्रति अपने रुख में थोड़ा बदलाव लाए हैं। 31 मई 2019 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित उनके लेख ‘जनता को सिर्फ विपक्ष नहीं, विकल्प चाहिए’ में वह इसी ओर संकेत करते हैं। इस लेख में वह लिखते हैं कि मैं मोदी जी का या किसी भी व्यक्ति का विरोधी नहीं हूँ। कोई व्यक्तिगत खुंदक नहीं है। उनके कई व्यक्तिगत गुणों का सम्मान भी करता हूँ, लेकिन उनकी विचारधारा से बुनियादी असहमति रही है। वह आगे एक कदम जाते हुए लिखते हैं कि मोदी जी ने अपने आप को औसत भारतीय की भावना से जोड़ा। राष्ट्रवाद की मोदी जी की परिभाषा सही है या नहीं, इस पर दो राय हो सकती है। लेकिन सबक यह है कि राष्ट्रीयता की भावना को नजरअंदाज कर हम भारत के जनमानस से नहीं जुड़ सकते हैं। राष्ट्रवाद के प्रति परम्परागत रवैया छोड़ना होगा। वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन एक्सप्रेस की स्तंभकार तवलीन सिंह जनसत्ता में छपे अपने लेख ‘वक्त की नब्ज: बदलाव के बावजूद’ में लिखती हैं कि मुझे मोदी की भक्तन कहते हैं, मेरे कई पत्रकार बंधु और सोशल मीडिया पर भारत के राजपरिवार की समर्थक। इसके बावजूद जब भी मुझे लगा है कि मोदी ने कोई गलती की है, मैंने डट कर उस गलती की आलोचना की है। गलतियां हुई हैं। कुछ तो बहुत बड़ी गलतियां।

अपनी निजी फेहरिस्त में नंबर एक पर मैं नोटबंदी रखती हूं। मेरी राय में नोटबंदी से भारत का नुकसान ज्यादा हुआ है। लाभ बहुत कम। दूसरे नंबर पर मैं रखती हूं गोरक्षकों की हिंसा और प्रधानमंत्री का उस पर मौन रहना। तीसरे नंबर पर मैं रखती हूं मोदी का घबरा कर अपनी तय हुई आर्थिक दिशा बदल डालना, जब राहुल गांधी ने ‘सूट-बूट की सरकार’ वाला उन पर ताना कसा था। तवलीन ने जनसत्ता में 26 मई 2019 को अपने दूसरे छपे लेख ‘वक्त की नब्ज: यह जीत उन्हें नहीं पच रही’ में मोदी सरकार की नीतियों की तारीफ की है। उन्होंने लिखा है कि कैसे एक चायवाले का बेटा देश का प्रधानमंत्री भी बन सकता है। वह आगे लिखती हंै कि जिस राजवर्ग को मोदी ने कमजोर किया है, उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद, वह अभी तक स्वीकार नहीं कर पाया है कि भारत बदल गया है और इस नए भारत में उनको कभी वह जगह नहीं मिलने वाली, जो कभी उनकी थी। जनसत्ता के संपादक मुकेश भारद्वाज जनसत्ता में 4 मई 2019 को छपे अपने लेख ‘विकल्प की व्यथा’ में लिखते हैं कि 2014 में भाजपा को भी अंदाजा नहीं था कि उसे ऐसा प्रचंड बहुमत मिलेगा और वह अपने दम पर केंद्र की सरकार बना लेगी।

इतनी मजबूत स्थिति में रहने के बाद भी भाजपा ने अपने गठबंधन के दलों के सामने थोड़ा झुकने से परहेज नहीं किया। जब सामने लक्ष्य बड़ा था तो छोटे लाभ का मोह छोड़ दिया। एक मजबूत सरकार को लेकर विपक्ष की रणनीति क्या रही। उसकी भाषा रही, इसका विरोध या उसे हटाओ। रोजी-रोटी की समस्या पर तो विपक्ष भी बगलें ही झांक रहा था। वहीं 25 मई 2019 को मुकेश जनसत्ता में छपे लेख ‘बेबाक बोल: जो जीता वही नरेंद्र’ में मोदी की तारीफ करने में पीछे नहीं रहते हैं। वह लिखते हैं कि इस लोकसभा चुनाव के बाद मोदी एक महानायक की तरह उभरे हैं। उनके धुर विरोधी भी सामने आकर खुद के गलत होने को कुबूल रहे हैं। कहीं कोई झंझट नहीं। न ईवीएम का, न ही जबरन कब्जे का। बस हर तरफ विजय गान। विरोधी एक बात में सच साबित हुए कि मोदी पार्टी से भी बड़े हो गए हैं।

राजनीतिक पार्टियों को अपनी ऐसी साख बनाने में बरसों लग जाते हैं। वे इस हद तक जनता जनार्दन का विश्वास नहीं जीत पाते, लेकिन मोदी ने अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में यह कर दिखाया। उन्होंने इन वर्षों में जनता का विश्वास जीता है। लोग देश की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक या कैसी भी स्थिति के लिए मोदी के कहे को ही अटल मान रहे हैं।


 
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