युगवार्ता

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हंगामा नहीं, चर्चा करिए

28/08/2019

हंगामा नहीं, चर्चा करिए

 रवि अटल

केवल मीडिया की सुर्खियां बटोरने या अखबारों में फोटो छपवाने के लिए अमर्यादित आचरण सदन की गरिमा को न केवल गिराता है बल्कि जनता को भी निराश करता है।

कितनी अजीब बात है कि अधिकतर विधायकों को न तो सदन की नियमावली ज्ञात होती है और न ही जीरो आवर, कार्य स्थगन प्रस्ताव या बिजनेस आवर का पता होता है। कुछेक विधायकों को छोड़ दें तो अधिक संख्या उनकी होती है जो अमर्यादित आचरण व संसदीय परंपराओं को ताक पर रखकर बात बेबात होहल्ला मचाने को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। उन्हें लगता है कि जनता ने उन्हें विधानसभा में उधम मचाने के लिए ही भेजा है।
बिहार विधान सभा के अध्यक्ष विजय चौधरी का कहना है कि न जाने कितने वर्षों के संघर्ष व मशक्कत के बाद लोग विधायक चुने जाते हैं। जनता उन्हें इस भरोसे के साथ अपना जन प्रतिनिधि चुनती है कि वे सदन में जाकर उनकी समस्याओं को दूर करने का प्रयास करेंगे। लेकिन जब जनता उन्हें सदन में उधम मचाते व असंसदीय आचरण करते हुए देखती है तो उसके दिल पर क्या गुजरती होगी।
यह जन प्रतिनिधियों को सोचना चाहिए। केवल मीडिया की सुर्खियां बटोरने या अखबारों में फोटो छपवाने के लिए अमर्यादित आचरण सदन की गरिमा को न केवल गिराता है बल्कि इससे जनता को भी निराशा होती है। बिहार विधान सभा में गत एक दशक से भी ज्यादा समय से स्पीकर विजय चौधरी के मुताबिक एक समय ऐसा था कि विभिन्न मुद्दों को लेकर स्वस्थ बहस होती थी। लेकिन अब तो शोरशराबा, हुड़दंग व स्थगन सदन की नियति बन चुकी है।
1981 से सदन की रिर्पोटिंग करते हुए खुद मैंने भी महसूस किया है कि दिन प्रतिदिन सदन की गरिमा में बट्टा लगता जा रहा है। एक जमाना था जब सदन में कर्पूरी ठाकुर, जगन्नाथ मिश्र, विनायक प्रसाद यादव, जगदानंद सिंह, राजो सिंह, गणेश प्रसाद यादव व रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे दिग्गजों की उपस्थिति रहती थी। मुझे भलीभांति याद है कि जब विधानसभा में कर्पूरी ठाकुर अपनी बात रखते थे तो सारा सदन शांत होकर उनकी बातों को सुनता था। उस वक्त सत्ता पक्ष व विपक्ष की तरफ से मुद्दों पर तार्किक बहस होती थी।
सरकार की तरफ से सदन के पटल पर जब कोई प्रस्ताव रखा जाता था तो सत्ता पक्ष व विपक्ष की तरफ से उसकी खूबियों व खामियों पर चर्चा के जरिए गहन मंथन होता था। विपक्षी नेता के तौर पर वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का दौर भी स्वस्थ बहस के लिए याद किया जाता है। तथ्यों के साथ अपनी बात रखने में उनका सानी नहीं होता था। बिहार विधान सभा का मानसून सत्र इस बार एक माह तक चला। बाढ़, सुखाड़, विधि व्यवस्था, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी तथा सरकारी अनियमिता समेत तमाम ज्वलंत मुद्दे थे जिन पर गंभीर बहस होनी चाहिए थी। लेकिन इन मुद्दों पर उस तरह की बहस नहीं हो पाई जैसी होनी चाहिए थी।
सूबे में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होना है। बावजूद इसके विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष व लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव पूरे मानसून सत्र के दौरान सदन से गायब रहे। नेता प्रतिपक्ष की सदन से इस तरह की गैर मौजूदगी का वाकया पहली बार घटित हुआ। नेता प्रतिपक्ष की सदन से गैरमौजूदगी को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक तेजस्वी का यह रवैया लगातार 14 वर्षों से बिहार की सत्ता की बागडोर संभाल रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राह निष्कंटक करने वाला है।
वैसे भी नीतीश कुमार की साफ सुथरी छवि के सामने तेजस्वी समेत विपक्ष का कोई भी नेता नहीं टिकता। इस दौरान सत्ता पक्ष ने तेजस्वी को लेकर चुटकी लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। बहरहाल, इस मानसून सत्र में तेजस्वी यादव की अनुपस्थिति में राजद के दिग्गज नेता अब्दुल बारी सिद्दकी, भाई वीरेंद्र, शिवचंद्र राम, विजय प्रकाश, ललित यादव व यज्ञा देवी को अगर छोड़ दें तो विपक्ष के अन्य नेता मौन ही नजर आये।
अपने विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं को उठाने व उनके निराकरण का प्रयास करने के बजाय अधिकतर विधायकों का फोकस सदन में हंगामा मचाकर मीडिया में अपनी फोटो छपवाने तक सीमित रहा। विधानसभा अध्यक्ष विजय चौधरी बार बार सदन की मर्यादा का हवाला देते रहे लेकिन हंगामा करने वाले विधायकों पर इसका कोई भी असर नहीं पड़ा। सवाल है कि जनता जिन्हें अपना रहनुमा चुनकर भेजती है क्या उनका यह कर्तव्य नहीं बनता कि वे विधानसभा का कीमती वक्त जनता की समस्याओं को दूर करने में लगायें।


 
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