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जरूरी जांच, जो हुई ही नही

08/07/2019

जरूरी जांच, जो हुई ही नही

श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन 23 जून, 1953 को हुआ था। अविभाजित बंगाल में मंत्री रह चुके और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल रहे, मुखर्जी विपक्ष के एक प्रमुख नेता और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। 11 मई, 1953 को कठुआ में गिरμतारी के बाद कश्मीर की शेख अब्दुल्ला सरकार ने उन्हें बिना किसी मुकदमे के ही हिरासत में ले लिया था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद 30 जून, 1953 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी मां जोगमाया देवी को एक पत्र लिखकर संवेदना जताई थी। जिसके जवाब में 4 जुलाई को जोगमाया देवी ने लिखा, ‘मेरे बेटे को बिना किसी ट्रायल के हिरासत में लिया गया और हिरासत में ही उसका निधन हो गया। आप कहते हैं, आपने मेरे बेटे की हिरासत के दौरान कश्मीर का दौरा किया था। आप मेरे बेटे के के प्रति स्नेह रखने की भी बात करते हैं। लेकिन मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि वहां उससे व्यक्तिगत रूप से मिलने और उसके स्वास्थ्य और अन्य व्यवस्थाओं के बारे में खुद को संतुष्ट करने से आपको किसने रोका था? …उसको हिरासत में लिये जाने के बाद मैंने, उसकी मां ने, जम्मू कश्मीर सरकार से जो पहली सूचना प्राप्त की, वो ये थी कि मेरा बेटा अब नहीं रहा। … और किस क्रूर व रहस्यमय तरीके से संदेश दिया गया था।’

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु रहस्यमय थी। यह आम धारणा रही है। वह असाधारण घटना थी जो 66 साल पहले घटी। डॉ. मुखर्जी की मां जोगमाया ने जो प्रश्न प.नेहरू से पूछे, उसका उत्तर वे नहीं दे सके। वही प्रश्न पुन: उठ गए हैं। जिसे भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी राघवेन्द्र सिंह ने उठाया है।

पंडित नेहरू और जोगमाया देवी के बीच का आगे का संवाद उदासी को और बढ़ाने वाला है। इसके कुछ महीने बाद 27 नवंबर, 1953 को, पश्चिम बंगाल विधानसभा में कश्मीर में हिरासत के दौरान श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु की परिस्थितियों की जांच के लिए एक प्रस्ताव लाया गया था। इस प्रस्ताव में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले एक आयोग के माध्यम से जांच कराने की बात कही गई थी। हैरानी की बात है कि कांग्रेस पार्टी के एक विधायक शंकर प्रसाद मित्रा ने इस प्रस्ताव में संशोधन करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस संशोधन प्रस्ताव में ‘एक जांच रखने के लिए’ के स्थान पर ‘जम्मू और कश्मीर सरकार से जांच कराने के लिए अनुरोध करने’ की बात कही गई थी। उन्होंने यह भी कहा कि ‘भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग को नियुक्त करने’ के वाक्य को भी मूल प्रस्ताव से हटा दिया जाए। इस संशोधन प्रस्ताव का जिन लोगों ने मुखर होकर विरोध किया, उन्हें इस बात पर आश्चर्य भी हुआ कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधान चंद्र रॉय, जिन्होंने पहले इस जांच को आवश्यक समझा था, बाद में इसे अस्वीकार कर दिया था।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी को मुख्यमंत्री बिधानचंद्र रॉय का बहुत अच्छे दोस्त माना जाता था। मूल प्रस्ताव में सर्वोच्च न्यायालय के जज की बात इसलिए कही गई थी क्योंकि वो कश्मीर सहित कहीं से भी सबूतों का संज्ञान ले सकता था। इस मामले में, कश्मीर सरकार खुद आरोपी पक्ष थी। ऐसे में वो इस जांच पर कैसे निष्पक्ष निर्णय ले सकती थी? लेकिन विधानसभा में बिधानचंद्र रॉय सहित कांग्रेस के सदस्यों ने संशोधन के पक्ष में ही बात कही। इसका असर ये हुआ कि कांग्रेस ने मूल प्रस्ताव में संशोधन की स्वीकृति की मांग की और वो इसमें सफल भी रही। पश्चिम बंगाल सरकार ने विधानसभा में पारित हुए संशोधित प्रस्ताव को भारत सरकार के मिनिस्ट्री आॅफ स्टेट्स (कश्मीर अनुभाग) के पास भेज दिया। मंत्रालय को यह पत्र 23 फरवरी, 1954 को प्राप्त हुआ था। इसके करीब छह महीने बाद इस मामले में आखिरकार काम शुरू हुआ। मंत्रालय में संबंधित फाइल पर जो टिप्पणियां की गईं, वे इस प्रकार हैं- “यह विचार करने के लिए है कि क्या हम पश्चिम बंगाल सरकार को सूचित कर सकते हैं कि चूंकि यह मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर सरकार को विषय है, इसलिए भारत सरकार इसे आगे बढ़ाने के लिए उचित मामला नहीं मानती।

जब श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु की परिस्थितियों की जांच के अनुरोध का विषय संसद में उठाया गया, तो हमने जो रवैया अपनाया, वह यह था कि यह एक ऐसा मामला था जो अकेले जम्मू-कश्मीर सरकार से संबंधित था। पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव इसी स्टैंड के अनुरूप है, क्योंकि यह केवल भारत सरकार से जम्मू-कश्मीर सरकार के पास इस अनुरोध को अग्रसारित करने के लिए कहता है। ऐसे में अब हमारे पास दो विकल्प खुले हैं। या तो हम इस प्रस्ताव की प्रति और तत्संबंधी पूरी कार्यवाही जम्मू-कश्मीर सरकार को अगर वे आवश्यक समझें तो इस तरह की कार्रवाई के लिए भेज सकते हैं; या फिर हम पश्चिम बंगाल सरकार को ये प्रस्ताव और तत्संबंधी कार्यवाही वापस कर सकते हैं और उन्हें स्वयं जम्मू- कश्मीर सरकार से प्रस्ताव करने के लिए कह सकते हैं। यद्यपि दूसरा विकल्प ज्यादा सही हो सकता है, लेकिन इसका पश्चिम बंगाल सरकार पर प्रतिघाती प्रभाव पड़ सकता है, जहां डॉ. मुखर्जी की मृत्यु ने जनता के मन को बहुत उद्वेलित किया है। इसलिए, अगर हम पहले विकल्प को अपनाते हैं, तो कोई नुकसान नहीं हो सकता है।

मुझे नहीं लगता है कि इससे जम्मू- कश्मीर सरकार के साथ किसी भी तरह की गलतफहमी होने की संभावना होगी।” इस टिप्पणी पर 7 सितंबर, 1954 को मिनिस्ट्री आॅफ स्टेट के केएनवी नंबिसन ने हस्ताक्षर किए थे। फलत: पहले विकल्प पर ही सचिव और मंत्री दोनों द्वारा सहमति व्यक्त की गई। जिसके बाद 22 सितंबर, 1954 को मिनिस्ट्री आॅफ स्टेट्स ने इस प्रस्ताव को जम्मू और कश्मीर के मुख्य सचिव के पास आवश्यक कार्रवाई के लिए आगे बढ़ा दिया। लेकिन जम्मू और कश्मीर सरकार के पास भेजे गए इस सामान्य पत्र का परिणाम कुछ भी नहीं निकल सका। 19 अगस्त, 1954 को संसद में एक तारांकित प्रश्न के जरिये गृह मंत्री के नाम नोटिस देकर उनसे यह स्पष्ट करने के लिए कहा गया कि क्या बंगाल के मुख्यमंत्री ने जून 1954 में कश्मीर का दौरा किया था और श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के बारे में पूछताछ की थी। इससे पहले 20 जुलाई, 1954 को मिनिस्ट्री आॅफ स्टेट्स ने रॉय की इस यात्रा के बारे में जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव से जानकारी मांगी थी। 19 जुलाई, 1954 को मिनिस्ट्री आॅफ स्टेट्स ने लोकसभा सचिवालय को पत्र लिखकर बताया कि उनके पास जम्मू और कश्मीर में बिधानचंद्र रॉय की यात्रा के बारे में अखबार में छपी खबरों के अलावा कोई और जानकारी नहीं थी।

पत्र में आगे कहा गया कि हिरासत में रहते हुए मुखर्जी की मौत से जुड़ी परिस्थितियां जम्मू-कश्मीर सरकार से संबंधित थीं, न कि भारत सरकार से। 5 अगस्त, 1954 को जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव गुलाम अहमद ने, भारत सरकार के मिनिस्ट्री आॅफ स्टेट्स के संयुक्त सचिव वी नारायणन को पत्र लिखकर बताया कि ह्लडॉ. बीसी रॉय छुट्टी मनाने के लिए कश्मीर आए थे और यहां उन्होंने लगभग एक महीने का समय बिताया था। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने घाटी के सौंदर्य को दशार्ने वाले विभिन्न स्थलों का दौरा किया। उन्होंने उस बंगले को भी देखा, जहां स्वर्गीय डॉ. मुखर्जी कश्मीर प्रवास के दौरान रहे थे। इसके साथ ही उन्होंने अस्पताल के उस कमरे को भी देखा, जहां डॉ मुखर्जी को उनकी मृत्यु के पहले लाया गया था। हमारे स्वास्थ्य सेवा विभाग के निदेशक कर्नल सर राम नाथ चोपड़ा उन्हें एक दिन अस्पताल भी ले गए, जहां संभवत: डॉ. बीसी रॉय ने मौके पर कुछ पूछताछ भी की। इस तरह आप देख सकते हैं कि डॉक्टर द्वारा कोई आधिकारिक जांच नहीं की गई थी और इस तरह की कोई रिपोर्ट उनके द्वारा प्रस्तुत नहीं की जा सकती थी। इसलिए, लोकसभा में प्रश्न का उत्तर इस जानकारी के आधार पर ही दिया जा सकता है।’ इस तरह डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद जांच का महत्वपूर्ण मामला इसके बाद ठंडे बस्ते में चला गया।


 
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