युगवार्ता

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बर्बादी की कगार पर किसान

04/05/2020

बर्बादी की कगार पर किसान

 शशांक द्विवेदी

बेमौसम बारिश और ओले की मार से किसान बेहाल हो चुका है। कोरोना और लॉकडाउन ने किसानों की समस्या और बढ़ा दी है। सरकार के साथ साथ देश के आम नागरिकों को भी किसानों की यथा संभव मदद करने के लिए आगे आना होगा।

शशांक द्विवेदी

दुनिया भर में फैले कोरोना संकट और लॉकडाउन के बीच पिछले दिनों देश में विभिन्न इलाकों खासतौर से उत्तर भारत में हुई बेमौसम बारिश, तेज हवाएं और ओलावृष्टि किसानों के लिए भारी आफत लेकर आई है। इसकी वजह से देश के उत्तरी, मध्य और पश्चिमी क्षेत्र में फसलों को भारी नुकसान पहुँचा है। मार्च के महीने में देश के कई हिस्सों में मौसम का मिजाज बदला और इस बदले मौसम का सबसे ज्यादा खामियाजा किसानों को उठाना पड़ा है। देश के कई हिस्सों में ओले गिरने की वजह से गेहूं की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों में किसान बर्बादी के कगार पर पहुँच गया है।

कृषि मंत्रालय का अनुमान है कि देश में लाखों हेक्टेयर भूमि में खड़ी फसल बर्बाद हुई है। फसलों की बर्बादी के आकलन के लिए राज्यों ने सर्वे शुरू कर दिया है। राज्यों से नुकसान के प्राथमिक आंकड़े भी आने लगे हैं। जो बारिश के चलते भारी नुकसान की ओर इशारा कर रहे हैं। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार राज्यों में सर्वाधिक असर गेहूं, चना, सरसों और आलू की फसल को पहुंचा है। सिर्फ उत्तर भारत की बात की जाए तो यहां बारिश से आलू, सरसों और गेहूं की फसल सर्वाधिक प्रभावित हुई है।

फसल के साथ साथ इस सीजन में उगने वाली सब्जियों को भी काफी नुकसान पहुँचा है। असल में जलवायु परिवर्तन और बेमौसम बारिश की मार किसी एक प्रदेश तक नहीं बल्कि देश भर में एक साथ पड़ी है। जनवरी से लेकर अपै्रल तक कई बार देश के अलग अलग हिस्सों में बेमौसम की बारिश और ओले का यह सिलसिला चल रहा है। फसलों की इस तबाही से किसान कर्ज के दलदल में भी फंसा हुआ है, क्योंकि फसल नष्ट होने से उसकी बिक्री नहीं हो पायेगी और वो अपना कर्ज चुकाने में सक्षम भी नहीं होगा। इसी कर्ज के बोझ में दब जाने के बाद किसान आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर होते हैं।

दुनिया भर में कोरोना संकट और इस समय देश में लॉकडाउन होने ने किसानों को जितना चिंतित इस समय किया हुआ है, उतना कभी नहीं हुए। महाराष्ट्र में मराठवाड़ा, खानदेश और विदर्भ में गेहूं, प्याज और आम को नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा गुजरात के सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात में कैरी एवं जीरे की अधिकांश फसल खराब हो गई। इसके अलावा आलू, प्याज, सौंफ, धनिया और इसबगोल की फसलें भी बर्बाद हुई।

उत्तर प्रदेश के कई जिलों खासकर बुंदेलखंड क्षेत्र में तो कई फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गई है बुंदेलखंड के किसानों के लिए दैवीय उनकी आपदा तकदीर बन गई है। कभी सूखा, कभी अतिवृष्टि तो कभी ओलावृष्टि ने की फसलों को हमेशा तबाह किया है। बारिश और ओलावृष्टि ने एक बार फिर किसानों को भुखमरी के मुहाने पर खड़ा कर दिया। यमुना पट्टी से लेकर पाठा तक पड़े ओले से रबी की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई। इतने बड़े पैमाने पर हुई फसल बर्बादी के बाद बुंदेलखंड क्षेत्र के चित्रकूट, हमीरपुर, जालौन, बांदा और महोबा समेत कई जिलों के किसान पिछले दिनों सड़कों पर भी आये थे। उनका गुस्सा स्थानीय प्रशासन की उदासीनता पर फूटा।

बिगड़ते और अनियमित मौसम ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खेत में तैयार खड़ी फसल तबाह होने से किसान बर्बादी के कगार पर आ पहुंचा तो कोरोना के साथ मौसम की दोतरफा मार पड़ रही है। कुल मिलाकर बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि में देश भर के किसानों को जो भारी नुकसान हुआ है उसके लिए तत्काल केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर किसानों की मदद करनी चाहिए। स्थानीय स्तर पर उनके लिए कुछ वैकल्पिक प्रबंध किये जाने की जरुरत है। किसान इस देश के विकास की सबसे मजबूत और महत्वपूर्ण कड़ी है और अगर किसान कमजोर और असहाय होगा तो इसका सीधा असर देश पर पड़ेगा। आने वाला वक्त न सिर्फ आम आदमी के लिए बल्कि सरकार के लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित होने जा रहा है।


 
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