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नुसरत और जायरा की अपनी कोई मर्जी नहीं?

11/07/2019

नुसरत और जायरा की अपनी कोई मर्जी नहीं?


प्रतिभा कुशवाहा

नुसरत जहां और जायरा वसीम अलग-अलग कारणों से सोशल मीडिया और बाद में टीवी की प्राइम टाइम सुर्खियां बन गईं। उनके बारे में जितने मुंह, उतनी बातें की गईं। पर प्रश्न यह है कि उन्हें क्या करना चाहिए, इसे निर्धारित करने वाले ये लोग होते कौन हैं?

कोई एक महीना पहले नई-नवेली सांसद बनी नुसरत जहां और मिमी चक्रवर्ती ट्रोल की गई, क्योंकि उन्होंने संसद भवन में अपने पहले दिन की सेल्फी सोशल मीडिया में शेयर कर दी। इस सेल्फी पर लोगों का गुस्सा सोशल मीडिया पर निकलने लगा। नुसरत और मिमि को संसदीय मर्यादा, उनके कपड़े पहनने के ढंग और उनके धर्म पर सवाल उठाया गया। उनके वोटरों से भी प्रश्न खड़े किये गए, जिन्होंने उन्हें संसद तक चुन कर भेजा था। इस घटना के ठीक एक महीने बाद नुसरत जहां संसद सत्र के दौरान 25 जून को बिंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र और चूड़ा की सजधज के साथ लोकसभा पहुंचीं और उन्होंने लोकसभा सदस्य के तौर पर शपथ ली।
शपथ के दौरान उन्होंने अस्सलाम अलैकुम, जय हिंद, वंदे मातरम, जय बांग्ला का न केवलउद्घोष किया, बल्कि लोकसभा अध्यक्ष के पैर छूकर उनका आशीर्वाद भी लिया। सांसद नुसरत जहां फिर ट्रोल की गईं। उन पर देवबंद का तथाकथित फतवा भी जारी कर दिया गया (हालांकि बाद में देवबंद ने ऐसे किसी फतवे से इंकार कर दिया। एक जैन युवक निखिल जैन से शादी करने, सिंदूर लगाने, मंगलसूत्र पहनने और वंदे मातरम बोलने के कारण आपत्ति जताई गई। इन आपत्तियों का सार यह था कि नुसरत जहां ने इस्लाम का अपमान किया है। वहीं दूसरी तरफ सहिष्णु लोगों ने नुसरत जहां के इस रूप का स्वागत किया।
इन सबके बीच नुसरत ने अपने विचार ट्वीट के माध्यम से रखे, उन्होंने कहा कि ‘किसी भी धर्म के कट्टरपंथियों के बयानों पर ध्यान देना या प्रतिक्रिया देना केवल नफरत और हिंसा को बढ़ावा देना है। इतिहास इसका गवाह रहा है। मैं समग्र भारत का प्रतिनिधित्व करती हूं, जाति, पंथ और मजहब के दायरे से परे है। मैं अब भी मुसलमान हूं और किसी को नहीं बताना चाहिए कि मैं क्या पहनूं… मजहब कपड़े से परे होता है।’ पेशे से अभिनेत्री नुसरत जहां वसीरहाट, पश्चिम बंगाल से सांसद हैं। वे उन 17 महिला सांसदों में शामिल हैं, जो इस बार तृणमूल कांग्रेस से लोकसभा पहुंची हैं। 29 साल की इस युवा सांसद ने 3.5 लाख से ज्यादा वोटों से वसीरहाट सीट पर जीत दर्ज की थी।
इन सबके बावजूद एक महिला सांसद नुसरत जहां की यह सब उपलब्धियां कम पड़ गई, जब उन्होंने अपनी मर्जी से कपड़े चुनें और गैर धर्म के युवक से शादी कर ली। क्यों समाज और धर्म के ठेकेदार अपने-अपने हिसाब से या कहे तो हितों के हिसाब से उन्हें नसीहत और समझाइस देना अपना हक समझते हैं? क्या नुसरत के पास अपनी कोई सोच, समझ, विश्वास नहीं है? उन्हें कुछ लोग क्यों एक बने-बनाए ढांचे में फिट करना चाहते हैं? 2017 में दुगार्पूजा के दौरान धुनुची नृत्य का अपना एक वीडियो शेयर करने के बाद भी उन पर कई आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं। अगर वे कहती हैं कि ‘मैं समग्र भारत का प्रतिनिधित्व करती हूं, जाति, पंथ और मजहब के दायरे से परे हैं’, तो कुछ लोगों को यह मानने में हर्ज क्यों है? इसी दौरान दंगल गर्ल के नाम से मशहूर फिल्म कलाकार जायरा वसीम का प्रकरण भी कुछ इसी तरह का है।

सीक्रेट सुपर स्टार जैसी मशहूर और प्रेरणादायक फिल्म में काम करने वाली इस 19 वर्षीय कलाकार ने सोशल साइट फेसबुक और इंस्टाग्राम में बॉलीवुड को अलविदा करने की घोषणा कर दी। जायरा ने इसका कारण धार्मिक बताया। उन्होंने लिखा कि ‘आज जब मैंने बॉलीवुड में पांच साल पूरे कर लिए हैं, तब मैं यह बात स्वीकार करना चाहती हूं कि मैं इस पहचान से यानी अपने काम को लेकर खुश नहीं हूं। लंबे समय से मैं ये महसूस कर रही हूं कि मैंने कुछ और बनने के लिए संघर्ष किया है। …मैंने ऐसे माहौल में काम करना जारी रखा जिसने लगातार मेरे ईमान में दखलअंदाजी की। मेरे धर्म के साथ मेरा रिश्ता खतरे में आ गया। …मैंने अपने जीवन से सारी बरकतें खो दीं।’ जायरा की इस पूरी पोस्ट का लब्बोलुआब यही था कि वे वर्तमान में अपने काम से खुश नहीं हैं, और आध्यात्मिक शांति के लिए इस इंडस्ट्री को बॉय कहना चाहती हैं।


जायरा की ऐसी घोषणा से नुसरत जहां के मामले की तरह सोशल मीडिया तुरंत ही दो खेमों में बंट गया। कुछ लोगों ने जायरा की इच्छा को सम्मान दिया और कुछ ने एहसान फरामोश के साथ-साथ जायरा के इस निर्णय को कट्टरपंथियों का दबाव घोषित कर दिया। इस मामले में बड़े से बड़े लोगों के वक्तव्य सोशल मीडिया में आ गए। एक आश्चर्यजनक टिप्पणी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि महाराज की आई। उन्होंने ट्वीट किया कि ‘धार्मिक आस्था के लिए फिल्म अभिनेत्री जायरा द्वारा फिल्मों से किनारा करना प्रसंशनीय है, हिंदू अभिनेत्रियों को भी जायरा से प्रेरणा लेना चाहिए।’ यहां यह देखा जाना चाहिए कि स्वामी चक्रपाणि ने यह सीख हिन्दू पुरुष अभिनेताओं को नहीं दी है। यही हाल मुस्लिम खास और आम लोगों का था, जो जायरा के इस फैसले को इसलिए उचित करार दे रहे थे कि लड़कियों को फिल्मों में काम नहीं करना चाहिए।
इसी क्रम में सपा सांसद एसटी हसन ने एक टीवी साक्षात्कार में फिल्मों में काम करने वाली महिलाओं को तवायफ तक की संज्ञा दे दी। वहीं भाजपा नेता शाहनवाज ने प्रश्न उठाया कि जब मौलवी-मौलाना भी छोटे पर्दे पर आ रहे हैं, तो क्या टीवी स्क्रीन पर आना जायज है या नाजायज? यह बड़ा बहस का विषय है। जायरा के मामले में नेशनल कांफ्रेंस के लीडर उमर अब्दुल्ला का भी एक ट्वीट आया। उन्होंने कहा कि ‘हम जायरा के निर्णय पर प्रश्न करने वाले कौन होते हैं। यह उसकी जिंदगी है, उसे वही करने दो जिसमें वह खुश हों।’ अच्छी बात यह है कि उमर अब्दुल्ला ने जायरा की इच्छा का सम्मान किया, पर क्या वे नुसरत जहां की इच्छा का सम्मान इसी तरह कर रहे होंगे? या फिर नुसरत का समर्थन न कर पाना उनकी महज एक राजनीतिक मजबूरी है? अगर वे ऐसा करते तो मिसाल ही पेश करते। खैर, ऐसी सुविधाजनक चुप्पी इन दोनों मामलों में कई दिग्गजों ने धारण कर रखी है।

भाजपा नेता शाहनवाज ने प्रश्न उठाया कि जब मौलवी-मौलाना भी छोटे पर्दे पर आ रहे हैं, तो क्या टीवी स्क्रीन पर आना जायज है या नाजायज?

जिनसे ऐसे मामलों में बोलने की पूरी उम्मीद की जाती है। वास्तविकता यह है कि जब भी महिलाएं अपने धर्म और समाज के इतर कोई निर्णय या काम करती हैं, तो उनके ही धर्म-समाज के लोग उसकी इच्छा का सम्मान नहीं करते हैं। यह देखा गया है कि महिलाओं के मामले में उनका नजरिया ज्यादा ही क्रूर होता है। चाहे वह एक मुस्लिम से शादी करने वाली हादिया का मामला ही क्यों न हो, या हालिया मामला फिल्म अभिनेता रितिक रोशन की बहन सुनैना रोशन का। सुनैना के बारे में खबरें आई थी कि वे एक मुस्लिम युवक से प्रेम करती हैं और परिवार इसमें रुकावट खड़ी कर रहा है। समाज का यह दोहरा रवैया हर खास और आम लड़की को देखना पड़ता है, जब वह अपनी मर्जी से अपनी सोच को अमलीजामा पहनाती है। इसलिए नुसरत जहां से सबक सीखने की जरूरत है, जो अपनी राह चुनकर उस पर बेपरवाह चल रही है। फिलहाल वे फिर से ट्रोल हो गईं, क्योंकि उन्होंने कोलकाता में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा में भाग लिया।





 
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