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खौफजदा हैं बेटियां

04/11/2019

डॉ. अजय खेमरिया

'मैं जिस यौन शिक्षा का समर्थन कर रहा हूं, उसका ध्येय काम के आवेग को जीतना और उसका उदात्तकरण करना है। इस शिक्षा से बच्चों के मन में अपने आप यह बात घर कर जानी चाहिए कि मनुष्य और पशु के बीच प्रकृति ने एक मौलिक भेद किया है। वह यह कि मनुष्य में सोचने-समझने, रिश्तों को महसूस करने की विशिष्ट क्षमता है।' महात्मा गांधी की यह बात आज भारत के लोकजीवन में इसलिए प्रासंगिक हो रही है, क्योंकि इस देश में बचपन आज यौन आक्रमण से बुरी तरह भयाक्रान्त है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के ताजा आंकड़े उस भारतीय लोकजीवन की मर्यादाओं और संयमित प्रेरणाओं को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं जिसने पूरी दुनिया को रिश्तों की परिभाषा दी। किशोर न्याय अधिनियम हो या पॉक्सो एक्ट के सख्त प्रावधान, ऐसा लगता है कि काम आवेग के तिमिर ने मनुष्यता और पशुता के उस प्रकृतिजनित भेद को ही समाप्त कर दिया है। सभी कानूनी प्रावधान इस पशुता के आगे बेअसर हो रहे हैं। जाहिर है जिस यौन शिक्षा की वकालत महात्मा गांधी आज से 85 साल पहले महसूस कर रहे थे, क्या वह उनकी समाजविज्ञानी के रूप में दूरदर्शिता को स्वयंसिद्ध नहीं कर रहा है? 
बाल यौन शोषण और अपराध के ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले डेढ़ दशक में इनकी वृद्धि दर 889 प्रतिशत रही है। इनमें बलात्कार के मामले तो 1705 फीसदी के अनुपात से बढ़े हैं। मप्र, यूपी, बिहार, बंगाल जैसे राज्यों में बाल यौन शोषण के मामले बेहद ही डरावनी तस्वीर प्रस्तुत कर रहे हैं। मप्र में सबसे पहले 12 साल की बेटियों के बलात्कारियों को फांसी की सजा का कानून पारित किया गया लेकिन ताजा आंकड़े बताते हैं कि मप्र में इस सख्त कानून की पहल के बावजूद लोगों के ह्रदय और मस्तिष्क में कोई खौफ कायम नहीं हुआ है। वर्ष 2015 में मप्र बेटियों के साथ दुराचार और शोषण के मामलों में प्रथम और 2016 में यूपी के बाद दूसरे स्थान पर रहा है।
बालिकाओं के साथ यौन अपराधों में 95 फीसदी नजदीक के रिश्तेदार, परिचित ही होते हैं। सवाल यह है कि सामाजिक रिश्तों की होली को कौन हवा दे रहा है? आज क्यों बेटियां अपने ही घर-आंगन, खलिहान और मोहल्लों में असुरक्षित हो गईं? जो सामाजिक परकोटा उन्हें आत्मविश्वास और सम्मान का अहसास कराता था, आज वही उनका आक्रमणकारी क्यों बन बैठा है? पहले गांव की बेटी बगैर जातिभेद के विवाह बाद पूरे गांव की बेटी ही मानी जाती थी। कुछ और पीछे जाएंगे तो जिस गांव की बेटी पड़ोस के गांव में ब्याही गई है तो पूरा गांव उस गांव में खाता-पीता नहीं था। क्योंकि, बेटी के पीहर वालों का खाना मना था। आज समय का चक्र कैसे घूम गया...! घर में रिश्तों की मर्यादा वासना की बंधक बनती जा रही है। पड़ोसी, मित्र, रिश्तेदार सब संदिग्ध हो चुके हैं। सवाल यह कि आखिर भारत के लोकजीवन में यह जहर भर कैसे रहा है? हकीकत तो यह है कि जिस विकास के रास्ते पर हम चल पड़े हैं उसके मूल में विषमता और भेदभाव के बीज हैं। नई आर्थिक नीतियों के नाम पर जिस उपभोक्तावाद का उदय नागरिकवाद की जगह हुआ है उसने समाज में पैसे को मूल्यों की जगह स्थापित कर दिया। इसलिए नागरिक उपभोक्ता की तरह होकर रह गए, जबकि भारत का लोकजीवन उपभोग के साथ दोहन का हामी रहा है। सहअस्तित्व उसकी आत्मा का आधार है। आज हम विकास के जिस रास्ते पर चल निकले हैं वहां मनुष्य और पशु के बीच का बुनियादी अंतर खत्म हो रहा है। महात्मा गांधी इस बात को बेहतर नजर से देख पा रहे थे। इसलिए वह भारत में काम आवेग के सकारात्मक विस्तार के पक्षधर थे। लेकिन गांधी की दूरदर्शिता को भारत के शासक वर्ग ने कभी समझने का प्रयास नहीं किया। आज आर्थिक नीतियां समाज में खतरनाक हद तक विषमता खड़ी कर चुकी है। हमारी शिक्षा नीति नागरिक नहीं सिर्फ कुंठाग्रस्त इंसानों का निर्माण कर रही है। डिग्रीधारी महज सूचनाओं के अहंकारी पुतले भर हैं। संचार तकनीकी और डेटा को जो नया हथियार बताया जा रहा है, असल में वह भारत में बेटियों के लिए दुश्मन साबित हो रहा है। पिछले दिनों जगतगुरु जग्गी वासुदेव ने एक आईटी विशेषज्ञ से लाइव कार्यक्रम में पूछा कि लोग इंटरनेट पर क्या देखते हैं? उस विदेशी एक्सपर्ट ने बताया कि दुनिया में इंटरनेट यूज करने वाले 84 फीसदी लोग पोर्न देखते हैं। इस समय 43 लाख वेबसाइट से पोर्नोग्राफी दुनिया को परोसी जा रही है। हर 34 मिनट में एक पोर्न मूवी बनाकर अपलोड कर दी जाती है। आंकड़ों की मानें तो पिछले साल 4.6 अरब घंटे लोगों ने इंटरनेट का उपयोग किया, जिसमें से लगभग एक अरब घंटे पोर्न देखा गया। दुनिया में लोग प्रति एक सेकेंड पोर्न देखने पर 2 लाख 09 हजार रुपये खर्च कर रहे हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि इस समय नग्नता का यह कारोबार 101 बिलियन डॉलर यानी 6.7 अरब रुपयों का है। समझा जा सकता है कि डेटा की ताकत कहां खर्च हो रही है। यह पोर्नोग्राफी की सीधी पहुंच जिस तरह चुपचाप से हमारी हर आमोखास चेतना में समा गई है उसने नारी को सिर्फ दैहिक रूप में ही हमारे सामने स्थापित कर दिया है। सामाजिक रिश्तों की बुनियाद पर शारीरिक सबन्ध की महत्ता को खड़ा कर दिया है। डेटा की सस्ती पहुंच ने पहले हमें उपभोक्ता बनाया, फिर वासना को हमारे शरीर से निकालकर मस्तिष्क में स्थापित कर दिया है। यही कारण है कि आज नजदीकी रिश्तों में ही सर्वाधिक यौन आक्रमणकारी घुसे हुए हैं। 
सरकार ने बचपन को ऐसे हमलों से बचाने के लिए पॉक्सो, जेजे एक्ट जैसे सख्त कानून तो बना दिये, लेकिन 43 लाख पोर्न साइटों को प्रतिबंधित करने की दिशा में कोई बुनियादी कदम नहीं उठाया गया है। एक सर्वे के नतीजे बताते हैं कि मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, अहमदाबाद, जैसे बड़े शहरों के नामी पब्लिक स्कूल के कक्षा 8 से 12 तक 78 फीसदी बच्चों ने पोर्न फिल्में देख ली होती हैं। सवाल यह है कि यौन सबन्धों और प्राकृतिक शारीरिक बदलाव पर जब हमारे घर, स्कूल, आसपास कहीं कोई चर्चा तक नहीं होती है, तब ये डेटा जो परोस रहा है उसके आधार पर हम समाज में संयमित यौन व्यवहार की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?
आज भारत की 39 फीसदी आबादी 18 साल से कम आयु की है। इसमें आधी बेटियां हैं। इनको हम पॉक्सो, जेजे एक्ट की सख्त धाराओं और फांसी की सजा के प्रावधानों से शायद ही रोक पाएं। इसलिए सरकार को गांधी की उस दूरदर्शिता को जमीन पर आकर देना ही होगा जो काम को इंसानी ऊर्जा बनाने की बुनियादी सोच की वकालत कर उसे कामांध बनने से रोकती है।
(लेखक जुबेनाइल जस्टिस एक्ट के अधीन बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष हैं।) 


 
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