युगवार्ता

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नई शिक्षा नीति कैसी हो?

24/06/2019

नई शिक्षा नीति के त्रिभाषा फार्मूले का विरोध होने की वजह से मोदी सरकार ने इसे लचीला और सर्वग्राह्य बनाने का वादा किया है। लेकिन शिक्षा नीति में कुछ आमूलचूल बदलाव के बिना इसकी सफलता में संदेह है।

भाजपा नेतृत्व वाली नई राजग सरकार नई शिक्षा नीति का प्रारूप लेकर सामने आई है। इसे के कस्तूरीरंगन समिति ने बनाया है। इसमें पूर्व प्राथमिक (प्ले स्कूल) से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा को अनिवार्य शिक्षा के दायरे में लाने, मातृभाषा में पांचवीं तक शिक्षा प्रदान करने, राष्ट्रीय शिक्षा आयोग बनाने, शिक्षक छात्र अनुपात 1: 30 करने, मिड डे मील में नाश्ता शामिल करने, रेमेडियल शिक्षण पर जोर देने, पुस्तकालयों की जरूरत को समझने, पहली एवं दूसरी कक्षा में भाषा और गणित पर काम करने, विषयवस्तु का बोझ घटाने, शिक्षण में तकनीकी सहायता पर बल देने (डिजिटलाइजेशन) इत्यादि कई अहम बातें हैं।
प्रारूप के त्रिभाषा फार्मूले को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों खासकर तमिलनाडु में हिन्दी की अनिवार्यता को लेकर पुरजोर विरोध हुआ। भाषा सम्बंधी विवाद से तमिलनाडु का पुराना इतिहास रहा है। पुन: इसके उग्र होने की संभावना को देखते हुए मोदी सरकार ने भाषा संबंधी अपने प्रस्ताव को लचीला और सर्वग्राह्य बनाने का आश्वासन तमिलनाडु को दिया है। साथ ही आमजन से नई शिक्षा नीति के प्रारूप सम्बंधी प्रस्ताव आमंत्रित किये हैं। सुझाव कुछ इस प्रकार हो सकते हैंमिड डे मील की जिम्मेवारी से प्रधानाध्यापक को मुक्त किया जाए ताकि उनका पूरा ध्यान पढ़ाई पर हो। एक प्रखंड के सभी सरकारी विद्यालयों के लिए भोजन सामग्री खरीदने, खाना बनाने और उसे स्कूल तक पहुंचाने और जूठे बरतन उठाने की जिम्मेवारी एक अलग एजेंसी को दी जाए।
इससे मॉनटिरिंग भी आसान होगी। दूसरी बात कि स्कूल शिक्षकों को चुनाव ड्यूटी, जनगणना, पशुगणना, प्रचार-अभियान जैसे गैर शैक्षिक गतिविधियों से अलग किया जाए। देहातों में मानसिक बीमारियों को लेकर कोई जागरुकता नहीं होती जिससे यह रोग भयावह रूप ले लेता है। अत: कक्षा सात से बच्चों की नियमित काउंसेलिंग हो। साथ ही हर बच्चे का हेल्थ कार्ड बने। अभी मौजूद सरकारी डॉक्टरों से यदि काम न चले तब हर ब्लाक में कम से कम 3 काउंसिलर नियुक्त कर उनके बीच विद्यालय बांट दिये जाएं। बदलते माहौल में स्वस्थ रहना एक कठिन चुनौती बन गई है। अत: हाई स्कूल स्तर की शिक्षा में हेल्थ एवं वेलनेस का कोर्स भी अनिवार्य किया जाए। प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए हर साल एक कक्षा से दूसरी कक्षा में प्रवेश लेने पर किसी भी नाम से एडमिशन फीस डेवलवमेंट फीस लेने पर रोक लगे। हर प्राइवेट स्कूल एडमिशन बुकलेट में विद्यालय के द्वारा एक सत्र में लिये जाने वाले सभी तरह के फीस, चंदे को रकम सहित दर्शाये। किसी भी कक्षा के किसी भी विषय की किताबों में बदलाव वे पांच साल की अवधि पूरा होने पर ही कर सकें, ऐसा प्रावधान किया जाए।
किसी खास ब्रांड / कंपनी / दुकान की स्टेशनरी आइटम चलाने को प्रतिबंधित किया जाए। शिक्षकों को नियुक्ति के बाद भी प्रमोशन के हर स्तर पर एक टेस्ट प्रक्रिया से गुजरना पड़े, पढ़ाये जाने वाले विषय की जांच हर पांच साल में हो। फेल करने वाले शिक्षक को एक -एक साल बाद दुबारा, तिबारा मौका मिले और इसमें भी फेल करने पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाए। नवोदय विद्यालय अपने लक्ष्य को हासिल करने में विफल सिद्ध हुए हैं। ऐसे में नवोदय विद्यालयों को बंद कर विद्यालय के स्टाफ का समायोजन केंद्रीय विद्यालय में किया जाए। विद्यालय की इमारत में एक तकनीकी विद्यालय जैसे आईटीआई या प्राच्य विधा और भारतीय ललित कला विद्यालय या कृषि विद्यालय खोल दिया जाना चाहिए। राइट टू एजुकेशन एक्ट के तहत 25 फीसदी गरीब छात्रों की मुत शिक्षा में प्राइवेट स्कूल अभिभावकों से तालमेल कर चालाकी करते हैं । ऐसी 25 प्रतिशत सीटों को भरने के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के सरकारी स्कूलों के मेधावी बच्चे चुन लिये जाये जो प्राइवेट स्कूलों के मुत कोटे की सीटों पर दाखिला लेना चाहते हों। प्रार्थी अधिक होने पर उनके मार्क्स को आधार बनाया जाए।
इंटर स्तर पर भारतीय भाषाओं की अनिवार्य पढ़ाई बंद की जाए। इसकी जगह कंप्यूटर ज्ञान अनिवार्य बनाया जाए । + 2 स्तर पर रोजगार के नजरिए से उपयोगी विदेशी भाषाओं में से कम से कम तीन भाषाओं की पढ़ाई करवायी जाए। इससे भारत अपनी युवा आबादी के जनांकीय लाभांश का फायदा उठाकर विदेशी मुद्रा बटोर सकता है । विश्वविद्यालय स्तर पर किसी भी छात्र को आनर्स के साथ सब्सिडियरी विषय के रूप में कोई भी 2 विषय चुनने की स्वंतत्रता होनी चाहिए। मतलब गणित से आनर्स करने वाला छात्र चाहे तो इतिहास और संस्कृत साहित्य भी पढ़ सकता है । कोई बीए/बीकाम कर भी एक जिम्मेवार नागरिक न बन सके तो उसकी पूरी पढ़ाई बेकार कही जायेगी। यहां हम कुछ मामूली बदलाव कर ऐसा कर सकते हैं। दूसरे विश्वविद्यालयों की तरह बनारस हिंदू विवि में स्नातक पार्ट-1 एवं पार्ट -2 में दो सब्सिडियरी पेपर होते हैं लेकिन दोनों सब्सिडियरी में दो-दो खंड होते हैं। मतलब सब्सिडयरी के रूप दोनों पार्ट में कुल 4-4 पेपर पढ़ने होते हैं ।
इस माडल को थोड़ा संशोधन के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए । पार्ट -1 में दो खंडों में बंटा पहला सब्सिडियरी सब्जेक्ट और दो अनिवार्य पेपर (1, 2) हो । इसी तरह पार्ट -2 में दो खंडों में बंटा दूसरा सब्सिडियरी सब्जेक्ट और दो अनिवार्य पेपर (3, 4) हो । ये अनिवार्य पेपर सभी तरह के आनर्स वालों के लिए एक ही हों। प्रथम पांच छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को रिजल्ट आने के एक सप्ताह के भीतर अगले तीन माह तक के लिए विश्वविद्यालय या कालेज की लाइब्रेरी में कम से कम तीन प्रतियों में फोटो स्टेट कराकर रखा जाए। इससे दूसरे छात्र प्रेरित होंगे। अपने कम मार्क्स की असली वजह को समझेंगे। आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियां कम होगी। लापरवाही से कापी चेक करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। अकादमिक मार्क्स के आधार पर आज भी कई नौकरियां मिलती हैं, कम से कम संस्थानो में प्रवेश लेने में तो यह चलता ही है। दुर्भाग्यवश देश के विभिन्न बोर्डों और विश्वविधालयों के मार्किंग पैटर्न में बड़ी विषमता है जिसका खामियाजा समाज को, परिवार को भुगतना पड़ता है जबकि इसके लिए कई बार छात्र दोषी नहीं होता। मार्किंग पैटर्न में समानता लाने के लिए हर विश्वविद्यालय को कहा जाए कि वे अपने प्रश्नपत्र का 50 फीसदी हिस्सा बहुविकल्पीय सवालों वाला रखें तथा शेष भाग को दीर्घ उत्तरीय, लघु उत्तरीय में बांट दिया जाए।
गेस परंपरा को तोड़ना बेहद जरूरी है । यदि लक्ष्य बेहतरी है तो उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की नियुक्ति खुली प्रतियोगिता परीक्षा को सही तरीका से करा कर और अकादमिक रिकॉर्ड के साथ इसके मार्क्स को जोड़ कर की जाए। शिक्षक नियुक्त होने के पांच साल के भीतर पीएचडी करना अनिवार्य बनाया जा सकता है। अस्सिटेंट प्रोफेसर को नियुक्ति के बाद भी एसोसिएट प्रोफेसर, प्रोफेसर में प्रमोशन के हर स्तर पर एक टेस्ट प्रक्रिया से गुजरना पड़े, ऐसी व्यवस्था बनायी जाए ताकि छात्रों को भविष्यदर्शी गुरुओं का मार्गदर्शन सदैव मिलता रहे। पढ़ाये जाने वाले विषय की जांच ली जाए। अपने सब्जेक्ट में नये रिसर्च से वे कितने अवगत हैं उससे सवाल किया जाए। कितने शोध किये और पेपर्स पब्लिश करवाये सभी कुछ उनके टेस्ट में शामिल हो। फेल करने वाले शिक्षक को एक -एक साल बाद दुबारा, तिबारा मौका मिले और इसमें भी फेल करने पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाए। कोचिंग संस्थान प्राय: लूट के अड्डों के रूप में काम करते हैं।

राइट टू एजुकेशन एक्ट के तहत 25 फीसदी गरीब छात्रों की मुत शिक्षा की सीटों को भरने के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के सरकारी स्कूलों के मेधावी बच्चे मार्क्स के आधार पर चुने जायें।

रिजल्ट आने के बाद पैसों की लालच के बल पर वे सफल छात्रों को अपनी संस्था से पढ़ा हुआ बता देते हैं। इसे रोकने के लिए जरूरी है कि कंप्टेटिव एक्जाम के पहले उसकी तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान अपने यहां पढ़ने वाले सभी बच्चों का डाटा एक नेशनल एक्जाम रिजल्ट एजेंसी को भेजें। जब कंप्टेटिव एक्जाम (आईएएस, आईआईटी इत्यादि) का रिजल्ट आये और कोचिंग संस्थान रिजल्ट का विज्ञापन कर दें तो छात्र, अभिभावक नेशनल एक्जाम रिजल्ट एजेंसी की बेवसाइट पर जाकर कोचिंग के घोषित रिजल्ट से मिलान कर यह जांच सके कि किसी छात्र के रिजल्ट पर कोचिंग संस्थान का दावा कितना सच है?


 
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