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कांग्रेस को नेता नहीं, नीति व नीयत बदलने की जरूरत

08/07/2019

मनोज
ज्वाला



तो अंततः
राहुल गांधी ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे ही दिया। बताया जा रहा है कि
17वीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस की
करारी हार के बाद पार्टी में शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर मची उथल-पुथल का यह परिणाम
है। इस्तीफा किसी ने मांगा नहीं था
, उन्होंने स्वयं ही दिया है और जबरन
दिया है क्योंकि उनका इस्तीफा दिया जाना उनकी पार्टी में किसी को मंजूर था ही
नहीं। होता भी कैसे
, वे कोट की
बटन में गुलाब लगाये रखने वाले कांग्रेस के ऐतिहासिक महापुरुष के वंशवृक्ष का ऐसा
फूल हैं
, जिसका
सुफल उस पार्टी को भले न मिला हो
, किन्तु उसकी सुगंध से तमाम कांग्रेसी मदहोश होते रहे हैं।



मार्च 2004 में तब के विपक्षी राजनीतिक मंच पर
धमकने के साथ ही पैतृक विरासत के बूते अमेठी से राहुल के सांसद बन जाने पर
कांग्रेस में किसी राजकुमार के युवराज बन जाने जैसा जश्न मनाया गया था
, क्योंकि उस चुनाव में भाजपा की
वाजपेयी-सरकार का पतन हो गया था। कांग्रेस को उसकी खोई हुई सत्ता वापस मिल गई थी
, जिसे सपूत के पांव पालने मेंकी तरह देखा जा रहा था। ऐसा देखने वाले
यह भी दावा करते रहे थे कि देश की युवा पीढ़ी उस युवराज में ही देश का भविष्य देख
रही है। फलतः सितम्बर
2007 में वे
कांग्रेस महासचिव नियुक्त कर दिए गए
, जिसके बाद 2009 के चुनाव में कांग्रेस दोबारा सत्ता
में आ गई तो उसका सारा श्रेय अनुचित रूप से राहुल को ही दिए जाने और उनका
व्यक्तित्व भारत के भावी प्रधानमंत्री के रूप में गढ़े जाने की प्रतिस्पर्द्धा-सी
मच गई थी तमाम कांग्रेसियों में। उसी भावी योजना के तहत उनका सियासी कद बढ़ाने के
निमित्त
2010 में
कांग्रेस के कथित ऐतिहासिक अधिवेशन के मंच से पहली बार उनका भाषण कराया गया
, जिसके बावत एक वरिष्ठ कांग्रेसी
दिग्विजय सिंह ने कहा था कि
`राहुल जब बोल रहे थे, तब ऐसा लग रहा था कि उनके दिवंगत पिता राजीव का ही भाषण हो रहा हो।' जबकि पी. चिदम्बरम यह कहकर बाजी मार
गए थे कि
`आंखें
मूंदकर ध्यान से सुनने पर उनके भाषण में इन्दिरा गांधी का ही दर्शन हो रहा था।
' मुझे ठीक-ठीक याद है कि तब उक्त
अधिवेशन-स्थल पर उपस्थित एक जाने-माने पत्रकार ने यह लिखकर उन चापलूसों को आईना
दिखा दिया था कि
`…और कान
बन्द करके राहुल का भाषण सुनने वालों को तो महात्मा गांधी का ही दर्शन हो रहा था।
' आप समझ सकते हैं कि एक सियासी खानदान
की चेरी बनी जिस पार्टी के शीर्ष पर ऐसे-ऐसे चापलूसों की जमात भरी पड़ी हो
, उसमें उसके खानदानी प्रमुख से कोई
इस्तीफा मांगने अथवा बिना मांगे भी उसके द्वारा दिए जाने पर उसे स्वीकार करने की
हिमाकत कोई कर सकता है क्या
?



तो उन्हीं
राहुल गांधी को भाजपा की राह रोकने के लिए
2013 में कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाकर देश
के सामने पेश किया गया था
, जिसके बाद
कांग्रेस बुरी तरह से हार कर न केवल सत्ता गंवा बैठी
, बल्कि विपक्ष में बैठने लायक भी नहीं
रही। लेकिन कांग्रेसजनों को तब भी राहुल गांधी के भाषणों में राजीव और इन्दिरा के
दर्शन होते रहे और वे उनके नेतृत्व में सत्ता वापस पाने का सामगान करते हुए उन्हें
कांग्रेस की पूरी कमान सौंप दिए जाने की चिरौरी उनकी मां सोनिया गांधी से करते रहे
, तो अन्ततः 2017 में उन्हें पार्टी का अध्यक्ष भी बना
दिया गया था। तब से गत लोकसभा चुनाव तक राहुल गांधी अपने सियासी खानदान का सिक्का
देशभर में चलाने की बहुविध मशक्कत करते रहे। लोकल ट्रेन में यात्रा किये
, गांव में रात गुजारे, एक गरीब आदिवासी के घर खाना खाये, रिक्शा-चालकों से मिलकर उनकी व्यथा
सुनी
, सफाईकर्मियों
के साथ अपनी तस्वीरें खिंचवायी तथा बेरोजगार नौजवानों को आलू से सोना बनाने सहित
नरियल से जूस निकालने व गांव-गांव में कारखाना स्थापित करने
, बैंक-ऋण माफ करा देने और हर मतदाता को
प्रतिमाह छह-छह हजार रुपये नकद राशि प्रदान करने तक अनेकानेक आश्वासन दिए।
भाजपा-मोदी-सरकार के हर निर्णय का विरोध कर पूरे पांच साल संसद की कार्यवाहियां
बाधित करते रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर चोरी-घूसखोरी का निराधार आरोप लगाते
रहे तथा कांग्रेस के मुस्लिम वोटबैंक की सुरक्षा हेतु रामजन्मभूमि पर मन्दिर
निर्माण मामले में अड़ंगा डालते रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर कीचड़ उछालते रहे
, गौ-हत्या का समर्थन करते रहे और
जिहादियों-आतंकियों-देशद्रोहियों को सम्मान-समर्थन देते हुए भारत माता की जय व
वन्दे मातरम का विरोध तो करते ही रहे
, भारत के टुकड़े-टुकड़े करने का नारा
लगाने वालों से हाथ मिलाते हुए भारतीय सेना से भी उसके पराक्रम का सबूत मांगते
रहे। और तो और
, कई मौकों
पर पाकिस्तान की तरफदारी भी की तथा बांगलादेशी रोहिंग्या मुसलमानों को भारत की
नागरिकता दिलाने और देशद्रोह कानून को ही समाप्त करने की वकालत भी। इतना ही नहीं
, हिन्दू-समाज से मतबटोरने के लिए यज्ञोपवित पहनकर अपने
कुल-गोत्र का इजहार करते हुए मंदिरों में पूजा-अर्चना के ढकोसले भी खूब किये
, किन्तु बहुसंख्यक मतदाताओं ने कांग्रेस
के हिन्दुत्व विरोधी साम्प्रदायिक तुष्टिकरण एवं राष्ट्र विमुखी वैचारिक क्षरण तथा
भारत विरोधी तत्वों के संरक्षण और सत्तालोलुप राजनीतिक आचरण को सिरे से खारिज कर
दिया।



परिणाम
वही हुआ-दिन भर चले ढाई कोस। बहन प्रियंका वाड्रा को भी साथ लेकर महज
10 सीटें ही बढ़ा सके और कांग्रेस को
सत्ता के शिखर पर पहुंचाना तो दूर
, उसे विपक्ष की जमीन भी नहीं दिला सके।
इस असफलता से खीझे राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है
और कहा है कि वे अब और भी ज्यादा
, अपनी दस गुणी ताकत से भाजपा व मोदी के विरुद्ध लड़ेंगे। ऐसे में यह तो लगभग
तय है
, जैसा कि
पहले भी होता रहा है कि कांग्रेस का कोई भी नया अध्यक्ष उस
गुलाब की खुशबू वाले वंशवृक्षकी छाया में ही फल देने की चेष्टा
करेगा
, जिसे
राहुल गांधी की उपरोक्त अवांछित नीतियों के दसगुणे विस्तार की शक्ति युक्ति से ही
पार्टी को संचालित करना पड़ेगा। इससे यह तय है कि हिन्दुत्व प्रेरित राष्ट्रवादी
राजनीति के भाजपाई उभार का मुकाबला कांग्रेस कतई नहीं कर पायेगी क्योंकि देश का
मन-मिजाज एकबारगी बदल चुका है और देश को कमजोर करने वाली कांग्रेस की बेपर्द होती
दुर्नीति को जनता समझ चुकी है। अतएव
, कांग्रेस को नेता के बजाए अपनी सियासी
नीति व नीयत बदलने की जरूरत है। सत्ता के शिखर पर पहुंचने के लिए ही नहीं
, अपितु विपक्ष की जमीन हासिल करने के
लिए भी। उसे विरोध की राजनीतिक नाव भी हिन्दुत्व प्रेरित राष्ट्रीयतावादी राजनीति
की धारा में उतरकर ही चलानी होगी। नयी राजनीतिक धारा का निर्माण अब वह नहीं कर
सकती क्योंकि यह तो भारत की नियति के वश में है।

(लेखक
स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
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