लेख

Blog single photo

बिहार : राजग में शह-मात, क्या गुल खिलाएगा

10/09/2019

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

बिहार विकास की पटरी पर दौड़ रहा है। इस बात से सभी इत्तेफाक रखते हैं। जिस बिहार ने जंगलराज से लेकर नरसंहार तक की काली तस्वीरों को देखा है आज उस बिहार का नक्शा पूरी तरह से बदला हुआ नजर आ रहा है। इस बदलते बिहार की तस्वीर के लिए एनडीए अपनी पीठ थपथपाता रहा है। बात में दम भी है जो काम करेगा उसका नाम तो होगा ही। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई नए प्रयोग कर बिहार के विकास में खुद को मिल का पत्थर साबित करने में कामयाब रहे हैं। इस कामयाबी में जदयू और भाजपा दोनों की भूमिका बराबर की है। लेकिन इधर कुछ दिनों से या यों कहें कि केंद्र में दूसरी बार पूर्ण बहुमत से एनडीए की सरकार बनने के बाद भाजपा के स्वर बदलने लगे हैं, तो जदयू भी अपनी वोट की राजनीति करने से बाज नहीं आ रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव करीब है। ऐसे में एनडीए में टकराव दोनों दलों (भाजपा-जदयू) के लिए ठीक नहीं है।
जुबानी जंग जारी
बिहार की सत्ता में बैठे एनडीए गठबंधन के दोनों प्रमुख दलों के बीच आपसी जुबानी जंग का दौर जारी है। इस जंग में भाजपा इस बार कुछ ज्यादा तल्ख नजर आ रही है। विधान परिषद के सदस्य संजय पासवान ने तो सीधे-सीधे नीतीश के नेतृत्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि 'इस बार मुख्यमंत्री की कुर्सी भाजपा को मिलनी चाहिए। नीतीश कुमार ने 15 वर्षों तक बिहार की बागडोर संभाली, अब उन्हें केंद्र में सेवा देनी चाहिए।' इससे पहले भी तीन तलाक से लेकर अनुच्छेद 370 पर कई बार भाजपा और जदयू आमने-सामने आ चुके हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2020  होने में अब कुछ ही महीने बचे हुए हैं। उससे पहले भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के जुबानी प्रहार से कुछ और मतलब निकल रहा है।
बिखराव के हालात
पासवान कहते हैं कि 'अब किसी कीमत पर बिहार की राजनीति में भाजपा छोटे भाई की हैसियत में नहीं रहना चाहती।' संजय पासवान ने इस तरह का बयान देकर बिहार की राजनीति में एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। इतना से भी जब जी नहीं भरा तो यह भी कह दिया कि बिहार की सत्ता सुशील कुमार मोदी को सौंप देनी चाहिए। बिहार में पहली बार किसी राजनेता ने सुशील मोदी को सत्ता सौंपने का हवाला देकर नयी चाल चली है। पासवान ने यहां तक कह दिया है कि सुशील मोदी बिहार में ही रहें और नीतीश कुमार को दिल्ली चले जाना चाहिए। इस बयान से तो इतना ही कहा जा सकता है कि इस बार बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भाजपा की नजर टिकी हुई है।
विकास पर टकराव 
झारखंड की राजधानी रांची में कुछ दिन पहले जदयू की बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि पिछले 19 सालों से झारखंड में ज्यादातर एक ही पार्टी की सरकार रही है। इसके बावजूद विकास में राज्य पिछड़ गया है। नीतीश के इस बयान के बाद भाजपा आक्रामक हो गई है। भाजपा के वरिष्ठ नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. सी पी ठाकुर ने नीतीश कुमार पर झारखंड में विकास मसले पर पलटवार करते हुए कहा कि बिहार से ज्यादा झारखंड का विकास हुआ है। साथ ही ठाकुर ने ये भी कहा कि जदयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर तो व्यवसायी हैं। बंगाल में भी वह असफल साबित होंगे।
एनआरसी मुद्दे पर आमने-सामने
असम के बाद बिहार के सीमांचल में रह रहे घुसपैठियों को लेकर आरएसएस नेताओं सहित बिहार भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने नीतीश पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। कुछ दिन पहले राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने बिहार में एनआरसी लागू करने को लेकर कहा था कि सूबे के सीमांचल इलाके में घुसपैठियों की भारी तादाद मौजूद है। यहां भी एनआरसी लागू होना जरूरी है। केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह समेत कई अन्य भाजपा नेताओं की भी यही राय है। इसके उलट, जदयू के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी कहते हैं कि एनआरसी की जरूरत बिहार जैसे राज्य में बिल्कुल नहीं है। जबकि भाजपा किसी भी कीमत पर एनआरसी के मुद्दे को छोड़ना नहीं चाहती है। दूसरी तरफ अल्पसंख्यक वोटरों को रिझाने की फिराक में जदयू एनआरसी का विरोध कर रहा है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने एनआरसी के मुद्दे पर कहा कि सीमांचल इलाके में जनसंख्या विस्फोट का कारण बांग्लादेशी घुसपैठिये हैं। इसलिए बिहार में एनआरसी को लागू करना बहुत जरूरी है। भाजपा नेता राम नारायण मंडल भी सीमांचल में बांग्लादेशी घुसपैठियों को जनसंख्या विस्फोट का बड़ा कारण मानते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव करीब है। इसीलिए भाजपा और जदयू अपने-अपने वोटरों को चिन्हित कर रिझाने में लगे हुए हैं।
थर्ड फ्रंट से इनकार नहीं 
बिहार में एनडीए गठबंधन की सरकार चल रही है। लेकिन बिहार के बाहर निकलते ही जदयू और भाजपा के नेता एक-दूसरे के खिलाफ बोलने से बाज नहीं आ रहे हैं। दरअसल, झारखंड में सभी सीटों पर जदयू की अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी है। ऐसे में देखने वाली बात ये है कि अगर इस तरह से दोनों दलों के बीच जुबानी जंग का दौर जारी रहा तो इसका फायदा महागठबंधन उठा सकता था। लेकिन महागठबंधन के अंदरखाने भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। अगर ऐसी ही स्थिति बनी रही तो बिहार में थर्ड फ्रंट की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है।
(लेखक पत्रकार हैं।)


 
Top