लेख

Blog single photo

विधानसभा चुनाव के नतीजों के मायने समझने होंगे!

29/10/2019

ऋतुपर्ण दवे

समें कोई दो मत नहीं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का तिलिस्म बरकरार है। पर, महाराष्ट्र और हरियाणा में जादू फीका-सा पड़ता दिखा जो एक अलग इशारा है। पहले भी मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम में ऐसा दिख चुका है। इन नतीजों ने इतना तो जता दिया है कि भारत का मतदाता अपने वोट का फर्क बखूबी समझने लगा है। उसके लिए लोकसभा और विधानसभा के क्या मायने हैं और कैसी उम्मीदें हैं, खूब समझता है। अब दोनों चुनावों यानी लोकसभा और विधानसभा को एक ही वैतरणी से पार करने का मंसूबा पाले राजनीतिक दलों को यह चेतावनी समझनी होगी। मतदाता को केवल वोट मात्र समझने की गलती से बचना होगा। मुद्दों की राजनीति और केन्द्र-राज्य के दायित्व अलग-अलग विषय हैं। दोनों के कामों का फर्क ही दलों की जीत-हार या लोकप्रियता का कारण बनते हैं। समय-समय पर क्षेत्रीय क्षत्रप भी राष्ट्रीय दलों की नाकामी का कारण बन जाते हैं।
भारतीय लोकतंत्र की इससे बड़ी मजबूती और क्या हो सकती है कि राज्य और केन्द्र का फर्क मतदाता ने फिर सामने रख दिया। इसके कई मायने हैं। भारतीय लोकतंत्र की गहरी और पक्की नींव के लिए इससे अच्छा क्या हो सकता है। महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों ने जहां एक बार फिर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही उन लोगों के मुंह पर भी ताला जड़ दिया है जो एक ही मैजिक के सहारे हर कहीं करिश्माई नतीजों की खुशफहमी में थे। 5 महीने पहले जहां आम चुनावों में मतदाताओं के एकतरफा रुख के साथ देश में मजबूत सरकार की और भी मजबूती से वापसी हुई। अब विधानसभा चुनावों में लोकसभा के मुकाबले केवल 4 महीने बाद भाजपा को उम्मीद से बेहद कम सफलता मिलना और दोनों ही राज्यों में कई मंत्रियों का हार जाना बताता है कि केन्द्र और राज्य के मुद्दे को एक ही नजरिए से देखना, देखने वालों की बड़ी भूल है। हो सकता है कि दूसरे के धरातल को परखे बिना केवल भाषणों में किसी प्रतिद्वंद्वी के अस्तित्व को चुनौती देना भी शायद इन राज्यों के मतदाताओं को नागवार गुजरा हो या राज्य की जरूरतों के लिहाज से अलग समीकरणों की दरकार हो।
एक करिश्मा जरूर हुआ वह यह कि शायद कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सफलता मिली जो अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे चुनौतीपूर्ण दौर में किसी संजीवनी से कम नहीं है। इन नतीजों ने एक परिपक्व लोकतंत्र की मिशाल पेश करते हुए दोनों राज्यों के मतदाताओं की बुद्धिमता और मंशा को भी जतला दिया कि मजबूत विपक्ष भी उतना ही जरूरी है जितनी मजबूत सरकार। नतीजों ने राज्य के विकास, आम आदमी की चिन्ता और रोजमर्रा की जरूरतों पर मतदाताओं के एजेण्डे को भी साफ कर दिया। हां, इस चुनाव में भी मुद्दों से भटकी कांग्रेस गुटबाजी का ठीक वैसा ही शिकार रही जैसा लोकसभा चुनावों में थी। लेकिन मतदाताओं ने कांग्रेस पर जो भरोसा जतलाया, मजबूत विपक्ष की हैसियत दी, उसे बख्शीश और नसीहत समझकर यदि पार्टी अपने आंतरिक लोकतंत्र की मजबूती पर फोकस करेगी तो आगामी विधानसभा चुनावों में नतीजे और भी बेहतर होंगे। यह भी ध्यान देने योग्य और कांग्रेस के लिए सीख लेनेवाली बात होगी कि लोकप्रियता और चुनावी प्रबंधन में कभी देश में एक छत्र राज्य और लंबे समय तक सिक्का जमाए रखी पार्टी, संगठन का सही प्रबंधन कर ले तो अब भी काफी कुछ ठीक हो सकता है। हालांकि मौजूदा हालातों में यह दिखता नहीं है। फिर भी मतदाताओं की नब्ज टटोली जाए तो यह भी नहीं समझ आता है कि कांग्रेस मुक्त भारत का सपना भी दूर-दूर तक कहीं साकार होता नजर आता है। अब इस पर चिन्तन और निर्णय तो कांग्रेस को ही लेना है। 
चौंकाने वाले इन नतीजों में जहां हरियाणा में 2019 लोकसभा चुनावों में भाजपा को 58 प्रतिशत वोट मिले थे वहीं महज 5 महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में यह प्रतिशत 36 पर आ टिका। यानी लगभग 22 फीसदी का बड़ा नुकसान हुआ। उधर, महाराष्ट्र में भी लोकसभा चुनाव में भाजपा को 51 प्रतिशत वोट मिले जबकि विधानसभा चुनाव में वोट प्रतिशत 42 हो गया। जो लोकसभा के मुकाबले 9 प्रतिशत कम रहा। हरियाणा में 75 पार का नारा देने वाली भाजपा 40 पर ही अटक गई जबकि कांग्रेस को 31 सीटें मिलीं। भाजपा बहुमत के लिए जरूरी सीटें 46 तक भी नहीं पहुंच पाई। हालांकि चुनाव से पहले तक विरोधी रही जननायक जनता पार्टी के साथ भाजपा ने गठबंधन कर सत्ता जरूर हासिल कर ली है। लेकिन आगे सामंजस्य कैसा होगा, कहना जल्दबाजी होगी। इसी तरह महाराष्ट्र में पूर्ण बहुमत पाकर भी सरकार के गठन में हो रही देरी का कारण किसी से छुपा नहीं है। भाजपा-शिवसेना गठबंधन के 161 सीटें जीतकर भी सरकार बनाने में हो रही देरी से अलग ही संदेश जा रहा है। इस चुनाव में शिवसेना 63 से 56 पर और भाजपा 122 से 105 पर आ गई। उधर, राकांपा 41 से 54 और कांग्रेस 42 से 44 सीटें जीतकर पहले से मजबूत हुई। शिवसेना का चुनाव लड़ने से पहले भाजपा के साथ हुए 50-50 के फॉर्मूले को लेकर अड़ने से सरकार को लेकर सस्पेंस बना है जो इस गठबंधन की सरकार बनने के बाद भी बना रहना तय है।
महाराष्ट्र और हरियाणा में प्रचार के दौरान भाजपा ने जहां अनुच्छेद-370, तीन तलाक तथा राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया वहीं कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दलों ने बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, भ्रष्टाचार, मंदी और अर्थव्यवस्था पर राज्य की भाजपा सरकारों को घेरने की कोशिश की। लेकिन मतदाताओं ने इनसे इतर स्थानीय मुद्दों और रोजमर्रा की समस्या पर वोट देकर एक अलग संदेश देने की कोशिश की है। निश्चित तौर पर राज्यों के हालिया चुनावी नतीजों के मायने काफी गहरे और चेतावनी भरे हैं। जो राज्य और केन्द्र की जिम्मेदारियों को समझाते भी हैं। आगामी चुनावों में दलों को इसे समझना होगा। वरना, लगता है कि मतदाता ही इसी तरह समझाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे।
(लेखक पत्रकार हैं।)


 
Top