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फेसबुक की मनहूस दुनिया

09/07/2019

फेसबुक की मनहूस दुनिया

मनोज मोहन

 मारा सामाजिक जीवन सहज नहीं रह गया है। हमें कहां ले जाया जाना है, यह हमें बताया नहीं जा रहा है। सक्रिय राजनीतिक और धार्मिक तत्व हमें उजाले की ओर नहीं ले जा रहे हैं। इसका अहसास एक बड़े तबके के मन में गहराता जा रहा है। हमें तेजी से सामाजिक विमुखता की ओर धकेला जा रहा है। सिरिल सैम और परंजय गुहा ठाकुरता ने इन कारणों की पहचान फेसबुक के इंद्रजाल में फंसे होने की ओर संकेत किया है। इन दोनों ने अपनी नयी पुस्तक ‘फेसबुक का असली चेहरा’ में इस तथ् य का खुलासा किया है कि सोशल मीडिया कैसे प्रौपेगैंडा का हथियार और फर्जी सूचनाओं के प्रसार का माध्यम बन गया है। आज फेसबुक का असली चेहरा यही है कि वह फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से चुनावी गणित की सहज और सरल गणना को भी सत्ता- पक्ष की तरफ मोड़ने में सक्षम सिद्ध हुआ है। इस पुस्तक का प्रकाशन 2019 के आम चुनाव से पहले ही हो चुका था। लेखक द्वय अपना उद्देश्य यह बताते हैं कि उन्होंने लोकतंत्र को कमजोर करने में सोशल मीडिया के दुरुपयोग से संबंधित विभिन्न आयामों को तथ्यों के साथ पाठकों के समक्ष रखने की कोशिश की है। सिरिल सैम और परंजय गुहा का स्वर धीमा है जबकि प्रस्तावना में रवीश कुमार और प्राक्कथन में अपूर्वानंद वर्तमान सत्ता-पक्ष को फेसबुक के दुरुपयोग के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराते हैं।

भूमिका में प्रबीर पुरकायस्थ भी कहते हैं कि जो लोग इस भ्रम में जी रहे हैं कि सोशल मीडिया एक स्वतंत्र और उदार मंच है, जिससे मीडिया घरानों के एकाधिकार को तोड़कर विचारों के प्रसार का काम आम लोगों के हाथों में जा सकता है, उन्हें यह पता चल रहा है कि फेसबुक और गूगल की अपनी एक मनहूस दुनिया है। चौदह साल पहले मार्क जुकरबर्ग की डोरमेट्री से शुरू होने वाले फेसबुक के बारे में न्यू यॉर्कर के इवांस ओस्नोस कहते हैं कि आज इंसानी आबादी की तकरीबन एक तिहाई यानी 2.2 अरब लोग हर महीने फेसबुक पर लॉग इन करते हैं।
भारत के मीडिया संस्थानों और बौद्धिक वर्ग के एक बड़े तबके की राय है कि फेसबुक जानबूझ कर सत्ताधारी पार्टी या केंद्र की मौजूदा सरकार की आलोचना करने वाली खबरों को दरकिनार कर देता है। जबकि यह भी सच का एक हिस्सा है कि अर्जेंटीना, आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, आयरलैंड और ब्रिटेन जैसे देश फेसबुक से खफा हैं और उसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग इस आरोप का गोलमोल जवाब दे अपनी जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। वहीं व्हाट्सएप के वैश्विक प्रमुख क्रिस डैनियल्स भारत के कानून मंत्री से मिलकर यहां की जनता के प्रति एक तरफ प्रतिबद्धता भी दिखाते हैं और दूसरी ओर व्हाट्सएप को भुगतान की सेवा शुरू करने की मंजूरी न मिलने पर भारत सरकार से गहरी नाराजगी भी जताते हैं। अब जबकि 2019 का चुनाव परिणाम सबके सामने है तो यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि भाजपा के समर्थकों, शुभचिंतकों और कार्यकर्ताओं ने फेसबुक और व्हाट्सएप का जितनी सफलता से इस्तेमाल किया है, उतनी सफलता से दुनिया में किसी और ने नहीं किया। कहा जाता रहा है कि फेसबुक और वाट्सऐप भाजपा के समर्थकों की राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा स् थल है। जबकि वास्तविकता यह है कि आचरण और सोच के स्तर पर यहां राष्ट्रभक्ति का कोई सकारात् मक पहलू दिखाई नहीं देता। हालांकि फेसबुक और वाट्सऐप के दुरुपयोग के मामले में पुस् तक का अधिकांश हिस् सा भाजपा की मजम् मत करता है। लेकिन अगर वर्तमान सत्ताधारी दल पर सोशल मीडिया के दुरुपयोग का आरोप दरकिनार भी कर दिया जाए, तब भी यह आरोप बचा रहता है कि हम नैतिकता का दामन थामे बगैर फेसबुक और वाट्सऐप को मनुष्य और पर्यावरण विरोधी होने से रोक नहीं पाएंगे। इस पुस्तक में शामिल परिशिष्ट के दोनों हिस्से को पहले पढ़ा जाना चाहिए। आज जब व्यक्ति के सार्वजनिक जीवन को सोशल मीडिया ने क्षतिग्रस्त कर रखा है, तो यह पुस्तक एक राह निकालने की कोशिश करती जान पड़ती है। 


 
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