लेख

Blog single photo

जस्टिस बोबडे पर रहेगा न्यायतंत्र की आकांक्षाओं का भार

02/11/2019

डाॅ. रमेश ठाकुर
न्याय सिस्टम को बदलाव की सख्त जरूरत है। इसके लिए लीक से हटकर प्रदर्शन करने वाले सीजेआई की दरकार है। ऐसी ही उम्मीदों और आकांक्षाओं के साथ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे के नाम पर देश के 47वें प्रधान न्यायाधीश की मुहर लगी। कानूनी निर्णयों की फेरिस्त देखें तो उनके नाम पूर्व में कई ख्यातियां हैं। सख्त, कठोर मिजाज और पारर्दिशता उनकी पहचान रही है। जब उनके नाम का एलान हुआ तो किसी को आपत्ति नहीं हुई, जबकि पूर्व में कई नामों पर विरोध देखा गया है। उदाहरण सामने है पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा को जब प्रधान न्यायाधीश बनाया गया था तब विपक्ष ने उनका संबंध आरएसएस विचार से प्ररित बताया था। उनके अलावा भी अन्य नामों पर विरोध पूर्व में हुआ लेकिन जस्टिस शरद अरविंद बोबडे के नाम पर सभी ने सहमति जताई।
वर्तमान प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने बिना किसी राजनीति और भेदभाव, पक्षपात के वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस बोबडे का नाम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेजा। वहां भी देरी नहीं हुई, नाम भेजने के कुछ ही समय के अंतराल में उनका नाम मीडिया में तैरने लगा। सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति बोबडे वर्तमान प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई का स्थान लेंगे। प्रधान न्यायमूर्ति के तौर पर बोबडे का कार्यकाल 23 अप्रैल, 2021 तक रहेगा। उनके समक्ष चुनौतियों का भंडार होगा क्योंकि उनके हिस्से कई बड़े फैसले आने वाले हैं। जस्टिस बोबडे से उम्मीदें काफी हैं। उनके काम करने के अंदाज से सभी वाकिफ हैं। उन्होंने जिस तरीके से आधार कार्ड प्रकरण के अलावा अन्य तमाम महत्वपूर्ण मामलों की सुप्रीम कोर्ट में निष्पक्ष तरीके से सुनवाई की थी उसकी तस्वीर लोगों के जेहन में अब भी घूमती है।
जस्टिस बोबडे इस वक्त आजादी के बाद से सबसे बड़े मसले, जो सियासी रूप से नासूर बने हुए हैं। यूं कहें राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद की सुनवाई करने वाली पीठ के सदस्य भी हैं, जिनमें वह अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। हो सकता है पंद्रह नवंबर तक निर्णय भी आ जाए। जस्टिस बोबडे को बचपन से विरासत के रूप में वकालती वातावरण मिला। उनकी शुरूआती शिक्षा कानूनी किताबों के इर्द-गिर्द घूमती रही। शुरू से सख्त मिजाज रहे हैं। फिल्में देखना उन्हें काफी पसंद रहा। सिनेमाघरों में जब कोई ऐसी फिल्म लगती थी जो बड़े केसों पर केंद्रित होती थी, उन्हें देखना नहीं भूलते थे। जस्टिस बोबडे के पिता श्रीनिवास बोबडे का नाम देश के बड़े नामों में शुमार है। वह दो मर्तबा महाराष्ट्र सरकार के महाअधिवक्ता रहे। बड़े भाई विनोद बोबडे भी वकील हैं।
जस्टिस बोबडे का नाम बड़े उदारवादी और पक्षकारों में गिना जाता है। बात जनवरी 2018 की है, तब मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ एक साथ सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने प्रेसवार्ता कर न्यायतंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया था। जस्टिस बोबडे ही वह शख्स थे जिन्होंने दोनों पक्षों में फैले मतभेदों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जस्टिस बोबडे की दखल के बाद ही मामला शांत हुआ था। सुप्रीम कोर्ट में इस वक्त लाखों केस ऐसे पेंडिंग हैं जो अंतिम जिरह की राह देख रहे हैं। उम्मीद है उन सभी केसों का निपटारा होगा। साथ ही उनके आने से न्याय सिस्टम में और मजबूती आएगी।
न्यायतंत्र के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था, जब किसी सिंटिंग सीजेआई पर यौन आरोप लगे हों। सीजेआई रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगे तो उसके निपटारे का जिम्मा भी जस्टिस बोबडे पर था। आरोपों की जांच करने वाली तीन सदस्यीय आंतरिक समिति की अध्यक्षता भी न्यायमूर्ति बोबडे ने ही की थी। जस्टिस बोबडे के अलावा उस पीठ में दो महिला न्यायाधीश भी थीं। मामला शीर्ष अदालत की एक पूर्व कर्मचारी से जुड़ा था जिन्होंने सीजेआई पर आरोप लगाए थे। मसला जब घर से जुड़ा हो तो पैरवी करना भी सबों के लिए आसान नहीं था। लेकिन उस केस में भी जस्टिस बोबडे ने कोई पक्षपात नहीं किया। न्यायतंत्र की रक्षा करते हुए सही निर्णय दिया।
जस्टिस बोबडे ने एक और बेहतरीन फैसले की मिसाल पेश की थी। मामला आधार से जुड़ा था जिसमें 2015 में उन्होंने स्पष्ट किया था कि आधार कार्ड नहीं रखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को बुनियादी सेवाओं और सरकारी सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाएगा। इसके अलावा न्यायमूर्ति बोबडे की अध्यक्षता वाली दो सस्यीय पीठ ने हाल ही में क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड के कामकाज का संचालन करने वाली प्रशासकों की समिति को अपना काम खत्म करने का निर्देश दिया ताकि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के संचालन के लिए नए सदस्यों का निर्वाचन सही ठंग से हो सके। क्योंकि पूर्व में इनकी नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही की गई थी। कई ऐसे मामले रहे जिनके आधार पर उनके नाम पर मुख्य न्यायाधीश बनने की मुहर लगी।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)


 
Top