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अभी चंद्रयान- 2 पर उम्मीद बाकी

19/09/2019

अभी चंद्रयान- 2 पर उम्मीद बाकी

आर के सिन्हा

ब कुछ ठीक रहता तो भारत दुनिया का ऐसा पहला देश बन जाता, जिसका अंतरिक्षयान चन्द्रमा की सतह के दक्षिणी ध्रुव के करीब उतरता। इससे पहले अमरीका, रूस और चीन ने चन्द्रमा की सतह पर सॉμट लैंडिंग करवाई थी । दक्षिणी ध्रुव पर किसी ने अबतक लैंडिंग करवाने की हिम्मत नहीं की थी। भारत के लैंडर विक्रम की लैंडिंग तो हुई, पर कहां और किन परिस्थितियों में हुई, इसका अध्ययन चल रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बताया है की चांद पर हार्ड लैंडिंग के बाद विक्रम चांद की धरती पर गिरकर थोड़ा तिरछा हो गया है। हालांकि, वह टूटा नहीं है।

सबसे ऊंचे स्तर पर वे लोग पहुंचते हैं, जो लगातार रुकावट के बावजूद निरंतर प्रयास करते हैं और अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही दम लेते हैं। इसरो के वैज्ञानिक इसी स्तर के लोग हैं।

वैज्ञानिक अब इस बात की संभावना खंगालने में जुटे हैं कि विक्रम से पुन: संपर्क कैसे स्थापित हो सकता है। भले ही विक्रम का कोई हिस्सा टूटा नहीं है, लेकिन इससे पुन:संपर्क स्थापित कर पाना मुश्किल लगता है। अगर इसकी साहμट लैंडिंग हुई होती और इसके सभी पुर्जे सही सलामत काम कर रहे होते, तभी संपर्क हो सकता था। एक अधिकारी ने एक पुराने मामले को याद करते हुए कहा कि एक बार अंतरिक्ष यान से संपर्क टूट गया था और बाद में जुड़ गया। अधिकारी ने साथ ही स्पष्ट किया कि लैंडर का मामला उससे अलग है। यह चांद की सतह पर पड़ा है और वहां उसकी स्थिति को बदलने का कोई विकल्प नहीं है।

लैंडर पर लगे एंटीना या तो धरती पर स्थापित इसरो के स्टेशन की ओर हों या आर्बिटर की ओर, तभी संपर्क संभव है। इसरो नियंत्रण कक्ष में इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनने पहुंचे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैज्ञानिकों का जिस तरह हौसला बढ़ाया, वह काबिले-तारीफ है। उन्होंने कहा कि वे मिशन में आई रुकावटों के कारण अपना दिल छोटा नहीं करें, क्योंकि नई सुबह जरूर होगी। प्रधानमंत्री ने इसरो प्रमुख को जिस प्यार से गले लगाया और काफी देर तक उनकी पीठ को सहलाते रहे और ढाढस बंधाते रहे, वह अद्भुत दृश्य था। राष्ट्राध्यक्ष हो तो ऐसा। किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रयास करने वाले तीन तरह के लोग होते हैं। सबसे निचले स्तर पर वे होते हैं, जो रुकावटों के डर से कभी काम की शुरुआत नहीं करते।

मध्य स्तर पर कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो काम तो शुरू कर देते हैं पर रुकावट आते ही भाग जाते हैं। सबसे ऊंचे स्तर पर वे लोग पहुंचते हैं, जो लगातार रुकावट के बावजूद निरंतर प्रयास करते हैं और अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही दम लेते हैं। इसरो के वैज्ञानिक इसी स्तर के लोग हैं। एक शेर याद आ रहा है, जो इसरो वैज्ञानिकों को समर्पित है- इस तरह तय की हैं हमने मंजिलें। गिर पड़े, गिरकर उठे, उठकर चले। भारत की इस हार में भी जीत ही है। आॅर्बिटर भारत ने पहले भी पहुंचाया था। चंद्रयान-1 के आॅर्बिटर से चंद्रयान-2 का आॅर्बिटर ज्यादा आधुनिक और अनेकों साइंटिफिक उपकरणों से लैस है। इससे चांद के अस्तित्व में आने से लेकर इसके विकास क्रम को समझने में मदद मिलेगी। इसके अलावा इमेजिंग आईआरएस स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से यहां की सतह पर पानी और अन्य खनिजों की उपस्थिति के आंकड़े जुटाने में मदद मिलेगी। साथ ही वैज्ञानिक विक्रम लैंडर के μलाइट डेटा रिकॉर्डर के डेटा से यह पता करने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर 2.1 किमी की ऊंचाई पर क्यों लैंडर अचानक अपने रास्ते से भटक गया। भविष्य में विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर कितना काम करेंगे, इसका पता तो डेटा एनालिसिस के बाद ही चलेगा।

सही अर्थों में इस अभियान ने 95 नहीं, बल्कि 99 फीसद लक्ष्य हासिल कर लिया है। मिशन के पूरी तरह से सफल ना होने पर पाकिस्तान जिस तरह से गदगद है, वह उसकी बीमार मानसिकता को ही दर्शाता है। वहां पर कई स्तरों पर भारत के महत्वाकांक्षी मिशन के सफल न होने पर सरकार और कुछ उन्मादी अवश्य खुश हुए ।


 
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