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भारतीय सभ्यता में धर्मनिरपेक्षता अंतरनिहीत : आरिफ मो. खान

10/08/2019

मनीष कुलकर्णी
नागपुर, 10 अगस्त (हि.स.)। नागपुर विश्वविद्यालय में आयोजित व्याख्यान में पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने भारतीय सभ्यता में धर्मनिरपेक्षता को अंतरनिहीत बताया है। साथ ही सेक्युलॅरिज्म जैसी विदेशी परिकल्पना वाले शब्दों को उन्होंने भारत के लिए निष्फल करार दिया है ।

नागपुर विश्वविद्यालय में “अंडर स्टैंडिंग सेक्युलॅरिज्म इन इंडिया” विषय पर आयोजित व्याख्यान में अपनी ओर से मार्गदर्शन करते हुए पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मो. खान ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता शब्द यूरोप से पूरी दुनिया में फैला है। यूरोप में चर्च के हाथों में धर्मसत्ता समाई हुई थी। वहीँ पश्चिम जगत में प्रजातंत्र का आगाज होने के बाद बहुत सारे देशों में डेमोक्रेसी (प्रजातंत्र) आने लगी थी जिसके चलते धर्मसत्ता और प्रजातांत्रिक व्यवस्था में हुए संघर्ष के चलते सेक्युलॅरिज्म जैसे शब्दों की अवधारणा उत्पन्न हुई। भारत समेत पूरी दुनिया में प्रचलित धर्मनिरपेक्षता शब्द यूरोप के वैचारिक संघर्ष की ही देन है । आरिफ मो. खान ने कहा कि भारत को इस शब्द या उसकी अवधारणा की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारतीय सभ्यता में ही धर्मनिरपेक्षता अंतरनिहीत है।

धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को अधिक स्पष्ट करते हुए पूर्व केन्द्रीय मंत्री खान ने कहा कि हमारे देश में ‘टॉलरेन्स’ शब्द भी बहुत ज्यादा प्रचलित हो रहा है। बतौर स्वामी विवेकानंद ‘टॉलरेन्स’ शब्द से नकारात्मकता का अहसास होता है। हमारी इच्छा के विरुद्ध दूसरे व्यक्ति और विचार से तालमेल बैठाने के प्रयास को ‘टॉलरेन्स’ कहा जाता है। वहीँ प्राचीन भारतीय सभ्यता सभी भी यथावत स्थिति को स्वीकारती है। जॉर्डन और मोरक्को के राजपरिवार हजरत मोहम्मद पैगंबर के असली वारिस हैं। हजरत मोहम्मद पैगंबर के वारिस अपने नाम में सैय्यद लगाते हैं । भारत में भी हमें इस नाम के कई लोग मिल जाएंगे। इससे यह साफ हो जाता है कि कभी किसी समय हमारे देश ने आश्रय के लिए भारत पहुंचे हजरत मोहम्मद पैगंबर के वारिसों को अपनाया था। आरिफ मो. ने बताया कि हम सभी परमात्मा से जुदा हुई आत्मायें हैं,  ऐसी प्राचीन भारतीय अवधारणा है। इसके चलते भारतीय सभ्यता में लोग अपने अहंकार को छोड़ दूसरे व्यक्ति को सहज भाव से नमस्कार कहते हैं, इसलिए हमें विदेश से भारत पहुंची सेक्युलॅरिज्म जैसी अवधारणाओं की जरूरत नहीं है। 

तीन तलाक के कानून में सजा का प्रावधान होना सही 

भारत के संसद में पारित हुए ट्रिपल तलाक बिल पर विचार रखते हुए पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मो. खान ने ट्रिपल तलाक कानून में निहीत सजा के प्रावधान को उचित ठहराया । उन्होंने बहराइच में हुई घटना के हवाले से बताया कि ट्रिपल तलाक और हलाला जैसी परंपरायें महिलाओं के अधिकारों को नकारते हुए उनका अपमान करती हैं । आरिफ मो. ने कहा कि संसद में बने कानून और सुप्रीम  कोर्ट के आदेशों में सजा का प्रावधान नहीं होगा तो लोग उसका पालन करने से कतराएंगे । इसलिए तीन तलाक के कानून में रखा गया सजा का प्रावधान न्यायसंगत है और जरूरी भी है । 

हिंदुस्थान समाचार


 
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