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भाषा विज्ञान के विखण्डनकारी षड्यंत्रों से सावधान

13/06/2019

मनोज ज्वाला
भारत की विविधतामूलक एकात्मकता को विखण्डित करने पर आमदा पश्चिम की विस्तारवादी शक्तियों ने भाषाई छिद्रान्वेषण के सहारे विभेद पैदा करने के निमित्त 'भाषा-विज्ञान' के नाम से भी एक ऐसा बौद्धिक प्रपंच खड़ा कर रखा है, जो उनकी आवश्यकता व सुविधा के अनुसार हमारी पहचान गढ़ने का एक उपकरण बना हुआ है। जी हां, उतर भारतीय व दक्षिण भारतीय लोगों, वनवासी जनजातीय लोगों अथवा सवर्ण सुसंस्कृत संभ्रान्त भारतीयों की मूल पहचान सृजित करने, प्रायोजित इतिहास रचने और इस आधार पर सामाजिक दरार पैदा करने का माध्यम है पश्चिम का भाषा विज्ञान, जिसके विखण्डनकारी परिणाम हमारे देश में भाषा-विवाद के रुप में समय-समय पर देखने-सुनने को मिलते रहते हैं।
'भाषा विज्ञान' वैसे तो भारतीय चिन्तन-दर्शन का विषय रहा है। पश्चिमी जगत सोलहवीं शताब्दी तक इस विज्ञान से अनभिज्ञ ही था। जबकि, ईसा पूर्व से ही भारत में पाणिनी और मम्मट जैसे विद्वान क्रमशः 'अष्टाध्यायी' और 'काव्य-प्रकाश' जैसे ग्रन्थ लिखकर भाषा के विविध पहलुओं पर वैज्ञानिक विमर्श करते रहे थे। किन्तु, पश्चिम का विद्वत-चिन्तक समुदाय जब साम्राज्यवादी उपनिवेशवाद की पीठ पर सवार होकर भारत आया और संस्कृत भाषा से जब परिचित हुआ, तब उपनिवेशकों का हित साधने हेतु न केवल संस्कृत-साहित्य का शिक्षण-प्रशिक्षण व अनुवाद-कर्म शुरू किया, बल्कि यूरोपीय भाषाओं से उसका तुलनात्मक अध्ययन भी। उसी अध्ययन-विश्लेषण के दौर में भाषा-विज्ञान से भी उनका सामना हुआ। वे संस्कृत से अपनी भाषाओं की तुलना करते-करते 17वीं-18वीं शताब्दी में 'तुलनात्मक भाषा-विज्ञान' का टंट-घंट खड़ा कर प्रचार-माध्यमों के सहारे भारतीय भाषा-विज्ञान पर भी हावी हो गए। पश्चिम का भाषा-विज्ञान वास्तव में तुलनात्मक भाषा-विज्ञान है, जो साम्राज्यवादी औपनिवेशवाद के दृश्य प्रयोजनों से इतर, नस्लभेदी राजसत्ता और विस्तारवादी चर्च-मिशनरियों के अदृश्य उद्देश्यों के तहत काम करता रहा है।
सन् 1767 में एक फ्रांसीसी पादरी- कोर्डो ने संस्कृत के कुछ शब्दों की लैटिन-शब्दों से तुलना करते हुए भारत और यूरोप की (भारोपीय) भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया, जिससे इस वर्तमान यूरोपीय भाषा-विज्ञान का जन्म हुआ माना जाता है। उसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के कथित भाषाविद प्रोफेसर मोनियर विलियम जोंस ने 1784 में 'द एशियाटिक सोसायटी' नामक संस्था की नींव डालते हुए ईसाइयत के विस्तार में संस्कृत के महत्व को रेखांकित किया, क्योंकि संस्कृत साहित्य से ईसाइयत की पुष्टि कराकर ही उसे गैर-ईसाई देशों में ग्राह्य बनाया जा सकता था। जोन्स ने प्रतिपादित किया कि भाषिक संरचना की दृष्टि से संस्कृत भाषा ग्रीक एवं लैटिन की सजातीय है। सन् 1786 में इसने यह भी प्रतिपादित किया कि यूरोप की अधिकतर भाषाएं तथा भारत के बड़े हिस्से और शेष एशिया में बोली जाने वाली भाषाओं के उद्भव का मूल स्रोत ग्रीक व लैटिन है। जबकि, दक्षिण भारतीय लोगों की भाषा- तमिल व तेलुगू का संस्कृत से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस कारण वे लोग आर्य नहीं, द्रविड़ हैं। ऐसे तथाकथित भाषा-विज्ञान से ऐसे मनमाना निष्कर्ष निकाल कर आगे ईसाइयत के विस्तार सम्बन्धी योजना की भाषिक पृष्ठभूमि तैयार कर लेने के बाद उन भाषाविदों और इतिहासकारों ने भारतीय भाषा-संस्कृत और संस्कृति को अपना शिकार बनाना शुरू कर दिया। अपने तुलनात्मक भाषा-विज्ञान के हवाले से उन्होंने यह कहने-कहलवाने और प्रचारित करने का अभियान चला दिया कि संस्कृत 'ग्रीक से निकली हुई' और 'ब्राह्मणों की भाषा' है। उनके इस दुष्प्रचार का उद्देश्य आर्यों के यूरोपियन मूल के होने का दावा पुष्ट करना रहा है। इसी तरह तमिल को संस्कृत से अलग द्रविड़ों की भाषा बताने के पीछे उनकी मंशा भारत की सांस्कृतिक-सामाजिक एकता को खण्डित कर ईसाइयत का विस्तार करने की रही है। अपने इस दावा की पुष्टि के लिए उन्होंने एशियाटिक सोसाइटी, फोर्ट विलियम कॉलेज, ईस्ट इण्डिया कॉलेज, कॉलेज ऑफ फोर्ट सेन्ट जार्ज, रॉयल एशियाटिक सोसाइटी, बोडेन चेयर ऑफ ऑक्सफोर्ड, हेलिवेरी एण्ड इम्पीरियलिस्ट सर्विस कॉलेज और इण्डियन इंस्टीच्युट आफ आक्सफोर्ड नामक संस्थाओं को संस्कृत-साहित्य का सुनियोजित अनुवाद और तुलनात्मक विश्लेषण करने के काम में लगा दिया। इन संस्थाओं ने तुलनात्मक भाषा-विज्ञान में शोध-अनुसंधान के नाम पर संस्कृत-साहित्य के अध्ययन -विश्लेषण -अनुवाद- लेखन-प्रकाशन का काम किस योजना के तहत किया, यह इनमें से एक- 'बोडेन चेयर ऑफ ऑक्सफोर्ड' के संस्थापक कर्नल जोजेफ बोडेन की वसीयत से स्पष्ट हो जाता है। वसीयत में उसने लिखा है कि 'इस चेयर की स्थापना हेतु मेरे उदार अनुदान का लक्ष्य है - संस्कृत-ग्रन्थों के अनुवाद को प्रोत्साहन देना, ताकि मेरे देशवासी भारतीयों को ईसाइयत में परिवर्तित करने की दिशा में आगे बढ़ने के योग्य बन जाएं।' इसी तरह 'इण्डियन इंस्टीच्युट ऑफ ऑक्सफोर्ड' के संस्थापक मॉनियर विलियम्स ने लिखा है- 'जब ब्राह्मणवाद के सशक्त किले की दीवारों (अर्थात, संस्कृत साहित्य) को घेर लिया जाएगा, दुर्बल कर दिया जाएगा और सलीब के सिपाहियों द्वारा अन्ततः धावा बोल दिया जाएगा; तब ईसाइयत की विजय-पताका अवश्य ही लहरायेगी और यह अभियान तेज हो जाएगा।'
 पश्चिमी भाषा-विज्ञानियों और औपनिवेशिक शासकों-प्रशासकों ने ईसाइयत के प्रसार-विस्तार हेतु भारतीय समाज को विखण्डित करने के लिए किस तरह से भाषाई षड्यंत्र को अंजाम दिया यह मद्रास-स्थित कॉलेज ऑफ फोर्ट सेन्ट जॉर्ज के एक भाषाविद डी. कैम्पबेल और मद्रास के तत्कालीन कलेक्टर फ्रांसिस वाइट एलिस की सन-1816 में प्रकाशित पुस्तक- 'ग्रामर ऑफ द तेलुगू लैंग्वेज' की सामग्री से स्पष्ट हो जाता है। उसमें लेखक-द्वय ने दावा किया है कि 'दक्षिण भारतीय भाषा-परिवार का उद्भव संस्कृत से नहीं हुआ है।'  उन्होंने यह दलील दी है कि 'तमिल और तेलुगू के एक ही गैर-संस्कृत पूर्वज हैं।' आप समझ सकते हैं कि उन दोनों महाशयों को तेलुगू भाषा का व्याकरण लिखने और उसके उद्भव का स्रोत खोजने की जरूरत क्यों पड़ गई। जाहिर है, दक्षिण भारतीय लोगों को उतर भारतीयों से अलग करने के लिए।
मालूम हो कि ईसावादियों द्वारा भाषा-विज्ञान के हवाले से ऐसे-ऐसे तथ्य गढ़-गढ़कर स्कूली पाठ्य-पुस्तकों में कीलों की तरह ठोके जाते रहे हैं, जिनसे संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषायें ही नहीं, बल्कि भारत की सहस्त्राब्दियों पुरानी विविधतामूलक सांस्कृतिक-सामाजिक समरसता व राष्ट्रीय एकता भी सलीब पर लटकती जा रही है। स्काटलैण्ड के एक तथाकथित भाषाविद डुगाल्ड स्टुवार्ट ने इसी भाषा विज्ञान के कतिपय छद्म सिद्धान्तों के आधार पर यह प्रतिपादित किया है कि 'संस्कृत ईसा के बाद सिकन्दर के आक्रमण द्वारा ग्रीक से आई हुई भाषा है। संस्कृत के ग्रीक से मिलते-जुलते होने का कारण यह नहीं है कि दोनों के स्रोत पूर्वज एक ही हैं। इसका कारण यह है कि संस्कृत भारतीय परिधान में ग्रीक ही है'। जबकि, सच्चाई इसके ठीक उलट है। ग्रीक ही संस्कृत से उपजी हुई भाषा है।
स्पष्ट है कि पश्चिम के इस तुलनात्मक भाषा-विज्ञान के ऐसे-ऐसे अनर्थकारी प्रतिपादनों से भारतीय राष्ट्रीय एकता-अस्मिता और सांस्कृतिक-सामाजिक समरसता को गम्भीर खतरा है, जिनसे सावधान रहने की जरूरत है।
(लेखक साहित्यकार हैं।) 


 
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