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तालिबान क्यों चाहेगा शांति ?

09/10/2019

तालिबान क्यों चाहेगा शांति ?


बनवारी

मेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अंतत: तालिबान से शांति समझौते की निरर्थकता स्वीकार करते हुए पिछले लगभग वर्ष भर से चल रही शांति वार्ता को रद्द कर दिया है। शांति वार्ता रद्द किए जाने से ठीक पहले तक यह कहा जा रहा था कि दोनों पक्ष शांति समझौते की शर्तों पर सहमत हो गए हैं। इस समझौते को लेकर स्वयं अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में एक राय नहीं थी। कुछ दिन पहले अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पम्पियो ने शांति समझौते के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था। अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में अनेक लोगों का यह मानना था कि यह समझौता काफी जल्दबाजी में किया जा रहा है। अधिकांश लोगों को तालिबान की नीयत पर विश्वास नहीं था। इसलिए जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 8 सितंबर को शांति वार्ता रद्द किए जाने की घोषणा की तो इससे अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान और रणनीतिक बिरादरी में काफी राहत अनुभव की गई। उसका अफगानिस्तान की सरकार और आम लोगों ने भी स्वागत किया है। इसी तरह अफगानिस्तान से सटे हुए मध्य एशिया के देशों में भी इस घोषणा पर काफी राहत महसूस की जा रही है।

इस शांति वार्ता को लेकर अमेरिका के रणनीतिक क्षेत्रों में शुरू से अविश्वास रहा है। अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना है कि तालिबान एक आतंकवादी समूह है और वह हिंसा को एक राजनैतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करता है। उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह अमेरिका से शांति समझौता करने के बाद अपनी हिंसक गतिविधियां छोड़ देगा और अफगानिस्तान पर पूर्ण नियंत्रण के लिए व्यापक हिंसा का इस्तेमाल नहीं करेगा।

अमेरिका और तालिबान के बीच यह समझौता हो गया होता तो वह नए सिरे से अफगानिस्तान को अस्थिरता के हवाले कर देता। राष्ट्रपति ट्रम्प की इस घोषणा से भारत में विशेष राहत अनुभव की गई है क्योंकि तालिबान के मजबूत होने से उन सभी आतंकवादी शक्तियों को बल मिला होता, जिनका इस्तेमाल करके पाकिस्तान भारत पर दबाव बनाता रहा है। राष्ट्रपति ट्रम्प की इस घोषणा से सबसे अधिक निराशा पाकिस्तान को ही हुई है। वह अपने रणनीतिक उद्देश्य पाने के लिए तालिबान का उपयोग कर रहा था। उसे आशा थी कि वह तालिबान के सहारे अफगानिस्तान पर अपना नियंत्रण बनाने में सफल हो जाएगा और इस क्षेत्र में भारत को अलग-थलग कर सकेगा। इसके साथ ही वह जेहादी शक्तियों का और भी असरदार तरीके से भारत के खिलाफ उपयोग करने की आशा रखता था। अब उसका यह सब दिवास्वप्न चूर-चूर हो गया है। अमेरिका में तालिबान पर विश्वास करने वाले कम ही लोग है। आरंभ में तालिबान को शक्तिशाली बनाने में अमेरिका की भी भूमिका रही है।

अफगानिस्तान पर 1978 के बाद लगभग एक दशक तक सोवियत रूस का प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण रहा था। सोवियत रूस को अफगानिस्तान से खदेड़ने के लिए सऊदी अरब के पैसे, अमेरिकी हथियार और पाकिस्तानी रणनीति के द्वारा पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ रहे छात्रों को सैनिक प्रशिक्षण देकर तालिबान के रूप में खड़ा कर दिया गया था। 1996 में तालिबान का अफगानिस्तान पर कब्जा हो गया। उसके बाद अफगानिस्तान अलकायदा की शरणस्थली बना। 2001 में हुए आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका को समझ में आया कि इस्लामी कट्टरपंथी शक्तियों को बढ़ावा देकर उसने अपनी सुरक्षा भी खतरे में डाल दी है। उस हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में एक अंतरराष्ट्रीय सेना तैयार हुई, जिसमें मुख्य भूमिका अमेरिका की ही थी। तालिबान को सत्ताच्युत करने के लिए अमेरिका ने अपने लगभग एक लाख सैनिक भेजे। तालिबान शासन को ध्वस्त करने के बाद अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ओसामा बिन लादेन का पता लगाना और उसे समाप्त करना था। अलकायदा के खिलाफ अमेरिकी मुहिम में उसका सहयोगी होने के बाद पाकिस्तान दोहरा खेल खेलता रहा।

अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव जीतने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषित किया कि वे अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया तेज करेंगे। इस अमेरिकी नीति से तालिबान को बल मिला। उन्हें लगा कि जिस तरह 1989 में वे अफगानिस्तान से सोवियत सैनिकों को खदेड़ने में सफल रहे थे, उसी तरह अमेरिकी सैनिकों की विदाई का भी दबाव बना सकते हैं।

वह ओसामा बिन लादेन को अपने यहां छिपाए रहा। मई 2011 में अमेरिका को ओसामा बिन लादेन का पता लगाने और उसकी हत्या करने में सफलता मिल गई। उसके बाद उसकी इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाए रखने में दिलचस्पी समाप्त हो गई। बराक ओबामा ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का सिलसिला शुरू किया। 2014 तक अमेरिका के अफगानिस्तान में लगभग 16 हजार सैनिक बचे थे। ओसामा बिन लादेन को अपने यहां छिपाए रहने के कारण पाकिस्तान अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान और अमेरिकी नागरिकों की दृष्टि में खलनायक बन चुका था। उसके बाद अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंध निरंतर बिगड़ते रहे। अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव जीतने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषित किया कि वे अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया तेज करेंगे। इस अमेरिकी नीति से तालिबान को बल मिला। उन्हें लगा कि जिस तरह 1989 में वे अफगानिस्तान से सोवियत सैनिकों को खदेड़ने में सफल रहे थे, उसी तरह अमेरिकी सैनिकों की विदाई का भी दबाव बना सकते हैं। उसके बाद उन्होंने अपनी हिंसक गतिविधियां बढ़ा दीं।

नाटो सेनाओं का संबल लेकर अफगानिस्तान में जो राजनीतिक-प्रशासन तंत्र खड़ा हुआ था, उस पर निरंतर हमले होने लगे। इस रणनीति को कार्यरूप देने में मुख्य भूमिका पाकिस्तानी सेना और उसके खुफिया तंत्र की थी। पाकिस्तान में यह विश्वास बना रहा है कि अमेरिकी नेताओं को बेवकूफ बनाया जा सकता है। इसलिए वे निरंतर दोहरा खेल खेलते रहे। वे अमेरिकियों से आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में शामिल होने के लिए पैसा भी लेते रहे और गुप्त रूप से आतंकवादियों की मदद भी करते रहे। बढ़ती हुई तालिबानी हिंसा ने अफगानिस्तान से शेष बचे अमेरिकी सैनिकों की वापसी कठिन बना दी थी। लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे अपनी प्राथमिकता बना रखा था। इसी का फायदा उठाकर लगभग एक वर्ष पहले पाकिस्तान अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान को यह समझाने में सफल हो गया कि सभी तालिबानी नेता एक जैसे नहीं है। तालिबानी नेताओं का एक बड़ा वर्ग अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता देखना चाहता है। उनसे शांति वार्ता चलाई जा सकती है। आरंभिक हिचक के बाद डोनाल्ड ट्रम्प इसके लिए तैयार हो गए। दोनों पक्षों के बीच दोहा में शांति वार्ता शुरू हुई। इस बीच रूस ने भी तालिबान से बातचीत की शुरुआत की। लेकिन तालिबान का प्रमुख उद्देश्य अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी है, इसलिए वे अमेरिका से शांति वार्ता के लिए ही अधिक गंभीर हो सकते थे। इस शांति वार्ता के समय अमेरिका दो उद्देश्यों सामने रखकर वार्ता कर रहा था। उसकी मुख्य चिंता तो यही थी कि अमेरिकी सैनिकों की विदाई के बाद इस क्षेत्र का फिर से अलकायदा जैसा कोई संगठन इस्तेमाल न कर सके। वह तालिबान से यह आश्वासन चाहता था कि वह अपने प्रभाव के क्षेत्रों में इस्लामी आतंकवाद की उन विदेशी शक्तियों को पैर नहीं जमाने देगा, जो अमेरिका को अपना निशाना बनाती हैं। ऐसा आश्वासन देने में तालिबान को कोई समस्या नहीं थी।

तालिबान शासन के दौरान ओसामा बिन लादेन को अफगानिस्तान में शरण अवश्य दी गई थी, लेकिन तालिबान अफगानिस्तान में विदेशी आतंकवादियों की भूमिका के खिलाफ रहे हैं। अमेरिका की दूसरी मांग यह थी कि तालिबान अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता स्थापित करने में सहयोग करे। इसमें तालिबान को कोई दिलचस्पी नहीं थी। तालिबान का उद्देश्य जल्दी से जल्दी पूरे अफगानिस्तान पर नियंत्रण करना रहा है। इसमें वे पहली बाधा अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति मानते हैं और दूसरी अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार को। उन्होंने अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार से बात करने से मना कर दिया। इस शांति वार्ता के दौरान वे एक ही उद्देश्य को सामने रखकर चल रहे थे कि जल्दी से जल्दी अमेरिकी सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी को सुनिश्चित कर सकें। इसलिए उन्होंने शांति वार्ता के दौरान निरंतर इस बात पर जोर दिया कि वे अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद ही अफगानिस्तान सरकार से कोई बात करेंगे। अमेरिका ने शुरू में यह मांग भी रखी कि शांति वार्ता के दौरान वे अपनी हिंसक गतिविधियां रोक दें। लेकिन तालिबान इसके लिए कभी तैयार नहीं हुए। बल्कि उन्होंने अपनी हिंसक वारदातों को अमेरिका पर जल्दी समझौते का दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया। इस शांति वार्ता को लेकर अमेरिका के रणनीतिक क्षेत्रों में शुरू से अविश्वास रहा है।

भारत शुरू से ही तालिबान के साथ इस अमेरिकी शांति वार्ता का विरोधी रहा है। भारत ने अमेरिका को यह समझाने का निरंतर प्रयत्न किया कि तालिबान एक जेहादी संगठन है। उसका एकमात्र लक्ष्य अफगानिस्तान में शरिया शासन की स्थापना है। उसने 1996-2001 के अपने शासनकाल में जिस तरह का दमनकारी तंत्र खड़ा किया था, वैसा ही वह अब भी करेगा।

अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना है कि तालिबान एक आतंकवादी समूह है और वह हिंसा को एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल करता है। उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह अमेरिका से शांति समझौता करने के बाद अपनी हिंसक गतिविधियां छोड़ देगा और अफगानिस्तान पर पूर्ण नियंत्रण के लिए व्यापक हिंसा का इस्तेमाल नहीं करेगा। उनका यह भी मानना है कि एक इस्लामी कट्टरपंथी संगठन होने के नाते तालिबानी अमेरिकी विरोध को अपनी केंद्रीय नीति बनाए रखेंगे। इस मानसिकता के चलते तालिबान उन शक्तियों को बढ़ावा देता रहेगा, जो अमेरिका का अहित करना चाहती हैं। इन सब अमेरिकी शंकाओं पर विराम लगाने के लिए पाकिस्तान की पहल पर चीन और रूस ने तालिबान की ओर से यह गारंटी देने की कोशिश की कि ऐसा नहीं होगा। लेकिन इससे अमेरिका के रणनीतिक क्षेत्रों में यही निष्कर्ष निकाला गया कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की विदाई में पाकिस्तान, चीन और रूस सभी के निहित स्वार्थ हैं। यह सभी चाहते हैं कि अमेरिका इस क्षेत्र से चला जाए और वे इस शून्य को भर सकें। इन रणनीतिक क्षेत्रों के अलावा अमेरिकी सेना को भी इस शांति वार्ता से आपत्ति रही है।

अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों की वापसी के पक्ष में नहीं रही है। उसका मानना है कि इसे अफगानिस्तान की लड़ाई में अमेरिका की पराजय के रूप में देखा जाएगा। उससे अमेरिका विरोधी इस्लामी शक्तियों का हौंसला बढ़ेगा और इससे अमेरिकी सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा। मुख्यत: अमेरिकी सेना के आग्रह पर ही 2016 में यह निर्णय हुआ था कि अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों की वापसी नहीं होगी। अफगानिस्तान में अमेरिका के कम से कम 8,400 सैनिक तब तक बने रहेंगे, जब तक अफगानिस्तान की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती। भारत शुरू से ही तालिबान के साथ इस अमेरिकी शांति वार्ता का विरोधी रहा है। भारत ने अमेरिका को यह समझाने का निरंतर प्रयत्न किया कि तालिबान एक जेहादी संगठन है। उसका एकमात्र लक्ष्य अफगानिस्तान में शरिया शासन की स्थापना है। उसने 1996-2001 के अपने शासनकाल में जिस तरह का दमनकारी तंत्र खड़ा किया था, वैसा ही वह अब भी करेगा। सभी तालिबान एक ही तरह के जेहादी है और उनमें अच्छे तालिबानी या बुरे तालिबानी जैसे भेद करना नासमझी है।

तालिबान अफगानिस्तान पर पूर्ण नियंत्रण चाहता है और उसके लिए वह निरंतर बर्बर हिंसा का इस्तेमाल करेगा। अफगानिस्तान में स्थायी शांति का एक ही उपाय है कि उसे आर्थिक और सामरिक रूप से मजबूत बनाते हुए एक आधुनिक, लोकतांत्रिक और विश्वसनीय राज्य के रूप में विकसित किया जाए। भारत अफगानिस्तान के इसी तरह के विकास में एक सकारात्मक भूमिका निभाता रहा है। यही कारण है कि आम अफगानों के बीच भारत काफी लोकप्रिय है। भारत की सकारात्मक भूमिका को स्वीकार करने के बावजूद पाकिस्तान के आग्रह पर भारत को तालिबान के साथ चली शांति वार्ता से अलग-थलग रखा गया। भारत को भी यह सुझाव दिया जाता रहा है कि वह तालिबान से बातचीत की कोई खिड़की खुली रखे। लेकिन अब तक भारत तालिबान से किसी तरह की बातचीत के लिए तैयार नहीं हुआ।

भारत अपने कूटनीतिक तंत्र का इस्तेमाल करके अमेरिका को निरंतर यह समझाता रहा कि वह तालिबान और पाकिस्तान दोनों पर भरोसा करके गलती कर रहा है। पाकिस्तान आज भी अपना पुराना खेल ही खेल रहा है। वह तालिबान को शह देते हुए अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार को कमजोर करने में लगा हुआ है। उसकी दिलचस्पी अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने में नहीं, उस पर नियंत्रण में ही है। अफगानिस्तान सरकार भी अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान को यह समझाने में लगी रही है कि इस पूरे क्षेत्र को अस्थिर बनाए रखने में सबसे बड़ी भूमिका पाकिस्तान की है। पाकिस्तान बिल्कुल नहीं चाहता कि अफगानिस्तान का एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में उदय हो। उसे सबसे बड़ा खतरा यह लगता है कि अफगानिस्तान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरने का मौका मिला तो वह भारत के प्रभाव में आ सकता है। इसलिए पाकिस्तान निरंतर तालिबान की पीठ ठोकता रहता है और उसे इस पूरे क्षेत्र को अस्थिर करने में लगाए रखता है।

अफगानिस्तान सरकार की इस वास्तविक चिंता को अब तक अमेरिकी वार्ताकार बहुत महत्व नहीं दे रहे थे। इस क्षेत्र की जटिलताओं का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था। उन्होंने शांति वार्ता के दौरान केवल एक ही लक्ष्य सामने रखा था कि तालिबान अपने प्रभाव के क्षेत्रों का इस्तेमाल अमेरिका विरोधी शक्तियों को न करने देने का वचन दे। दूसरी तरफ अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान की मुख्य चिंता यह थी कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की विदाई के बाद वहां क्या परिस्थितियां बनेंगी और कहीं यह क्षेत्र एक नई अराजकता का शिकार तो नहीं हो जाएगा? अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता को लेकर यह सभी चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही थीं और अमेरिकी राष्ट्रपति पर जल्दबाजी में कोई समझौता न करने के लिए दबाव डाला जा रहा था। लेकिन वे समझौता करने की इतनी जल्दी में थे कि उन्होंने 2001 में हुए आतंकवादी हमले की 11 सितंबर को होने वाली बरसी की चिंता किए बिना 8 सितंबर को कैम्प डेविड में तालिबान नेताओं को आमने-सामने की बातचीत के लिए आमंत्रित कर लिया।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी को अलग से आमंत्रित किया गया। शायद इसी बात को लेकर तालिबान ने कैम्प डेविड की वार्ता में शामिल होने में आनाकानी की। इसे भांपकर डोनाल्ड ट्रम्प ने पांच सितम्बर को काबुल की तालिबानी हिंसा में एक अमेरिकी सैनिक और 11 अन्य लोगों के मारे जाने को बहाना बनाकर शांति वार्ता रद्द कर दी। अफगानिस्तान की परिस्थितियों की सामान्य जानकारी रखने वाले किसी व्यक्ति को भी यह समझने में देर नहीं लगेगी कि तालिबान के साथ समझौता करके अमेरिका न अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, न अफगानिस्तान में शांति स्थापित करवा सकता है। अमेरिकी दुविधा का लाभ उठाकर पिछले कुछ वर्षों में तालिबान की शक्ति भी बढ़ी है और प्रभाव भी। पर यह दावा अतिरंजित है कि उसका अफगानिस्तान के लगभग आधे हिस्से पर नियंत्रण है। अभी भी अफगानिस्तान में मुख्य शक्ति वहां की चुनी हुई सरकार ही है। आगामी 28 सितम्बर को वहां राष्ट्रपति के चुनाव होने हैं। आशा की जा रही है कि अशरफ गनी फिर चुनाव जीत जाएंगे। अफगानिस्तान के पास तीन लाख की सेना है।

अफगानिस्तान की भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं और छापामार लड़ाई तथा आत्मघाती दस्तों के बल पर तालिबानी अपना भय पैदा करने में सफल हो जाते हैं। उनके लड़ाकों की संख्या बढ़कर 60 हजार हो गई है। लेकिन आम अफगानों के बीच वे लोकप्रिय नहीं हैं। उनकी निरंतर हिंसा उन्हें खलनायक बना चुकी है। तालिबानी मुख्यत: पश्तून कबीले के हैं, जिनकी आबादी 42 प्रतिशत है। अन्य कबीलाई उन पर विश्वास नहीं करते। 1996 से 2001 के बीच भी उनका अफगानिस्तान के केवल तीन चौथाई भाग पर ही नियंत्रण हो पाया था। अफगानिस्तान के अधिकांश लोग पश्तो की जगह दारी भाषा का व्यवहार करते हैं। इसलिए भी उनसे तालिबान की दूरी बनी रहती है। तालिबानी अफगानिस्तान को अस्थिर तो बनाए रख सकते हैं, उसे स्थिरता प्रदान नहीं कर सकते। अमेरिका को उन्हें निर्मूल करने पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्हें इस्लामिक स्टेट की तरह की ही चुनौती माना जाना चाहिए। ट्रम्प का यह तर्क सही नहीं है कि तालिबान इस क्षेत्र की अन्य शक्तियों की चिंता है, अमेरिका की नहीं। 2001 का अमेरिका पर हुआ आतंकवादी हमला अफगानिस्तान में पाले-पोसे जा रहे आतंकवादी तंत्र ने ही किया था। इस्लामी आतंकवाद का मुख्य निशाना अमेरिका ही रहता है इसलिए उसे निर्मूल करने में अमेरिका को ही अग्रणी भूमिका निभानी होगी।


 
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