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प्रकृति की मूक भाषा को समझें

04/08/2019

योगेश कुमार गोयल
धुनिकीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते विश्वभर में प्रकृति के साथ बड़े पैमाने पर जो खिलवाड़ हो रहा है, उसके मद्देनजर आमजन को पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक करने की जरूरत अब कई गुना बढ़ गई है। कितना अच्छा हो, अगर हम सब प्रकृति संरक्षण में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाने का संकल्प लेते हुए अपने-अपने स्तर पर ईमानदारी से अमल करें। दरअसल, आज प्रदूषित हो रहे पर्यावरण के जो भयावह खतरे हमारे सामने आ रहे हैं, उनसे शायद ही कोई अनभिज्ञ हो। हमें यह स्वीकार करने में गुरेज नहीं करना चाहिए कि इस तरह की समस्याओं के लिए कहीं न कहीं जिम्मेदार हम स्वयं भी हैं। पेड़-पौधों की अनेक प्रजातियों के अलावा बिगड़ते पर्यावरणीय संतुलन और मौसम चक्र में आते बदलाव के कारण जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हमें यह भलीभांति जान लेना चाहिए कि इन प्रजातियों के लुप्त होने का सीधा असर मानव सभ्यता पर पड़ना अवश्यंभावी है।
प्रकृति के तीन प्रमुख तत्व हैं जल, जंगल और जमीन। इनके बगैर प्रकृति अधूरी है। यह विडम्बना ही है कि प्रकृति के इन तीनों ही तत्वों का इस कदर दोहन किया जा रहा है कि इसका संतुलन डगमगाने लगा है। नतीजतन भयावह प्राकृतिक आपदाएं आने लगी हैं। प्राकृतिक साधनों के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ही नतीजा है कि पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने के कारण मनुष्यों के स्वास्थ्य पर तो प्रतिकूल प्रभाव पड़ ही रहा है, जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियां भी लुप्त हो रही हैं। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए जल, जंगल, वन्य जीव और वनस्पति, इन सभी का संरक्षण अत्यावश्यक है। दुनियाभर में गहराते जल संकट की बात हो या ग्लोबल वार्मिंग के चलते धरती के तपने की अथवा धरती से एक-एक कर वनस्पतियों या जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियों के लुप्त होने की इस तरह की समस्याओं के लिए केवल सरकारों का मुंह ताकते रहने से कुछ हासिल नहीं होगा। प्रकृति संरक्षण के लिए हम सभी को अपने-अपने स्तर पर अपना योगदान देना होगा। पर्यावरण का संतुलन डगमगाने के चलते लोग अब तरह-तरह की बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं। उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। उनकी कार्यक्षमता इससे प्रभावित हो रही है। कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का संक्रमण, न्यूमोनिया, लकवा इत्यादि के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा इन बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है। हमारे पर्वतीय स्थान जो कुछ सालों पहले तक शांत और स्वच्छ हवा के लिए जाने जाते थे, आज वहां प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। ठंडे इलाकों के रूप में विख्यात पहाड़ भी अब तपने लगने हैं। वहां भी जल संकट गहराने लगा है। इसका एक बड़ा कारण पहाड़ों में भी विकास के नाम पर जंगलों का सफाया करने के साथ-साथ पहाड़ों में बढ़ती पर्यटकों की भारी भीड़ है। कुछ ही दिन पहले शिमला, मसूरी जैसे पर्वतीय इलाकों में कई किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम देखा गया था। ठंडे माने जाते रहे पहाड़ी इलाकों में हम लोग कभी पंखों तक की भी कल्पना नहीं करते थे लेकिन आज वहां भी धड़ल्ले से एसी का इस्तेमाल हो रहा है।
प्राकृतिक आपदा सामने आने पर हम आदतन प्रकृति को कोसना शुरू कर देते हैं। लेकिन हम समझना नहीं चाहते कि प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाकर हमें सचेत करने का प्रयास करती रही है कि अगर हम अभी भी नहीं संभले और प्रकृति से साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया तो हमें आने वाले समय में इसके खतरनाक परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। प्रकृति हमारी मां के समान है। वह हमें अपने प्राकृतिक खजाने से ढेरों बहुमूल्य चीजें प्रदान करती है। लेकिन अपने स्वार्थों के चलते हम खुद को ही प्रकृति का स्वामी समझने की भूल कर बैठते हैं। हम इतने साधनपरस्त और आलसी हो चुके हैं कि अगर हमें अपने घर के आसपास के 100-200 मीटर के दायरे से भी घर के लिए कोई सामान लाना पड़े तो पैदल चलना हमें गंवारा नहीं। छोटी-सी दूरी के लिए भी हम स्कूटर या बाइक का सहारा लेते हैं। पैदल चलना तो जैसे हम भूलते ही जा रहे हैं। हम सोचते ही नहीं कि छोटे-मोटे कार्यों के लिए निजी यातायात के साधनों का उपयोग कर हम पेट्रोल, डीजल जैसे धरती पर ईंधन के सीमित स्रोतों को तो नष्ट कर ही रहे हैं, पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं।
हमारे क्रियाकलापों के चलते ही वायुमंडल में कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन और पार्टिक्यूलेट मैटर के प्रदूषण का मिश्रण इतना बढ़ गया है कि हमें वातावरण में इन्हीं प्रदूषित तत्वों की मौजूदगी के कारण सांस की बीमारियों के साथ-साथ कैंसर जैसी कई और असाध्य बीमारियां जकड़ने लगी हैं। पेट्रोल-डीजल से पैदा होने वाले धुएं ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड और ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए जरूरत है कि हम अपने-अपने स्तर पर पौधारोपण में दिलचस्पी लें। अगर हम वाकई चाहते हैं कि हम और हमारी आने वाली पीढ़ियां साफ-सुथरे वातावरण में बीमारी मुक्त जीवन जिए तो हमें पेड़-पौधों को बचाना ही होगा। सिर्फ सरकार के भरोसे बैठे रहने से ही काम नहीं चलेगा। सरकार और अदालतों द्वारा पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनती पॉलीथिन पर पाबंदी लगाने के लिए समय-समय पर कदम उठाए गए, लेकिन हम बड़ी सहजता से पॉलीथिन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को नजरअंदाज कर देते हैं। गहराते जल संकट के लिए भी हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हमने जमकर पानी की बर्बादी की है। उसे संरक्षित करने का कोई उपाय नहीं किया। हमें वर्षा के जल को संरक्षण करने का उपाय करना चाहिए। अपनी छोटी-छोटी पहल से हम मिलकर प्रकृति संरक्षण के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। 
स्वच्छ और बेहतर पर्यावरण के लिए जरूरी है कि हम प्रकृति की मूक भाषा को समझें और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अपना-अपना योगदान दें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 


 
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