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आर्थिक संकट एक सच्चाई

02/07/2019

आर्थिक संकट एक सच्चाई


अभूतपूर्व विजय के बाद अब नरेन्द्र मोदी की सरकार के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। इनका मुकाबला करके और उन पर विजय पाकर ही प्रधान मंत्री भारत को दुनिया की तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बनाने के अपने विजन को लागू कर सकेंगे। पिछले कुछ समय से आर्थिक संकट की आहट सुनाई देने लगी थी लेकिन अब यह सच्चाई में तब्दील हो गई है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने सबसे बड़ी चुनौती गिरती हुई जीडीपी दर को फिर से पटरी पर लाने की है और इसके लिए उन्हें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तथा कृषि को पुरजर बढ़ावा देना होगा। पहली बार पांच वर्षों में जीडीपी की दर गिरकर 6 प्रतिशत से नीचे चली गई है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक जनवरी से मार्च तक जीडीपी की दर गिरकर 5.8 प्रतिशत हो गई है। चौथी तिमाही के इस गिरावट का असर यह पड़ा कि पूरे साल की विकास दर फिसल कर 7 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत हो गई। 5.8 प्रतिशत की विकास दर पिछले 17 तिमाहियों की विकास दर में सबसे कम है। यह पिछले दो वर्षों में पहली बार चीन की विकास दर से भी नीचे है।

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछली सरकार में काफी कुछ कर दिखाया था और इस बार भी उनसे बहुत सी अपेक्षाएं हैं। हमारी अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां बड़ी तो हैं लेकिन दृढ़ निश्चय और दूरदर्शिता से उनका मुकाबला किया जा सकता है।

यह चिंताजनक इसलिए है कि मोदी सरकार का सपना है कि भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बने। इस वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में विभिन्न क्षेत्र के औद्योगिक उत्पादन में गिरावट और सरकारी खर्च में कटौती के कारण विकास दर को झटका लगने की आशंका पहले से ही थी, लेकिन विकास दर के 6 प्रतिशत से भी नीचे गिरने की उम्मीद किसी को नहीं थी। जीडीपी दर में गिरावट की मुख्य वजÞह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में गिरावट, सरकारी खर्च में कटौती और प्राइवेट बैंकों का धीमा कारोबार रहा। खनन क्षेत्र में भी गिरावट आई और कृषि में भी कोई उल्लेखनीय बÞढ़ोतरी नहीं हुई। इन सभी का मिला-जुला परिणाम यह रहा कि जीडीपी की दर फिसल गई और अब मोदी सरकार-2 के लिए यह चिंता का सबब हो गया है। अब तक भारत के जीडीपी के विकास की दर चीन से आगे रही थी लेकिन अब वह हमें पछाड़ कर आगे हो गया है। मैन्युफैक्चरिंग में गिरावट का असर रोजगार पर भी पड़ा है। इससे रोजगार बढ़ाने के अवसर कम हो गए हैं। श्रम सर्वेक्षणों के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017- 18 में देश में बेरोजगारी दर भी 6.1% पर रही है।

बताया जा रहा है कि 1972-73 के बाद बेरोजगारी का आंकड़ा इस स्तर पर पहुंचा है। अखिल भारतीय स्तर पर पर पुरुषों की बेरोजगारी दर 6.2 प्रतिशत जबकि महिलाओं के मामले में 5.7 प्रतिशत रही। शहरों में पुरुषों की बेरोजगारी दर ग्रामीण इलाके की 5.8 प्रतिशत की तुलना में 7.1 फीसदी है। इसी प्रकार शहरों में महिलाओं की बेरोजगारी दर 10.8 प्रतिशत पर है जो कि ग्रामीण इलाकों में 3.8 फीसदी रही है। ये आंकड़े वास्तव में चिंताजनक हैं और रोजगार बढ़ाने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं। रोजगार बढ़ने से लोगों के पास पैसा आएगा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा मिलेगा। रोजगार में कमी और बढ़ती बेरोजगारी देश के राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव ला सकती है। इस सरकार पर देश के नौजवानों ने बहुत ही भरोसा जताया है और सरकार का फर्ज है कि वह इस दिशा में तुरंत ही प्रभावी कदम उठाए। भारतीय अर्थव्यवस्था खपत आधारित है और वह चीन-कोरिया जैसे निर्यातोन्मुख देशों से बिलकुल अलग है।

खपत जितनी बढ़ेगी, उतना ही उत्पादन बढ़ेगा और रोजगार भी उतना ही बढ़ेगा। देश में खपत बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि सरकार बाजÞार में धन का प्रवाह सुनिश्चित करे। इसके लिए वह बड़े पैमाने पर योजनाओं पर अपना खर्च बढ़ाए और बकाया भुगतान भी तीव्रता से करे। इस समय सरकारी भुगतान की गति धीमी है जिससे अर्थव्यवस्था में वांछित तेजी नहीं आ पा रही है। दूसरी ओर देश में प्राइवेट कंपनियां निवेश से कतरा ही नहीं रही हैं, बल्कि धन खर्च करने या रोजगार बढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं रही हैं। यह ठहराव अनेक कारणों से है और सरकार को उन्हें प्रोत्साहित करना होगा। जीएसटी का सरलीकरण और आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराना जरूरी होगा। जीएसटी को लागू करना मोदी सरकार-1 की बहुत बड़ी उपलब्धि रही है। यह आजद भारत का सबसे बड़ा टैक्स सुधार है जिसकी सारी दुनिया में सराहना हो रही है। हमारा आयात निर्यात की तुलना में कहीं ज्यादा है जिससे राजस्व घाटा बढ़ रहा है। अप्रैल महीने में हमारा व्यापार घाटा 35.33 अरब डॉलर का था।

इस समय 30 महत्वपूर्ण वस्तुओं के निर्यात में 17 में गिरावट दिखाई दे रही है। इनमें कुछ तो ऐसे हैं जिनमें मानवीय श्रम का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है। एक्सपोर्ट सेक्टर देश में बड़े पैमाने पर रोजगार देता है। अब इसमें और भी परेशानी खड़ी हो सकती है क्योंकि अमेरिका ने भारत से होने वाले 6.3 अरब डॉलर के आयात पर जीपीएस वापस ले लिया है,जिससे अमेरिका को हमारा निर्यात घट जाने का खतरा बढ़ रहा है। चीन-अमेरिका ट्रेड वार का असर भारत पर पड़ना भी लाजिमी है, जिससे हमारा निर्यात भी प्रभावित होगा। दूसरी ओर कच्चे तेल और सोने का आयात भी बढ़ता जा रहा है जिसका सीधा असर हमारे व्यापार संतुलन पर पड़ता जा रहा है। उधर ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण हमें ज्यादा कीमतों पर दूसरे देशों से महंगा तेल खरीदना पड़ेगा। अब मोदी सरकार-2 की निर्यात नीति कैसी होगी या उसका उस पर कितना जÞोर होगा, यह बहुत बड़ी चुनौती होगी। निर्यात बढ़ाने के लिए मोदी सरकार-2 को ठोस नीतियां बनानी ही नहीं, लागू भी करनी होंगी। चीन का उदाहरण हमारे सामने है जिसने योजनाबद्ध तरीके से अपना निर्यात इतना बढ़ाया कि देश को दुनिया में दूसरे नंबर की अर्थव्यवस्था बना दिया।

प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने मेक इन इंडिय कार्यक्रम शुरू करके देश में आयात का विकल्प तैयार करने का बीड़ा उठाया है और अब समय है कि उस पर नए सिरे से जर दिया जाए ताकि हमारा आयात घटे और निर्यात बढ़े। आयात-निर्यात में भारी असंतुलन होने से अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा जाती हैं और देश का विकास रुक जाता है। एक बड़ी चुनौती बैंकिंग सेक्टर पेश कर रहा है, जहां सरकारी बैंक एनपीए के दबाव को झेल रहे हैं तो दूसरी ओर प्राइवेट बैंकों का धंधा मंदा है। वहां से ऋण का उठाव आशा के अनुकूल नहीं है। उद्योग ऋण लेने से कतरा रहे हैं और इस वजÞह से उनके कामकाज पर असर पड़ रहा है और वे विस्तार योजनाओं पर काम नहीं कर पा रहे हैं। बैंकिंग सेक्टर में सुधार के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण योजनाएं बनाई हैं जिन पर तेजी से काम करना होगा। सरकारी बैंकों को मजबूत बनाना एक बड़ी चुनौती है लेकिन उससे बड़ी चुनौती है ऋण का उठाव बढ़ाना। अर्थव्यवस्था की मजबूती एक मजबूत बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भर करती है। इन्फ्रास्ट्रक्चर मोदी सरकार-1 की बहुत बड़ी ताकत रही और अब चुनौती है कि इसे कैसे और तेज किया जाए। आसियान देशों की शानदार प्रगति का कारण इन्फ्रास्ट्रक्चर ही था।

नई सरकार के सामने इसे नई दिशा देने की चुनौती है। अभी कई नए हवाई अड्डे बनने हैं और बंदरगाहों का निर्माण होना है। इन सभी में तेजी लाने की जरूरत है। भाजपा को इतना बड़ा बहुमत मिला है कि उसके लिए कोई भी बड़ा कदम उठाना और उसे लागू करना कोई कठिन चुनौती नहीं है। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछली सरकार में काफी कुछ कर दिखाया था और इस बार भी उनसे बहुत सी अपेक्षाएं हैं। हमारी अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां बड़ी तो हैं लेकिन दृढ़ निश्चय और दूरदर्शिता से उनका मुकाबला किया जा सकता है। निर्मला सीतारमण अनुभवी राजनेता हैं और उन्होंने वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री के तौर पर काम भी किया है। रक्षा मंत्री के तौर पर उनका प्रदर्शन शानदार रहा है। आगे बढ़ने की ललक रखने वाले देशों के सामने चुनौतियां आती रहती हैं और वही सफल होते हैं जो उनका मजबूती से सामना करते हैं। इसके लिए मजबूत इच्छा शक्ति और दूरर्दिशता की जरूरत होती है जो इस सरकार में पूरी तरह से दिखती है।।


 
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