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आलोचना के पर्याय नामवर

11/08/2019

आलोचना के पर्याय नामवर

 राकेश कुमार

28 जुलाई को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में वरिष्ठ आलोचक एवं साहित्यकार को उनके जन्मदिन के अवसर पर याद किया गया। इस दिन उनके निजी किताबों को पुस्तकालय का हिस्सा बनने का विधिवत उद्घाटन भी किया गया।

ना मवर सिंह सिर्फ अच्छे आलोचक ही नहीं थे, बल्कि वह संबंधों को भी निभाना जानते थे। वरिष्ठ साहित्यकार एवं साहित्य अकादमी के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने ये बातें नामवर सिंह के जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में कही। नामवर सिंह को प्रकृतिलीन हुए कुछ ही महीने गुजरे हैं। उनके जन्म दिवस को याद करते हुए 28 जुलाई को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर नामवर सिंह को जानने-मानने वाले वरिष्ठ साहित्यकार, कवि एवं आमजन उपस्थित थे। इस कार्यक्रम की शुरुआत सबसे पहले नामवर सिंह द्वारा प्रदत निजी पुस्तकों का इं.गां.रा.क.कें. के पुस्तकालय में शामिल करने से हुआ। नामवर सिंह ने अपना निजी पुस्तकालय, दस्तावेज एवं बौद्धिक रचनाओं को अपने जीते-जी कला केंद्र को दान कर दिया था। अब कोई भी नामवर सिंह की रचना संसार को यहां आकर पढ़-लिख सकता है। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने की। साथ ही मुख्य वक्ता के तौर पर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त मंच पर डॉ. रमेश गौड़ एवं डॉ. सच्चिदानंद जोशी भी उपस्थित थे। बारी-बारी से सभी वक्ताओं ने अपने विचार एवं नामवर सिंह से जुड़ी यादें साझा कीं। डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि यह हम लोगों का सौभाग्य है कि उस ऋषि पुरुष ने अपने सारे लिखे-पढ़े को दान कर दिया। जिसे जब चाहे कोई आम पाठक भी उलट पलट कर देख सकता है। उन्होंने जो अनुबंध इस केंद्र से किया था उसे निभाया भी। उनके प्रकृतिलीन होने के बाद परिवार वालों ने जिस तरह से मदद की उसके लिए यह केंद्र उनका ऋणी रहेगा। कार्यक्रम के बीच में ही कुछ लोगों को सम्मानित भी किया गया। इसी बीच नामवर सिंह की पुत्री समीक्षा ठाकुर को भी सम्मानित किया गया। अगले वक्ता के तौर पर डॉ. रमेश गौड़ ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के पुस्तकालय पर प्रकाश डालते हुए बतलाया कि किस तरह से यह केंद्र बुद्धिजीवियों के लिखे- पढ़े को सहेजने की दिशा में अनवरत काम कर रहा है। डिजिटलाइजेशन के युग में पुस्तक, पत्र- पत्रिकाओं एवं दस्तावेज को आॅनलाइन उपलब्ध कराने की भी कोशिश की जा रही है। उसी दिशा में ‘दस्तावेज’ नामक साइट का उद्घाटन भी किया गया। अब कोई भी व्यक्ति इस साइट पर जाकर डिजिटल रूप में कई पत्र-पत्रिकाओं एवं पुस्तकों को देख-पढ़ सकता है। वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने नामवर सिंह को याद करते हुए ‘आलोचना का धर्म’ नामक विषय पर काफी संतुलित भाषण दिया। चूंकि नामवर सिंह की ख्याति एक आलोचक के रूप में थी, अत: उनको केंद्र में रखकर आलोचना पर प्रकाश डाला गया। उन्होंने बताया कि आलोचना कोई नई बात नहीं है बल्कि यह काफी प्राचीन विधा है। पं. राजशेखर के पुस्तक के हवाले से उन्होंने इस बात की पुष्टि की। नामवर सिंह पर खुद के लिखे छह लेखों का भी उल्लेख किया। जिसमें सबसे कड़े आलोचनात्मक लेख को भी उल्लेख किया। इसमें दो संस्मरणात्मक एवं चार आलोचनात्मक थे। ‘वाद-विवाद-संवाद’ श्रृंखला के पक्षधर रहे नामवर सिंह को याद करते हुए डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने अपने कई निजी खट्टे मीठे अनुभवों को भी सभागार से साझा किया। देशविदेश के कई लेखकों एवं कवियों ने सभागार में उपस्थित आमजन को आलोचना जैसे कठिन विषय को सरल शब्दों एवं भाव से समझाने की लगातार कोशिश की। उन्होंने नामवर सिंह को इस बात के लिए साधुवाद भी दिया कि हिंदी साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के रिक्तता को अपनी उपस्थिति से भर दिया था। नामवर सिंह पर बोलते हुए कहा कि नामवर सिंह सचमुच के नामवर थे। कभी कोई जड़सीमा में उन्हें बंधना मंजूर नहीं था बल्कि वह साहित्य एवं आमजन के लिए अपनी बनाई हुई खुद की सीमा को भी अतिक्रमण करने में कहीं कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाते थे। नामवर सिंह ‘मानव रूप में महामानव थे।’ इस पंक्ति के माध्यम से वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने नामवर सिंह को याद किया। नामवर सिंह किस कदर निर्भीक पुरुष थे इसका उदाहरण उन्होंने कई घटनाओं का उल्लेख करके किया। नामवर सिंह की साहित्य साधना उच्च दर्जे ऋषि की तरह थी। उनका साहित्य में जो दिया गया योगदान है वह आने वाले कई साहित्यकारों को मार्ग दिखाने का काम करेगा। कार्यक्रम की समाप्ति कवियों की कविता पाठ से हुआ। मनोज भावुक मंच का संचालन कर रहे थे।


 
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