युगवार्ता

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अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन

30/09/2019

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन


सभी ने पुरजोर स्वर में इस बात को दोहराया की भावनाओं, संवेदनाओं और विचारों के संप्रेषण में हमारी हिन्दी की भूमिका अन्यतम है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भारतीयता के सनातन पथ के वह प्रभावी व कालजयी प्रदर्शक हैं,जिनके सपनों का भारत हिंद स्वराज में दिखाई देता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रेरणादायी व संतुलित जीवन आदर्शों के कारण डेढ़ सदी के बाद आज भी विश्व की एक विलक्षण मानव कल्याणक विभूति के रूप में उनकी सर्वश्रेष्ठ छवि है। सत्य, अहिंसा और सर्वोदय जैसे प्रयोग को जनकल्याण का अमोघ साधन बताते हुए गांधी जी ने स्व-अनुभूति, स्व-चिंतन और स्वतंत्रता के साथ सच्ची संप्रभुता के लिए स्व-भाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने का प्रभावशाली प्रयास किया। उनका मानना था कि हिंदी भाषा भारत की संस्कृति की वाहक है तथा राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण अंग भी है।
गांधी जी के व्यक्तित्व का आयाम इतना विशाल एवं विहंगम है कि उनके व्यक्तित्व-कृतित्व को वैश्विक परिदृश्य में अवलोकन करने में कई सदियां तक कम पड़ सकती हैं। उक्त मिले-जुले विचार राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए अहर्निश समर्पित विश्व हिंदी परिषद की ओर से महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में विभिन्न विद्वानों के उद्बोधन एवं पत्र वाचन में उभर कर आए।
दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित एनडीएमसी के भव्य सभागार में 13 और 14 सितम्बर को हुए सम्मेलन में देश और दुनिया के 500 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य इंद्रेश कुमार की अध्यक्षता में हुए सम्मेलन का उद्घाटन गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह जी उपस्थित रहे। वहीं विशिष्ट अतिथि के रूप में केंद्रीय राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल, जदयू के राष्ट्रीय महासचिव के सी त्यागी, केंद्रीय सड़क एवं परिवहन राज्यमंत्री जनरल वी.के सिंह, पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद सत्यपाल सिंह, शिक्षा-संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव अतुल कोठारी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। स्वागत और संचालन का दायित्व विश्व हिन्दी परिषद के महासचिव डॉ. विपिन कुमार ने संभाला। सम्मेलन के सहयोगी एनडीएमसी और राजभाषा विभाग की सचिव डॉ. रश्मि सिंह ने महात्मा गांधी के सदाचारी, सत्याग्रही, परित्यागी जीवन, श्रेष्ठ जीवनमूल्यों और अमर सिद्धांतों का स्मरण करते हुए देश और विदेश में हिंदी के वर्चस्व को स्थापित करने के लिए बहुआयामी प्रयासों पर जोर दिया।
हिंदी भाषा भारत वासियों की एकता और भाईचारे के बंधन को सुदृढ़ बनाने के साथ हमारी श्रेष्ठ संस्कृति का प्राणतत्व भी है। हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य के बिना कला, दर्शन और संस्कृति का विकास और स्वरूप असंभव है। विदेश से पधारे अतिथियों में अमेरिका से अनिता कपूर, मॉरीशस से रामरूप रोहिणी, नीदरलैंड से डॉ पुष्पा अवस्थी, श्रीलंका से संत धर्मयश, सिंगापुर से ममता मंडल, उज्बेकिस्तान को उल्फत मुखीबोवा और मॉरीशस से विनोद मिश्र को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। भारत के विभिन्न राज्यों से पधारे प्रतिभागियों में से केरल के प्रो. बाबू जोसेफ, अरुणाचल प्रदेश के ताई तगा एवं तकम सोनिया, हैदराबाद के डॉ. देवकुमार पुखराज, आगरा केंद्रीय हिंदी संस्थान के डॉ. उमापति त्रिपाठी, कोल्हापुर के प्रोफेसर अर्जुन राठौड़, पटना के डॉ. पूनम आनन्द, जमशेदपुर से श्री अरुण सज्जन, रांची से प्रो जंगबहादुर पांडेय, उदयपुर से कवियत्री व पत्रकार डॉ. शकुंतला सरूपरिया को विविध सत्रों के श्रेष्ठ मंच संचालन हेतु स्मृति चिह्न और तुलसी का पौधा देकर विशेष रूप से सम्मानित किया गया। प्रतिभागियों को विश्व हिंदी परिषद की ओर से प्रमाण पत्र दिए गए।


 
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