लेख

Blog single photo

पिता की जिद व मेहनत से शिवम बने क्रिकेटर

27/10/2019

योगेश कुमार सोनी

बांग्लादेश के खिलाफ टी-20 क्रिकेट सीरीज के लिए मुंबई के 26 वर्षीय ऑलराउंडर शिवम दुबे का चयन होने के बाद उनके परिवार में बेहद खुशी का माहौल है। उनके पिता राजेश दुबे के अनुसार यह दीवाली उनकी सबसे बेहतरीन होगी क्योंकि जिस मेहनत व तपस्या के साथ उन्होंने शिवम को क्रिकेट के लिए प्रेरित करते हुए यहां तक पहुंचाया, वो राह किसी भी तरह आसान नहीं थी। शिवम जब चार वर्ष के थे तब से ही उनको क्रिकेट खिलाना शुरू कर दिया था। उनके पिता ने प्रारंभिकता से ऐसी नींव रखी थी कि शिवम किसी अन्य खेल या किसी और चक्कर में न पड़ जाएं। शिवम के अलावा उनकी तीन बहनें भी हैं। दो बहनों की शादी हो चुकी है। जैसा कि मध्यमवर्ग परिवारों में हर छोटी बड़ी घटना का प्रभाव ज्यादा पड़ता है, ऐसा ही कुछ शिवम के परिवार में भी हुआ था जिस वजह से कुछ समय के लिए उनका क्रिकेट खेलना तक बंद हो गया था। शिवम के दादा करीब चार दशक पूर्व भदोही से मुम्बई आए थे। उस समय उनके पास करीब साढ़े पांच सौ भैंसें थीं और मुम्बई की कई बड़ी डेरियों में दूध सप्लाई होता था लेकिन समय ने ऐसी करवट ली कि कुछ कारणों से डेरी बंद करनी पड़ी। इसके बाद शिवम के पिता ने जीन्स की फैक्टरी शुरू की। ज्यादा पैसा कमाने के लिए उनको ज्यादा समय देना पड़ रहा था, जिस वजह से 2011 से लेकर 2016 तक शिवम का क्रिकेट खेलना पूरी तरह से बंद हो गया था। बेटे को क्रिकेट खिलाने की हसरत पाले राजेश दुबे को यह हर रोज, हर पल परेशान करती थी लेकिन अपने काम को अधिक समय देकर पहले जीवन को व्यवस्थित किया और एकबार दोबारा शिवम के साथ अपने सपनों की पारी खेली।

शिवम की कहानी का सबसे रोचक किस्सा यह है कि उनके पिता ने खुद उनको पढ़ाई छोड़ने के लिए बोला था। उनका कहना स्पष्ट था कि या तो पढ़ाई या फिर सिर्फ क्रिकेट। दसवीं कक्षा के बाद शिवम ने न तो स्कूल जाने की सोची और न ही कोई किताब उठाई। इस मामले को लेकर घरवालों व रिश्तेदारों ने विरोध भी किया था लेकिन जब कोई मंजिल पानी हो तो न जाने कितने रिश्ते छूट जाते हैं। ऐसे समय पर सिर्फ अपने दिल और दिमाग से निकली सोच ही अच्छी लगती है। ईमानदारी और सच्चाई के साथ राजेश की तपस्या जब सफल हुई तो शिवम के साथ-साथ वह अपनी पूरी दुनिया के हीरो बन गए।

इतिहास गवाह है कि जब कोई बड़ा बना है, उसके पीछे किसी तपस्वी का हाथ होता है जो उसको मंजिल पर पहुंचाता है। हमारे देश में लोग क्रिकेट के खेल को जीते हैं, जिसके चलते सैंकड़ो बच्चे व युवा इसमें आना चाहते हैं। वे भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बनना चाहते हैं लेकिन हर कोई यह सपना पूरा नहीं कर पाता। युध्द में जो सही से लड़ता नहीं, वो जीतता भी नही। खेलों की सबसे अच्छी बात यही है कि यहां जिसके पास हुनर है वो ही आगे बढ़ता है। कुछ लोग ऐसे मामलों में सिफारिश से अपना भविष्य बनाने की बात करते हैं लेकिन जब ग्राउंड पर प्रदर्शन की बारी आती है तो सब पता चल जाता है।

बहराहल, महावीर फोगाट और राजेश दुबे जैसे लोग हमारे आइडियल इसलिए बन बाते हैं क्योंकि इनकी सच्ची साधना की प्रमाणिकता धरातल पर नजर आती है। हरियाणा जैसे राज्य में जहां बेटी कोख में ही मार दी जाती थी, जिस वजह से पिछले कई वर्षों में लिंगानुपात में असमानता देखने को मिलती थी लेकिन महावीर फोगाट दुनिया के तानों को साइड में रखते हुए अपनी बेटियों को इस मुकाम पर पहुंचा दिया कि सब देखते रह गए। हम फिल्मी कलाकारों या राजनेताओं को अपना आदर्श मानने की बजाए यदि ऐसे लोगों की कार्यशैली व जीवन शैली से थोड़ा भी सीख गए तो जिंदगी की हर जंग निश्चित तौर पर जीत लेंगे।

आज हरियाणा ही नहीं पूरे देश की लड़कियों के लिए फोगाट बहनें आदर्श बन गईं। इसके बाद बेटियों का सम्मान भी बढ़ा। जो लोग बेटी पैदा होने पर अपने आपको कमजोर समझने लगे थे वो सौभाग्यशाली समझने लगे। युग या दौर चाहे कोई भी रहा हो लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी की कड़ी मेहनत या घोर तपस्या से उसको फल न मिला हो। यदि समय के साथ नहीं बदलेंगे तो दुनिया से बहुत पीछे रह जाएंगे। आज हम हाईटैक दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं इसलिए हर मामले में सुधरने व बदलने की जरूरत है। कुछ लोग कामयाब इंसान के कद या पद तक पहुंचने की कोशिश करते हैं लेकिन यह हमेशा ध्यान रखिए कि जो भी बड़ा बना है उसने बहुत मेहनत की है। यदि खेलों के संदर्भ में बात की जाए तो यहां कठोर साधना के बिना कोई गुंजाइश नहीं है।

(लेखक पत्रकार हैं।)


 
Top