युगवार्ता

Blog single photo

आखिर किसकी जिम्मेदारी

06/07/2019

आखिर किसकी जिम्मेदारी

संतोष कुमार राय

मुज्ज़फरपुर में चमकी बुखार ने देश की मानवता, संवेदना और सहिष्णुता पर जो प्रहार किया है, उसका जवाब तो बिहार की व्यवस्था में तैनात अफसरों-नेताओं को देना ही होगा। इसे मानवीय भूल मानकर नजरअंदाज करना उन बच्चों की हत्या समान है।

किसी भी दुर्घटना के समय आम नागरिक की क्या जिम्मेदारी होती है? जरा सोचिए कि आपके घर में कोई घटना घटती है, तो आप क्या करते हैं? क्या पूरा परिवार इकट्ठा होकर घर के मुखिया को गाली देता है, उसे कोसता है या अपने स्तर पर उस घटना से निपटने के लिए कुछ करता है। ठीक ऐसी ही स्थिति मुजμफरपुर के संदर्भ में भी देखने को मिल रही है। कितने शर्म की बात है कि सिर्फ सरकार को गाली देकर हम अपने कर्तव्य का इतिश्री मान लेते हैं। सरकार और सिस्टम इसके लिए दोषी है, इससे किसी को कोई गुरेज नहीं लेकिन उतने की दोषी वे लोग हैं जो इस सिस्टम का हिस्सा हैं। मसलन ग्राम विकास अधिकारी, ग्राम पंचायत के पदाधिकारी, प्रखण्ड के अधिकारी-पदाधिकारी, जिला प्रशासन के अधिकारी, तमाम गैर सरकरी संगठन, जो सिर्फ गरीबों की मदद के नाम पर करोड़ों का फंड हजम कर रहे हैं। सरकार की नाक के नीचे गरीबों को मिलने वाली सुविधाओं को लोग हड़प रहे हैं।
दरअसल, मुजμफरपुर की वास्तविकता सिर्फ सरकार को कोसने तक नहीं है। इसके कई और भी पहलू हैं जो इसके पीछे कहीं छिप से गए हैं। जबकि सरकार उसका एक पहलू है। इस पूरे प्रकरण पर एक रिपोर्ट आई है, जिसमें कहा गया है कि चमकी बुखार अर्थात इन्सेफेलाइटिस से वे ही बच्चे पीड़ित हैं, जिन्हें उचित पोषण नहीं मिला। चमकी बुखार उन्हीं बच्चों पर ज्यादा असर डाल रहा है जो कुपोषित हैं। इसमें अधिक संख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों की है तथा उसमें भी लड़कियों की संख्या अधिक है। अब कुपोषण और गरीबी को दूर करने के लिए चलने वाली उन योजनाओं के बारे में भी जान लेना चाहिए जो कुपोषण को दूर करने के लिए सरकार की ओर से चलायी जा रही हैं। इससे जुड़ी हुई सबसे पहली योजना सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना है।
दूसरी आंगनबाड़ी द्वारा पोषाहार वितरण का है और तीसरा हर गरीब परिवार को प्रतिमाह राशन उपलब्ध कराना है। इन सारी योजनाओं के बाद भी बच्चे कुपोषित हैं। इन तीनों योजनाओं में सरकार पर जो खर्च आ रहा है वह कोई छोटा-मोटा नहीं है। मुजμफरपुर के संदर्भ में नीति आयोग को जो रिपोर्ट मिली है, वह व्यवस्था को नंगा करने के लिए काफी है। मुजμफरपुर की महामारी को समझने के लिए इस रिपोर्ट पर एक नजर डालना बहुत जरूरी है। जिला प्रोग्राम कार्यालय की ओर से नीति आयोग को जो रिपोर्ट भेजी गई है, वह आंखें खोलने वाली है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों में लगभग 3 लाख बच्चे नामांकित हैं। इनमें से पांच वर्ष तक के कुल लगभग 27 हजार बच्चे कुपोषित हैं। यह आंकड़ा केवल आंगनबाड़ी केंद्र का है, जबकि उन केंद्रों के बाहर कुपोषित बच्चों की संख्या का अभी तक सर्वे होना बाकी है। यह स्थिति तब है जब पिछले कई दशक से आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों के कुपोषण को दूर करने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।
अब जरा बाल कल्याण निदेशालय के आंकड़ों को भी देख लेना चाहिए। इन आंकड़ों के मुताबिक मुजμफरपुर में आंगनबाड़ी केंद्रों को हर माह 6 करोड़ रुपये से अधिक बच्चों के पोषाहार के लिए भुगतान किया जाता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इस राशि के उपयोग-दुरुपयोग पर न तो मीडिया बात कर रही है और न ही वहां के अधिकारी। इन केंद्रों पर खर्च होने वाली इस राशि की उपयोगिता जांचने का जिम्मा तीन स्तर पर है। प्राथमिक स्तर पर प्रत्येक केंद्र पर महिला पर्यवेक्षिका तैनात हैं। इन्हें अपने सेक्टर के सभी केंद्रों का निरीक्षण करना होता है। दूसरे स्तर पर केंद्रों के निरीक्षण का जिम्मा सीडीपीओ को है। तीसरे स्तर पर इसकी नियमित जांच के लिए जिला प्रोग्राम अधिकारी तैनात हैं। सभी को जांच का प्रतिवेदन आॅनलाइन भेजना होता है। लेकिन सरकार की वेबसाइट के अनुसार इन जिलों का दस प्रतिशत भी नहीं किया गया है। हैरानी की बात है कि इस वित्तीय वर्ष में अभी तक सीडीपीओ या जिला प्रोग्राम अधिकारी द्वारा एक भी केंद्र का निरीक्षण नहीं किया है।
सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि राज्य में कोई भूखा नहीं रहे और कुपोषित होने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता और इसकी जिम्मेवारी पंचायतों के मुखिया और प्रखण्ड के वीडियो की है। मजे की बात यह है कि सरकार की ओर से पंचायतों को जो अनुदान दिया जाता है वह किसी भी पंचायत से वापस नहीं आता। सब जगह खर्च हुआ दिखाया जाता है। फिर भी बच्चे भूखे रहते हैं और कुपोषित भी। और यह सिर्फ मुजμफरपुर की बात नहीं है। यह भारत के गांवों के विकास का निर्मम सत्य है। पूरे देश के अधिकांश आंगनबाड़ी केन्द्रों की यही स्थिति है। सरकार की ओर से दिये जाने वाले फंड का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग इस जनहितकारी योजना की नियति बन गई है फिर सभी लोग चुप हैं। कोई कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है। इसके अलावा मुजμफरपुर जैसे एक जिले में एक दो नहीं, पचासों ट्रस्ट और गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) लगातार बच्चों को लिए ही काम कर रहे हैं।

सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि राज्य में कोई भूखा नहीं रहे और कुपोषित होने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। इसकी जिम्मेवारी पंचायतों के मुखिया और प्रखण्ड के वीडियो की है।

वे सरकार से करोड़ो रुपये अनुदान लेते हैं। लेकिन यह धन किसके पोषण पर खर्च होता है कि हजारों बच्चे भूखे और कुपोषित रह जाते हैं? इस पूरे प्रकरण में क्या माना जाय? क्या ये बच्चे व्यवस्था के चंगुल में दबकर मर गये और व्यवस्था के लोग आंख चुराकर भाग गये। इस घटना के बाद एक बात तो सामने आ गई कि मुजμफरपुर में बच्चों की हुई बेवजह मौत ने बिहार की चरमराती व्यवस्था का पोल खोल दिया। प्रधानमंत्री ने राज्यसभा में कहा कि 70 सालों के बाद भी बच्चों का बुखार से मरना व्यवस्था की विफलता है। आज यह घटना भले ही मीडिया के पन्नों में दब जाय अथवा प्रशासन अपनी किरकिरी और बदइंतजामी में हुए अपमान को जनता का रोष समझकर भुला दे। अथवा अपनी विवशता के तले दबे हुए बच्चों के मां-बाप इसे दैवीय कहर मानकर अपने दिलों को समझाकर शांत हो जायें, किंतु इस घटना ने भारत की मानवता, संवेदना और सहिष्णुता पर जो प्रहार किया है उसका जवाब तो बिहार की व्यवस्था में तैनात अफसरों-नेताओं को देना ही होगा।
इसे मानवीय भूल मानकर नजरअंदाज करना उन बच्चों की हत्या समान है। इसलिए इसका निर्णय सरकार को ही करना है कि वह अपनी व्यवस्था में बैठे हुए दु:शासनों को सजा देती है या फिर उनका बचाव करते हुए अपना पल्ला झाड़ लेती है। इस पूरे प्रकरण में अभी तक जितने भी मदों की बात हुई है, उन सबके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है। प्रदेश सरकार के मंत्री और अधिकारी इस पूरे मामले पर चुप हैं। कोई जवाबदेही लेने के लिए तैयार नहीं है, अर्थात ईमानदारी भी सरकार की और बेईमानी भी सरकार की। सभी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं या सामने आने से बच रहे हैं। इस तरह की घटनाएं सभ्य समाज के भाल पर गहरे शर्म के धब्बे की तरह हैं, बशर्ते शर्म आखों में बची हो तब।


 
Top