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केंद्र के सामने आर्थिक मुद्दे पटरी पर लाने की चुनौती

18/06/2019

राकेश दुबे
ह मोदी सरकार की लगातार दूसरी पारी है। प्रमुख चुनौती अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर कर इसे वापस पटरी पर लाना और युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार सृजन है। पिछले वित्त वर्ष (2018-2019) में देश की जीडीपी विकास दर 6.8 प्रतिशत थी और साल की अंतिम तिमाही में तो महज 5.8 प्रतिशत। पिछले हफ्ते रिजर्व बैंक ने नीतिगत ब्याज दरों में 0.25  आधार अंकों की कटौती की, ताकि निवेश को प्रोत्साहन मिले। यह ब्याज दरों का 2010 के बाद निम्नतम स्तर है। विकास दर भी पिछले पांच साल में न्यूनतम स्तर पर है। यह चिंताजनक है। 
 आर्थिक सुस्ती ने रोजगार की स्थिति पर भी असर डाला है। इस साल की शुरुआत से ही बढ़ती बेरोजगारी की खबरें बनने लगी थीं। यहां तक कि आम चुनाव के दौरान भी लग रहा था कि बेरोजगारी का मुद्दा भारतीय जनता पार्टी को भारी पड़ सकता है। नई सरकार इस कारण कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। इसलिए उसने अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही यह स्पष्ट कर दिया कि यह मुद्दा उसकी शीर्ष प्राथमिकताओं में शुमार है। नई सरकार ने कार्यभार संभालते ही रोजगार और कौशल विकास के मसले पर समाधान के लिए एक मंत्रिमंडलीय समिति का गठन किया। इसका गठन एक ऐसी रिपोर्ट के आने के तुरंत बाद किया गया, जिसने दर्शाया कि देश में बेरोजगारी नई ऊंचाइयां छू रही है। हालांकि यह अब भी अस्पष्ट है कि वर्ष 2017-18 में दर्ज 6.1 प्रतिशत बेरोजगारी पिछले चार दशकों में सर्वाधिक है या नहीं। चूकि डेटा संग्रहण का पैमाना बदल गया है। हाल ही में नए आंकड़ों में एक व्यथित करनेवाला तथ्य यह भी है कि शिक्षा के विभिन्न स्तरों के साथ बेरोजगारी बढ़ रही है। मसलन अशिक्षित पुरुषों में 2.1 प्रतिशत बेरोजगारी है, तो माध्यमिक शिक्षा प्राप्त 9.2  प्रतिशत पुरुष बेरोजगार पाए गए। जाहिर है कि जो अशिक्षित या अल्प शिक्षित हैं, वे किसी भी तरह का काम करने के लिए तैयार हैं। लेकिन जिन्होंने कम से कम 11 साल औपचारिक शिक्षा हासिल की हो, वे बेहतर अवसरों की तलाश में रहेंगे। यहां पर मुद्दा उनके कौशलयुक्त या हुनरमंद होने का है। इसी मुद्दे को लेकर एक मंत्रिमंडलीय समिति बनाई गई है। यह बार-बार कहा जा रहा है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली युवाओं को जॉब मार्केट के हिसाब से तैयार नहीं करती। बेशक, एनडीए शासन के दौरान व्यावसायिक शिक्षा की दिशा में अभियान चलाया गया। यहां तक कि पहली बार कौशल विकास मंत्रालय का भी गठन किया गया। लेकिन जमीनी स्तर पर इसके प्रयास कुछ खास नजर नहीं आते। अलबत्ता, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स ने तो यह भी दर्शाया कि कई कौशल विकास केंद्र महज दिखावटी हैं और उनमें रजिस्ट्रेशन कराने वाले युवाओं को देने के लिए कुछ खास नहीं है।
राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (एनएसडीसी) जैसी एक संस्था भी वर्ष 2008 से अस्तित्व में है। जिस पर कौशल विकास योजनाओं के क्रियान्वयन का जिम्मा है। लेकिन यदि सरकार वाकई हालात सुधारना चाहती है तो उसे न सिर्फ कौशल विकास कार्यक्रमों, बल्कि इस संस्था में भी आमूलचूल सुधार लाना होगा। ऐसे दीर्घावधिक पाठ्यक्रम लाने की जरूरत है, जो वाकई युवाओं को रोजगार लायक बनाए। आज ऐसे अल्पकालीन पाठ्यक्रमों की कोई जरूरत नहीं, जिनका संभावित रोजगारदाताओं की नजरों में कोई मोल न हो। इसके अलावा इन्हें भ्रष्टाचार मुक्त करना भी जरूरी है, ताकि यह सुनिश्चित हो कि ये महज पैसे बनाने के रैकेट बनकर न रह जाएं। एक और चिंतनीय विषय शिक्षित महिलाओं की बढ़ती बेरोजगारी है, जो कि 20 प्रतिशत तक है। हालांकि महिला बेरोजगारी का समग्र स्तर 5.8 प्रतिशत है। यह पुरुष बेरोजगारी के स्तर से कम है। बढ़ती बेरोजगारी से निपटने के लिए पहला उपाय यह हो सकता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश बढ़ाया जाए। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जो बड़ी संख्या में श्रमशक्ति को समाहित कर सकते हैं। संभवत: इसी बात को ध्यान में रखते हुए दो मंत्रिमंडलीय समितियां साथ-साथ गठित की गईं। एक निवेश के लिए और दूसरी, रोजगार व कौशल विकास के लिए। निवेश में आई सुस्ती बढ़ती बेरोजगारी की एक बड़ी वजह रही है।
(लेखक स्वतंत्र स्तंभकार हैं। )


 
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