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आधी आबादी के साथ यह कैसा अन्याय !

08/07/2019

डॉ. प्रभात ओझा

खबर देश की आधी आबादी की है और काफी चिंताजनक है। यह चौंकाने वाली खबर है कि महाराष्ट्र में गन्ने की खेती वाले क्षेत्रों में मजदूर औरतों को अपने गर्भाशय निकलवाने के मामले बढ़े हैं। यह खबर छत्तीसगढ़ से 2014 में आये समाचार से अलग है। छत्तीसगढ़ में उस साल के अंतिम दिनों में मेडिकल कौंसिल ने नौ चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई की थी। कार्रवाई औरतों के गर्भाशय निकालने के मामले में ही हुई थी। हुआ यह था कि सरकार की ओर से महिलाओं के स्वास्थ्य बीमा में प्रति औरत 30 हजार रुपये तय थे। एक रैकेट ने यही राशि हड़पने के लिए बड़ी संख्या में गर्भाशय-ऑपरेशन किए थे। महिलाओं, खासकर गरीब और मध्यमवर्गीय औरतों में अज्ञानता के कारण कुछ अंदरूनी शारीरिक समस्याएं रहती हैं। छत्तीसगढ़ में उन्हें कैंसर का खतरा बताकर ये ऑपरेशन किए गये थे। महाराष्ट्र के मामले बिल्कुल अलग हैं। वहां रोजी-रोटी की खातिर काम करने के लिए ऐसा कराना पड़ रहा है। राज्य के सोलापुर, सांगली, उस्मानाबाद, बीड़ जैसे जिलों से लोग प्रदेश के पश्चिमी भाग में आकर गन्ने के खेतों में काम करते हैं। गन्ने की खेती में लगे ठेकेदार वहां की महिलाओं को इसलिए काम देने में आनाकानी करते हैं कि शारीरिक संरचना की मजबूरियों के कारण महीने में एक-दो दिन वह काम पर नहीं आतीं। इसका समाधान यही है कि जो महिलाएं अपना गर्भाशय निकलवा दें, वही काम पर बनी रहें।

गर्भाशय निकलवाने की मजबूरी का डरावना परिणाम राज्य की विधानसभा में भी जाहिर हुआ है। अभी पिछले महीने विधायक निलम गोरहे ने यह मामला उठाया था। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री एकनाथ शिंदे ने माना कि पिछले तीन साल में केवल बीड़ में ही चार हजार, 605 महिलाओं ने अपने गर्भाशय निकालवा दिए। वैसे मंत्री कहते हैं कि ऑपरेशन के सभी मामले गन्ने की खेती से सम्बंधित नहीं हैं। मामले जो भी हों, गन्ने की खेती से जुड़े हैं, यह तो तय ही है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस स्थिति को 'बहुत दर्दनाक और दयनीय' करार करते हुए राज्य सरकार से भविष्य में ऐसे उत्पीड़न को रोकने के लिए कहा है।

सभी जानते हैं कि महाराष्ट्र का चीनी उद्योग इतना प्रभावी है कि वह अपना असर बहुत दूर तक रखता है। 70 से 90 के दशक के दौरान तो यहां तक कहा जाता था कि यही औद्योगिक क्षेत्र राज्य की राजनीति तक तय किया करता है। बहरहाल, चीनी के मूल, यानी गन्ने की खेती शुरू में तो आसान हो सकती है, पर कटाई के दौरान महाराष्ट्र में यह कष्टकारी होता है। वहां अक्टूबर से मार्च तक दिन-रात गन्ने की कटाई होती है। इस दौरान ठेकेदार चाहते हैं कि मजदूर बराबर लगे रहें। आराम करने वालों अथवा गैरहाजिर रहने वालों पर जुर्माना तक लगाया जाता है। ऐसे में मजदूर महिलाओं के सामने एक ही उपाय बचता है कि गन्ने की कटाई में शामिल होकर रोटी हासिल करने के लिए वह अपना गर्भाशय ही निकलवा लें। स्वाभाविक है कि कम उम्र में मां बन चुकीं महिलाओं को गर्भाशय निकलवाने के बाद दूसरे तरह की तकलीफों से भी गुजरना पड़ता है। उन्हें कई और बीमारियां घेर लेती हैं। फिर कमजोर शरीर के कारण वे जल्द ही अधिक श्रम के काबिल भी नहीं रह जातीं।

महाराष्ट्र में महिला कामगारों को जहां गर्भाशय निकलवाने को मजबूर होना पड़ता है, वहीं कुछ राज्यों में दूसरी तरह की समस्याएं भी हैं। पिछले दिनों तमिलनाडु के गारमेंट्स इंडस्ट्री से भी विचलित करने वाली खबर आई थी। वहां महीने के तीन-चार दिन जब मजदूर महिलाएं विशेष परिस्थियों में दर्द से गुजरती हैं, तो छुट्टी देने की जगह कामचलाऊ दवाएं देकर काम कराया जाता है। ऐसा करने से ये मजदूर महिलाएं भी बीमार होकर श्रम के काबिल नहीं रह जातीं। केरल के सिल्क व्यापार से बैठने के अधिकार की लड़ाई तो चर्चित रही ही है। वहां सिल्क के हजारों शो रूम में ‘सेल्स वूमेन’ को 11-12 घंटे काम करना पड़ता है। इस दौरान यदि वे बैठीं अथवा दीवार से पीठ भी लगाया तो फाइन अथवा नौकरी से निकाले जाने की सजा मिलती रही है। इस स्थिति के खिलाफ एक यूनियन बनाकर लड़ाई लड़ी गई। तत्पश्चात काम के बीच कुछ देर बैठने का अधिकार तो मिल गया, पर आज भी इस पर सवाल खड़े किए जाते हैं। राज्य सरकार और प्रशासन दावा करते हैं कि केरल में अब वह स्थिति नहीं रही। दूसरी ओर शो रूम मालिकों का तर्क है कि एक-दो मामलों से हजारों मालिकों को कठघरे में खड़ा करना कहीं से भी उचित नहीं है।

बात महाराष्ट्र की हो अथवा तमिलनाडु और केरल की। चर्चा महाराष्ट्र में उद्योग बन गये गन्ना जैसे खेती की हो अथवा तमिलनाडु के गारमेंट्स और केरल के सिल्क व्यवसाय की, श्रमिक महिलाएं आज भी दोयम दर्जे की बनी हुई हैं। परिणाम यह हुआ कि देश में कामकाजी महिलाएं कम होती जा रही हैं अथवा समय से पहले वह श्रम के लायक नहीं रह जातीं। एक आंकड़े के मुताबिक वर्ष 2005-2006 के दौरान देश में श्रमिक महिलाएं 36 फीसद थीं, जो 10 साल बाद घटकर 25.8 प्रतिशत ही रह गईं हैं। इंडोनेशिया, जापान आदि देशों में महिलाओं को उनकी विशेष शारीरिक परिस्थिति के दौरान हर माह एक दिन की छुट्टी दी जाती है। हमारे देश में बिहार जैसे राज्य में भी इन दिनों में हर महीने महिलाओं को दो दिनों की विशेष छुट्टी का प्रावधान है। मुश्किल निजी क्षेत्रों की है, जिन पर नियंत्रण रखना आसान नहीं है। फिर भी कल्याणकारी राज्यों को तो इन स्थितियों पर ध्यान देना ही होगा। हमारे देश की राज्य सरकारें ऐसा करने का दावा करती हैं। बेहतर हो कि केंद्र के स्तर पर भी कोई कानूनी जरिया निकालकर देश की आधी आबादी के साथ न्याय का रास्ता निकाला जाय।

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका `यथावत' के समन्वय सम्पादक हैं।)


 
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