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आरसीईपी से दूरी मतलब आम लोगों का ख्याल

06/11/2019

डॉ. प्रभात ओझा

भारत का रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप यानी आरसीईपी से अलग रहना इन दिनों चर्चा का विषय है। चर्चा इसलिए अधिक है कि यह आसियान देशों का मुक्त व्यापार समझौता है, जिसमें अन्य देशों के शामिल होने से इसका बड़ा विस्तार हो रहा है। एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस अथवा संक्षेप में आसियान के 10 सदस्य देश - इंडोनेशिया, थाईलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, फिलीपींस, वियतनाम, म्यांमार, ब्रुनेई, कंबोडिया और लाओस हैं। इन देशों के साथ जुड़कर भारत ने भी कई दौर में समझौते किए। वर्ष 2008 का भारतीय अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला एक तरह से आसियान और भारत के बीच व्यापारिक समझौते का शुरुआती धरातलीय प्रदर्शन था। तब से भारत ने इन देशों के साथ व्यापार के क्षेत्र में कई पड़ाव पार किए। अब सवाल है कि ऐसा क्या हुआ कि भारत ने इन्हीं देशों की पहल पर एक बड़े व्यापारिक समझौते में शामिल होने से इनकार कर दिया। वह भी तब, जबकि देश की एक उच्च स्तरीय सलाहकार समिति के इस समझौते के हक में होने की खबरें आ रही थीं। वैसे यह भी समाचार थे कि न केवल कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल, बल्कि भारतीय जनता पार्टी से जुड़े किसान और व्यापारिक संगठन इस समझौते का विरोध कर रहे थे। 
उम्मीद जताई जा रही थी कि प्रधानमंत्री जब आसियान सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं, भारत भी आरसीईपी में शरीक हो जाएगा। उम्मीद के विपरीत हुआ और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस समझौते में शामिल होने से इनकार कर दिया। ऐसा क्यों किया गया? आसियान का विस्तार ही हुआ है। वर्ष 2010 में चीन भी इन देशों के साथ जुड़ा। इसके पहले 1994 में आसियान की पहल पर एशियाई क्षेत्रीय फोरम यानी एआरएफ की स्थापना हो चुकी थी। इसमें चीन और भारत के अलावा अमेरिका, जापान और उत्तरी कोरिया भी शामिल हुए। यह व्यापार से अधिक सुरक्षा की चिंता को लेकर गठित हुआ फोरम है। फिर भी एक साथ बैठने वाले देशों में आरसीईपी के रूप में व्यापार समझौता बहुत व्यापक हो सकता था। वैसे फिलहाल, आरसीईपी में आसियान यानी दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के अलावा भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के शामिल होने का प्रावधान था। इस समझौते के तहत इसके सदस्य देशों के लिए एक-दूसरे के साथ व्यापार करना आसान होता। कारण यह है कि सदस्य देशों को आयात-निर्यात पर लगने वाला टैक्स या तो भरना ही नहीं पड़ता अथवा बहुत कम देना पड़ता है। पहली नजर में यह बहुत अच्छा दिखता है। बाहर से आने वाली चीजें कम टैक्स के कारण सस्ती और हम जो चीजें बाहर भेजें, उस पर कम टैक्स से आसानी। पर, बात इतनी आसान नहीं है। आरसीईपी मामले में अपने देश के किसान और व्यापारी संगठन इसका विरोध कर रहे थे। उनका मानना था कि भारत इस समझौते में शामिल हुआ तो पहले से परेशान किसान और छोटे व्यापारी तबाह हो जाएंगे।
रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप यानी आरसीईपी से भारत के अलग रहने के फैसले को समझना हो तो पड़ोसी चीन के ही व्यापार विस्तार को देखना होगा। भारत और चीन के बीच पिछले दिनों कारोबारी और आर्थिक रिश्ते बहुत तेजी से बढ़े हैं। इसके तहत भारत मुख्य रूप से चीन को कपास, तांबा, हीरा और अन्य प्राकृतिक रत्न भेजा करता है। इसके उलट चीन से हमारे यहां मशीनें, टेलिकॉम उपकरण, बिजली के सामान, जैविक रसायन और खाद जैसी चीजें आती हैं। दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार का यह आलम है कि 2000 में केवल तीन अरब डॉलर का व्यापार 2008 में बढ़कर 51.8 अरब डॉलर का हो गया। पिछले साल 2018 में दोनों के बीच 95.54 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। उम्मीद है कि इस साल यह 100 बिलियन डॉलर पार कर जाएगा। देखने से तो यह अच्छा लगता है, पर फायदा चीन का ही अधिक हुआ। हमारे विदेश मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक, 2018 में भारत-चीन के बीच 95.54 अरब डॉलर का कारोबार हुआ। इसमें भारत का हिस्सा सिर्फ 18.84 अरब डॉलर ही था। स्वाभाविक है कि यह असंतुलन नये समझौते आरसीईपी के बिना टैक्स अथवा बहुत कम टैक्स की नीति से दूर नहीं होता। हमें देखना होगा कि जो चीजें हमें नहीं चाहिए, वह चीन की ओर से सप्लाई न हो सके। उदाहरण के लिए हम उसे कपास दें और वह सिले-सिलाये कपड़े हमारे देश में पहुंचाता रहे, यह कहां की समझदारी होगी। फिर उसे भी वह चीजें हमसे लेनी होंगी जो हमारे यहां खास है और चीन में अपेक्षाकृत कम विशेषज्ञता वाली हैं। इस सूची में भारत में तैयार दवाइयां, हमारी आईटी और इंजीनियरिंग सेवाओं के साथ हमारा चावल, चीनी, मांस उत्पाद और कई तरह के फल शामिल हैं। 
सवाल चीन के साथ समझौते की ही नहीं है। न्यूजीलैंड का उदाहरण लें तो वहां से दूध का पाउडर अधिक आने लगे तो भारत में दूध उद्योग का क्या होगा? सामान्य किसान भी इस उद्योग से जुड़े हैं। नारियल, काली मिर्च, रबर, गेहूं और तिलहन का ध्यान भी रखना होगा जो हमारे बेहतर उत्पाद हैं और कई देशों की जरूरत हैं। बहुत कम टैक्स की शर्त पर हम इनके व्यापार को असंतुलित कैसे कर सकते हैं? सच यह है कि आरसीईपी के तहत जिन देशों से समझौता होता उनमें अधिकतर से भारत आयात ही अधिक करता है। हम उनको बहुत कम सामान भेजते हैं। चीन के इस समझौते के प्रबल समर्थक होने के पीछे भी तर्क यही है कि उसे अधिक फायदा हो रहा था। हमारे आर्थिक नीति-नियंताओं को यह बात समझ में आने लगी थी। सरकार ने इसे समझा और अंततः हमारी सरकार और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के निचले स्तर पर काम करने वालों का ध्यान रखा। प्रधानमंत्री इस फैसले के पीछे गांधी जी के 'जंतर' का ख्याल आना बताते हैं। इस जंतर के बारे में गांधी जी ने कहा था कि कोई फैसला लेते समय सबसे कमजोर और सबसे गरीब व्यक्ति का चेहरा याद करो और सोचो कि उस निर्णय से उसे कोई फायदा पहुंचेगा या नहीं। 
(लेखक पाक्षिक पत्रिका यथावत के समन्वय संपादक हैं।)


 
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