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सविता ही सूर्य हैं

29/09/2019

हृदयनारायण दीक्षित

ग्वेद में सविता महत्वपूर्ण देव हैं। गायत्री नाम से विश्व चर्चित मंत्र में सविता की ही स्तुति है - तत्सविर्तुरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि, धियो यो नः प्रचोदयात। (3.62.10) संभवतः यह विश्व की प्राचीनतम काव्य रचना है। सातवलेकर के अनुवाद में कहते हैं 'हम सविता देव के उस श्रेष्ठ, वरण करने योग्य तेज का ध्यान करते हैं। यह सविता हमारी बुद्धियों को उत्तम मार्ग में प्रेरित करें।' सविता देव बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग में प्रेरित करने वाले हैं। इनका संबंध विवेक और अनुभूति से है। सविता का दर्शन हमारी बुद्धि का प्रेरक है। गायत्री मंत्र की ही तरह एक अन्य मंत्र (5.82.1) में भी सविता के लिए वैसी ही शब्दावली वाली स्तुति है, 'तत्सवितुर्वृणी वयं देवस्य भोजनम्, श्रेष्ठं सर्वधातम तुरं भगस्य धीमहि - हम सविता देव से उपभोग योग्य ऐश्वर्य की प्रार्थना करते हैं। हम उन भगदेव (भगवान) के सर्वधारक ऐश्वर्य को ग्रहण करें।'
सविता प्रत्यक्ष देव हैं। ऋग्वेद में सविता के लिए 11 सूक्त हैं और 170 से ज्यादा जगह सविता का उल्लेख है। सूर्य के लिए 10 सूक्त हैं। सूर्य उपासना यूनान में भी थी। प्लेटो ने रिपब्लिक में इसका उल्लेख किया है। ऊषा के लिए 20 सूक्त हैं और 300 बार ऊषा का उल्लेख हुआ है। वैदिक समाज में सविता, सूर्य और ऊषा अलग-अलग उपास्य है लेकिन भौतिक यथार्थ में वे एक ही सूर्य के विभिन्न रूप आयाम हैं। सूर्य प्रत्यक्ष है।  सविता और ऊषा प्रगाढ़ अनुभूति की अभिव्यक्तियां हैं। डॉ. कपिल देव द्विवेदी (वैदिक देवों का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक स्वरूप, पृष्ठ 71) ने जोर देकर लिखा है 'सविता ही सूर्य हैं'। डॉ. द्विवेदी ने स्पष्ट किया है 'सविता का अर्थ है - प्रेरणा शक्ति देने वाला (प्रेरक), गति देने वाला। सूर्य संसार को गति प्रेरणा और प्रकाश देता है। अतः सूर्य को सविता कहते हैं।' 
सविता 'विश्वारूपाणि' हैं और ऊषा के बाद प्रकाशित होते हैं। (5.81.2)। यहां सविता और सूर्य एक हैं लेकिन अगले मंत्र (वही, 4) में दोनों अलग-अलग प्रतीत होते हैं, 'हे सविता देव, आप तीनों लोकों में प्रकाशित होते हैं और सूर्य रश्मियों से संयुक्त होते हैं- सूर्यस्य रश्मिभिः समुच्यसि।' सविता सूर्य ही हैं। सूर्य किरणें स्वर्णिम होती हैं। सविता देव का मण्डल 1 सूक्त 35 में स्वर्ण जोड़कर सुंदर मानवीकरण हुआ है। कहते हैं, सविता देव 'हिरण्याक्ष' स्वर्ण आखों - दृष्टि वाले हैं। (वही, 8) उनका रथ भी 'हिरण्येन' स्वर्णिम है। (वही, 1 व 5) वे 'हिरण्यपाणि सविता' हैं। (वही , व 10) उनके हाथ भी सोने के हैं। मंत्र (6.71.3) में उनकी जीभ 'हिरण्य जिह्वः' स्वर्णिम है। हिरण्यगर्भ भी स्वर्णिम है। उनका रूप भी सूर्य जैसा है। उनसे यह संसार उत्पन्न हुआ है। 
वे अग्नि रूप भी हैं। एक मंत्र (1.141.2) में 'अग्नि के 3 रूप हैं। प्रथम भौतिक अग्नि, दूसरे मेघों में विद्युत रूप और तीसरे सूर्य हैं।' दिव्य शक्ति एक है, वही विभिन्न नाम रूप धारण करती है। ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के सूक्त 164 के प्रथम मन्त्र में 'सूर्य देव 3 भाई हैं। प्रथम वे स्वयं हैं, उनके 7 पुत्र हैं। दूसरे सर्वव्यापक वायु और तीसरे तेजस्वी अग्नि।' फिर सूर्य के रथ का वर्णन करते हुए कहते हैं 'सूर्य के एक चक्र वाले रथ में 7 घोड़े जुते हैं। 7 नामों वाला (7 रंग) एक ही घोड़ा रथ को खींचता है। (वही, 2) फिर 'सप्त'-सात शब्द के कई दोहराव हैं। 'सप्त तस्यु, सप्त चक्रं, सप्त वहन्त्यश्वाः, सप्त स्वसारो, सप्तनाम' - सात दिन, सात अश्व, सात स्वरों में सविता की स्तुति करती सात बहनें। (वही, 3) सूर्य प्रकाश में 7 रंग हैं। ध्वनि में 7 सुर हैं। दिन भी 7 हैं। इसके बाद सृष्टि के प्रथम जन्मा पर सुंदर जिज्ञासा है 'को ददर्श प्रथमं जायमान - प्रथम जन्मा को किसने देखा, जो अस्थिरहित होकर भी सम्पूर्ण संसार का पोषण करते हैं।' (वही, 4) सूर्य प्रत्यक्ष हैं, गोचर है, ऋषि इसके पीछे छुपे परमतत्व के प्रति जिज्ञासु हैं। 'ये विज्ञ सप्त तन्तुओं (किरणों, सुरों, दिवसों) को कैसे फैलाते हैं?' (वही, 5) ऋषि विद्वानों का आह्वान करते हैं और अपना अज्ञान स्वीकार करते हैं। मैं अज्ञानी हूं लेकिन जानना चाहता हूं। (वही, 6 व 7) ऋषि सृष्टिकर्ता का जन्म रहस्य जानना चाहते हैं। जन्म के लिए मां-पिता का मिलन चाहिए। कहते हैं 'माता ने पिता का सेवन किया। नमनपूर्वक विचार-विमर्श हुआ। माता गर्भ रस से निबद्ध हुईं। माता की सामर्थ्य सूर्यदेव की धारक क्षमता पर आधारित है।' (वही, 7 व 8) 
सविता प्रत्यक्ष तेज हैं। सूर्य इस तेज की अभिव्यक्ति हैं और ऊषा सूर्योदय के पूर्व का सौन्दर्य। ऋग्वेद के एक सूक्त (1.124) में ऊषा की स्तुति पर सुन्दर काव्य रचना है। कहते हैं 'ये ऊषा देवी नियम पालन करती हैं। नियमित रूप से आती हैं और मनुष्यों की आयु को लगातार कम करती हैं।' (वही मंत्र 2) फिर कहते हैं, 'ऊषा स्वर्ग की कन्या जैसी प्रकाश के वस्त्र धारण करके प्रतिदिन पूरब से वैसे ही आती हैं जैसे विदुषी नारी ऋत-नियम मार्ग से ही चलती है।' (वही, 3) यहां प्रकाश ही ऊषा का वस्त्र है। आगे कहते हैं, 'जैसे भद्र नारियां सोए हुए परिजनों को जगाती हैं, वैसे ही ऊषा भी सोतों को जगाने के लिए आई हैं।' (वही 4) ऊषाकाल वैदिक समाज का जागरण काल है। ऊषा का सौन्दर्य अप्रतिम है। ऋषियों का भावबोध भी रसयुक्त है। कहते हैं, जैसे छोटी बहन बड़ी बहन के लिए अपना स्थान छोड़ती है वैसे ही रात्रि रूपी छोटी बहन बड़ी बहन ऊषा के लिए अपने स्थान से हट जाती है। (वही, 8)
ऋग्वेद में जागरण की महत्ता है। इसलिए 'सम्पूर्ण प्राणियों में सर्वप्रथम ऊषा ही जागती हैं।' ऊषा ऋग्वैदिक कवियों का सम्मोहन हैं 'वे माता द्वारा सजाई गई युवती की तरह आती हैं।' (वही 11) ऋग्वेद की ऊषा, सूर्य और सविता देव ऋषियों के गहन भावबोध और दिव्य दर्शन के देव हैं। सविता-सूर्य पृथ्वी के पोषक हैं। सविता सभी जीवों का प्राण हैं। प्रश्नोपनिषद् (1.5) में कहते हैं - आदित्यों ह वै प्राणौ। छान्दोग्य उपनिषद् में (1.3.1) कहते हैं, 'जैसे मनुष्यों में प्राण उद्गीथ है, वैसे ही ब्रह्माण्ड में सूर्य हैं।' ऋग्वेद 10वें मण्डल के एक सूक्त (36) के देवता हैं 'विश्वेदेवा'। यहां ऋषि अपने यज्ञ में ऊषा, रात्रि, पृथ्वी, वरूण, मित्रगांव, अर्यमा, इन्द्र, मरूत, पर्वत, जल, आदित्यगण, अंतरिक्ष और देव लोक को निमंत्रण देते हैं। (वही, 1) फिर अदिति से पाप कर्म से बचाने की स्तुति है। अश्विनी कुमारों से कल्याण व मरूतों से समृद्धि की कामना है। ऋषि उनकी आज्ञा के अनुगत हैं। (वही 2-11) सूक्त की अंतिम ऋचा (मन्त्र) में (वही 14) सब तरफ सविता ही सविता है। ये सविता हमें सुख समृद्धि दें, दीर्घायु दें। इस मंत्र में सविता की ही सर्वत्र उपस्थिति है। यह ऋग्वेद के 'एक सत्य' की स्थापना है।
(लेखक उत्तरप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हैं।)


 
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