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विपक्षी दलों में कोहराम.

06/06/2019

दधिबल यादव
 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारी बहुमत से केंद्र में दोबारा भाजपानीत सरकार बनने के बाद विपक्षी दलों के बीच कोहराम मच गया है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव से पहले गेमचेंजर कहा जा रहा समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन करारी चुनावी हार के साथ ही खत्म हो गया है। लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच तकरार बढ़ गई है। उसी तरह मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा कर्नाटक में मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के जनता दल (सेक्युलर) और सरकार में सहयोगी कांग्रेस के बीच खटास बढ़ गई है। आंध्र प्रदेश में भी चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देसम पार्टी और कांग्रेस के संबंध बिगड़े तो बिहार में भी राजद और कांग्रेस के सम्बन्ध खराब दौर में पहुंच गए हैं। 
 सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले मायावती और अखिलेश यादव ने जिस नाटकीय घटनाक्रम में दशकों पुरानी दुश्मनी को भूलकर आपस में हाथ मिलाया, वह अवसरवादी गठबंधन लोकसभा चुनाव परिणाम आने के एक पखवाड़े के भीतर ही खत्म हो गया। दोनों पार्टियों ने आगामी विधानसभा की 11 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में अलग-अलग लड़ने की घोषणा की है। इसी गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय लोकदल ने उप चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ बने रहने के संकेत दिए हैं। 
 ख़ास बात यह है कि गठबंधन से बाहर निकलने की पहल मायावती ने की। हालांकि शून्य के साथ इसबार लोकसभा चुनाव में उतरी बसपा, गठबंधन की वजह से सर्वाधिक फायदे में रही। गठबंधन के कारण 10 सीटों पर जीत के साथ बसपा को राजनीतिक संजीवनी मिली। इसके बावजूद मायावती की शिकायत है कि बसपा का वोट तो अखिलेश की पार्टी के उम्मीदवारों को मिला लेकिन अखिलेश अपनी पार्टी का मजबूत वोट बैंक बसपा उम्मीदवारों को ट्रांसफर कराने में विफल रहे। 
गठबंधन तोड़ने के लिए मायावती की दलीलों में कितनी सच्चाई है, इसका आकलन दोनों दलों को मिले वोटों के तुलनात्मक अध्ययन से किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले जहां बसपा का वोट प्रतिशत बरकरार है, वहीं सपा का मत प्रतिशत 4.5 प्रतिशत घटा है। बसपा को इसबार के लोकसभा चुनाव में जहां 19.2% वोट मिले, वहीं 2014 में उसे 19.7% वोट मिले थे। यानी बसपा के वोट प्रतिशत में मामूली गिरावट आई है लेकिन समाजवादी पार्टी को 2014 में जहां 22.3% वोट मिला था, जो इसबार गिरकर 17.3% रह गया। सपा को यह नुकसान क्या हुआ, मायावती ने गठबंधन तोड़कर उसे दोहरा झटका दे दिया। दरअसल, यह चुनावी गठबंधन यह सोचकर किया गया था कि पिछले चुनाव में दोनों दलों को मिले वोट इसबार एकसाथ गठबंधन को मिलेंगे, जो उनके उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करेंगे लेकिन यह आकलन पूरी तरह से गलत साबित हुआ। मतदाताओं ने इस गठबंधन को करारा झटका दिया। 
यह बात दीगर है कि मायावती और अखिलेश ने सूबे में लगभग 19 रैलियां कीं लेकिन जनता ने पुरानी रंजिश को याद रखा। दोनों नेताओं ने चुनाव से पहले जो सपने संजोए थे, लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद पूरी तरह ध्वस्त हो गए। 
चुनाव नतीजों के बाद इस गठजोड़ से भाजपा की चुनावी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों पर ग़ौर करें तो इसबार उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटें कुछ घटी जरूर हैं लेकिन प्रदेश में उसका वोट प्रतिशत 7% तक बढ़ गया है। पिछली बार भाजपा को 42.6% वोट मिले थे और इसबार 49.6% वोट मिले हैं। भाजपा गठबंधन इसबार 64 सीटें जीतने में कामयाब रहा। पिछली बार उसके पास 73 सीटें थीं। 
इसबार लोकसभा चुनाव में सपा ने 37 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें सिर्फ पांच ही जीते लेकिन बसपा ने 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और उसके 10 जीते। पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता ही नहीं खुला था लेकिन सपा को पिछली बार भी पांच सीटें ही मिली थीं। इसबार सपा को सबसे बड़ा झटका यह लगा कि अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव कन्नौज से और चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव बदायूं से हार गए। बसपा ने जौनपुर, गाजीपुर, लालगंज, अंबेडकरनगर और श्रावस्ती जैसी सीटें जीती हैं, जो यादव बहुल हैं। इसके बावजूद मायावती को यादव वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं होने का मलाल है। इसके विपरीत हाथरस, हरदोई, कौशांबी, फूलपुर, बाराबंकी, बहराइच और राबर्ट्सगंज जैसे दलित बहुल मतदाताओं वाली सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा।
 दरअसल, कन्नौज में डिंपल की हार के पीछे अनुसूचित जाति का वोट उन्हें न मिलकर भाजपा की तरफ शिफ्ट हो जाना है। कन्नौज की रैली में डिंपल यादव द्वारा मायावती के पैर छूने और मायावती का आशीर्वाद मिलने के बावजूद दलित वोट उनतक ट्रांसफर नहीं हुए। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि लोकसभा चुनाव से पहले मायावती ने एक रणनीति के तहत सपा को गठबंधन में साथ लिया और चुनाव में 10 सीटें हासिल कीं। उसके बाद समाजवादी पार्टी को झटका देकर किनारे पटक दिया। इस तरह उन्होंने 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड का बदला नियोजित तरीके से मुलायम सिंह के वारिसों से ले लिया। 
मायावती ने लोकसभा चुनाव में अखिलेश और मुलायम सिंह के परिवार के लिए चुनाव प्रचार जरूर किया लेकिन समाजवादी पार्टी के किसी भी प्रत्याशी के लिए अलग से प्रचार नहीं किया। इसके विपरीत अखिलेश यादव ने बसपा के तकरीबन 30 उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार किया। इस गठबंधन में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) भी शामिल था लेकिन मायावती ने उसे कोई सीट नहीं दी और समाजवादी पार्टी ने अपने कोटे से उसे 3 सीटें दीं। सीट बंटवारे के समय भी गठबंधन के बावजूद मायावती ने अखिलेश यादव पर अपनी शर्तें थोपीं। मायावती ने समाजवादी पार्टी के लिए 10 ऐसे शहरी सीटें छोड़ी जहां भाजपा हावी रही है। मसलन वाराणसी, लखनऊ, गाजियाबाद, कानपुर, झांसी, गोरखपुर, अयोध्या और इलाहाबाद इसी तरह की सीटें हैं।
 उधर, लोकसभा चुनाव में अबकी गठबंधन का हिस्सा बनने पर रालोद को अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने में कामयाबी जरूर मिली परंतु लोकसभा में खाता न खुल सका। यहां तक कि रालोद मुखिया अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी के सांसद निर्वाचित होने की मंशा भी पूरी न हो सकी। रालोद के खाते में आई तीसरी सीट मथुरा में भी भगवा फहराया। चौधरी परिवार को लगातार दूसरे लोकसभा चुनाव में भी खाली हाथ रहना पड़ा।
 उत्तर प्रदेश से विपक्षी दलों में मचा घमासान अब धीरे-धीरे दूसरे राज्यों में भी फैल रहा है। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बेटे की हार के लिए अपनी ही पार्टी के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट को जिम्मेदार बता रहे हैं। पंजाब में कांग्रेस पार्टी 13 लोकसभा सीटों में से आठ पर जीत दर्ज की है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह बाकी की सीटों पर हार के लिए अपने ही मंत्रिपरिषद् के साथी नवजोत सिंह सिद्धू को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। कर्नाटक में 28 में से 25 लोकसभा सीटें हार चुकी कांग्रेस और जनता दल सेकुलर एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ, वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और ग्वालियर राजघराने के ज्योतिराज सिंधिया में शीतयुद्ध छिड़ा हुआ है, जो हार के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। 
चुनाव के बाद कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में इन पार्टी नेताओं की परफार्मेंस पर टिप्पणी करते हुए राहुल गाधी यहां तक बोल गए कि कई मुख्यमंत्रियों ने अपने बेटों को जिताने के चक्कर में पार्टी को हरवा दिया। पार्टी में किस स्तर तक शीतयुद्ध चल रहा है, इसका अंदाजा इससे भी लग जाता है कि राहुल गांधी के इस बयान के बावजूद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ न तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में आए और न ही इस हार पर किसी तरह का अपना वक्तव्य जारी किया। लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने जब इस्तीफा देने का ऐलान किया तब भी उनकी पार्टी के किसी मुख्यमंत्री ने न तो अपने इस्तीफे की पेशकश की और न ही हार की जिम्मेदारी ली।
 बिहार में लोकसभा चुनाव में हार के बाद राजद और कांग्रेस गठबंधन में फूट पड़ चुकी है। 40 में से सिर्फ एक सीट जीत पाने के बाद जब गठबंधन की बैठक हुई तो उसमें कांग्रेस के नेता पहुंचे ही नहीं। केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ गठबंधन ने 20 में से 19 सीटों पर जीत दर्ज की है। इसके बावजूद गठबंधन की बैठक में कांग्रेस नेता एपी कुट्टी अब्दुल्ला ने जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं की तारीफ की तो उन्हें निलम्बित कर दिया गया। 
चुनाव से पहले चंद्रबाबू नायडू, ममता बनर्जी और मायावती प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे थे। यहां तक कि चार सीटें जीतने वाली एनसीपी के नेता शरद पवार भी चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद की हसरत रखते थे। इस चुनाव में 52 सीटें हासिल करने वाली कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी भी नतीजे आने से पहले तक प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहे थे। 
चुनाव परिणाम आने के बाद उन्हें अपनी असली जमीन का पता चल गया है। अपनी परंपरागत सीट अमेठी से स्मृति ईरानी से चुनाव हार चुके राहुल की खुशकिस्मती कहें कि अबकी दो सीटों से लड़े और वायनाड से जीतने में सफल रहे। चुनाव परिणाम के बाद अब सभी सकते में हैं। हालांकि इन नेताओं के ख्याली पुलाव के पीछे देश की गठबंधन की राजनीति का पुराना इतिहास भी जिम्मेदार है। 1990 में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो उनकी समाजवादी जनता पार्टी (सजपा) के पास सिर्फ 64 लोकसभा सीटें थी। उससे पहले1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल को 143 सीटें मिली थीं और वह प्रधानमंत्री बन गए। 1996 में एचडी देवगौड़ा गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री बने। तब उनकी पार्टी को कर्नाटक में सिर्फ 16 सीटें मिली थीं। इसीलिए तमाम नेता आज भी गठबंधन की राजनीति में प्रधानमंत्री बनने और मलाईदार मंत्रालय का सपना संजोते रहते हैं लेकिन इसबार मतदाताओं ने अकेले भाजपा को 303 सीटें देकर गठबंधन के नाम पर राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हासिल करने वाली दुकानों को तकरीबन बंद ही कर दिया है। 
(लेखक हिन्दुस्थान समाचार से सम्बद्ध हैं)


 
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