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तनी रस्सी पर बजट बनाने का काम

29/06/2019

डॉ. प्रभात ओझा 

देश का बजट संसद में भले किसी विशेष दिन प्रस्तुत किया जाय, उसकी प्रस्तुति के पूर्व वित्त मंत्री को अपनी पूरी टीम के साथ लंबी प्रक्रिया से गुजरना होता है। यह जरूर है कि राजनीतिक स्थायित्व से किसी सरकार को अपनी नीतियों पर कायम रहने अथवा जरूरत पड़ने पर अनुकूल बदलाव का मौका रहता है। नरेंद्र मोदी सरकार इस मायने में निश्चिंत हो सकती है कि उसके लिए यह अनुकूल अवसर है। वर्तमान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट की तैयारी में विभिन्न पक्षों और उद्योग संगठनों से विचार-विमर्श किया है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से भी 27 जून को मुलाकात की है। कांग्रेस नेता डॉ. सिंह अब संसद में नहीं हैं। वह वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ हैं। नरसिंह राव सरकार के दौरान जिस उदारीकरण की शुरुआत मानी जाती है, उसके सूत्रधार उनके वित्त मंत्री रहे मनमोहन सिंह ही माने जाते हैं। अब नये बजट पर बहस के दौरान उनकी महत्वपूर्ण समझी जाने वाली टिप्पणी संसद के बाहर ही सुनी जा सकेगी। बहरहाल, बजट को अंतिम रूप देने से पहले ही निर्मला सीतारमण ने विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ डॉ. सिंह से भी विचार-विमर्श किया है। कहने का सबब यह है कि जन आकांक्षाओं, उद्योग जगत और विशेषज्ञों की राय सीतारमण के बजट में देखने को मिल सकती है। फिर भी जिस बात के लिए आम लोग बजट का इंतजार करते हैं, उस पर कयास तो होंगे ही। हम उम्मीद कर सकते हैं कि साल के प्रारम्भ में तत्कालीन वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने जो अंतरिम बजट रखा था, पूर्ण बजट में उसके विस्तार की झलक दिखाई देगी। फिर भी कुछ मुद्दे हैं, जिन पर विचार किया जाना जरूरी है। 

आर्थिक विकास को गति देना सरकार के सामने बड़ा लक्ष्य है। इसके लिए मौद्रिक तरलता (मोनेट्री लिक्विडिटी) को बढ़ाना बेहद जरूरी है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले सरकार ने विकास योजनाओं के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से उसके निश्चित फंड से धन मांगा था। कहते हैं कि यही रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर से सरकार के मतभेद का कारण बना था। बहरहाल, वह कहानी खत्म हो चुकी है। सरकार के पास ऐसा करने का अधिकार है। आज फिर वित्तीय अनुशासन से समझौता किए बिना नई वित्त मंत्री सीतारमण को अर्थव्यवस्था के सामने आने वाली अड़चनों को दूर करने की चुनौती है। इसके लिए रोजगार सृजन, निजी निवेश, ग्रामीण असंतोष और कृषि संकट के क्षेत्र पर ध्यान देना होगा। समावेशी बजट इन तमाम क्षेत्रों में वृद्धि सुनिश्चित करे, यह तय करना होगा। 

बजट के अलावा साल भर इन क्षेत्रों में काम करने के मौके होते हैं। फिर भी बजट में ऐसा कुछ दिखने पर ही आम लोगों के साथ उद्योग जगत भी संतुष्टि का भाव रखता है। चुनाव में जाने से पहले ही प्रधानमंत्री किसान योजना का लाभ देश के सभी किसानों को देने की घोषणा हो चुकी है। इस तरह खेती योग्य जमीन की सीमा का ध्यान रखे बिना साढ़े 14 करोड़ किसान अब इसका लाभ हासिल करेंगे। अब उम्मीद की जाती है कि पांच अप्रैल को देश की प्रथम पूर्णकालिक महिला वित्तमंत्री सीतारमण जब अपना पहला बजट पेश करेंगी, किसानों के लिए फसल बीमा योजना का लाभ पूरे देश के किसानों के लिए एक तरह के होने का एलान करेंगी। किसानों को कृषि ऋण आसानी से मिले तो उनके पास खर्च की क्षमता भी बढ़ेगी। कृषि क्षेत्र में स्थायी उपाय के तौर पर सिंचाई को बढ़ावा देने के उपाय ढूंढने होंगे। साथ ही शीतगृह और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में निवेश बढ़ाने पर जोर देना होगा।

मोदी सरकार के पहले पांच साल में बेरोजगारी बढ़ी है। रोजगार के सृजन में देशी कारोबारी समूह को बढ़ावा देने के साथ विदेशी पूंजी निवेश वृद्धि तलाशने के उपाय खोजने होंगे। सरकार के सभी विभाग मिलकर कोई एक ढांचा बना सकते हैं, जिससे सभी विभागों की रिक्तियों की जानकारी एक ही जगह मिल सके। ढांचागत सुविधाओं जैसे भारतमाला, सागरमाला, किफायती आवास, स्वच्छता, सभी को पेयजल, छोटे हवाई अड्डे और नेशनल गैस ग्रिड प्रोजेक्ट आदि प्रोजेक्ट पर विशेष ध्यान देने से लोगों को आवश्यक सुविधाएं तो मिलेंगी ही, बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन भी होगा। इससे नकदी प्रवाह (मोनेट्री लिक्विडिटी) में वृद्धि हो सकती है। लोगों की आमदनी बढ़ने पर निजी उपभोग पर खर्च में वृद्धि सम्भव है। उपभोक्ता मांग गिरने से वाहन उद्योग संकट में है। मध्यम और छोटे दर्जे के आवास पर भी लोग पहले से कम खर्च कर रहे हैं। आवास ऋण पर ब्याज में कटौती की भी लोग उम्मीद कर रहे हैं। हाउसिंग सेक्‍टर को प्रोत्साहन तथा करदाताओं को राहत से मौद्रिक तरलता में निश्चित ही बढ़ोतरी होगी। जीवन एवं स्वास्थ्य बीमा, लघु बचत योजना और इक्विटी टैक्स बचत योजनाओं में भी कमी देखी गई है। पूंजी बाजार में इनके लाभांश पर करों को युक्तिसंगत बनाना होगा।

इन तमाम उपायों के साथ आयकर नियमों पर भी नये सिरे से विचार किया जाना जरूरी है। इसी तरह कॉरपोरेट जगत भी रियायत की उम्मीद कर रहा है। सभी तरह की रियायतों के बीच संतुलन के साथ बैंकों की मजबूती पर ध्यान नहीं दिया गया तो सारी कोशिशें दरकिनार रह जायेंगी। निश्चित ही यह किसी भी सरकार और उसके वित्त मंत्री के लिए आसान नहीं है। बजटीय छूट अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती हैं तो बैंकों की कमजोरी इसे लंबे समय तक संभाल नहीं पाती। इसलिए इन तमाम मुद्दों पर वित्तमंत्री निश्चित ही सोच रही होंगी। देखना है कि पांच जुलाई को इस कवायद का क्या परिणाम निकलता है। 

(लेखक हिन्दुस्थान समाचार की पाक्षिक पत्रिका `यथावत' के समन्वय संपादक हैं।)



 
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